Home ओप-एड काॅलम घाट घाट का पानी: मैं, मेरे बाल और पास्काल!

घाट घाट का पानी: मैं, मेरे बाल और पास्काल!

SHARE

बाल बनवाने हैं. वैसे तो ज़्यादा नहीं रह गये हैं, फिर भी बनवाने हैं.

जर्मनी में किसी सस्ते सेलुन में ही बनवाता हूं. आपको तो पता है, फ़ैशन-वैशन का चक्कर मुझे नहीं है- आख़िर ज़रूरत क्या उसकी, अल्लाह मियां ने वैसे ही ख़ूबसूरत बना दिया है. खैर, महीने-दो महीने में बाल बनवा लेता हूं, ज़रूरत हो या न हो.

जर्मनी में किसी सस्ते सेलून में जाने पर पहले अधेड़ उम्र के हैर म्युलर या हैर मायर मिलते थे – पैंट-शर्ट के ऊपर एक लंबा सफ़ेद लबादा, जेब में कंघी-कैंची, झाड़ी जैसी मूंछ. देखते ही भरोसा हो जाता था कि ओल्ड फ़ैशंड हैं, यानी अनुभवी हैं.

फिर एक मित्र ने बताया कि सस्ते सेलून ढूंढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है, अगर कोई ख़ास ख़्वाहिश न हो तो एक-दो यूरो का फ़र्क होता है, सर्विस बेहतर मिलती है.

तो सिटी सेंटर में एक कैफ़े में बैठा हूं. सामने देखता हूं कई नये सेलून हैं, कुकुरमुत्ते की तरह पिछले सालों में उग आए हैं.

और उनके नाम से अंदाज़ा लगाना पड़ता है कि वहां बाल बनाये जाते हैं. मसलन सामने एक सेलून दिख रहा है, जिसका नाम है हाराकिरी. बता दिया जाय कि जर्मन भाषा में बाल को हेयर नहीं, हार कहते हैं.

नहीं, मुझे बाल बनाने हैं, हाराकिरी में दिलचस्पी नहीं है.

दूर कोने में देखता हूं एक साइन बोर्ड लगा है. अंग्रेज़ी में – हेयर फ़ोर्स नंबर वन. अमरीकी राष्ट्रपति का निजी सरकारी विमान एअर फ़ोर्स नंबर वन कहलाता है. नहीं. मैं नख से शिख तक साम्राज्यवाद विरोधी हूं, शिख भले ही न हो, लेकिन जो थोड़े से बाल हैं, उन्हें हेयर फ़ोर्स नंबर वन के हवाले नहीं करूंगा.

कोई बात नहीं, और दो सेलून दिख रहे हैं. एक का नाम है हारेम. बुरा नहीं है, लेकिन इस उम्र में हरम? थोड़ा ज़्यादा नहीं हो जाएगा? नहीं भई, यह भी नहीं चलेगा.

अगले का नाम है माताहारि, वो रहस्यमयी फ़्रांसीसी सुंदरी, जो जासूसी करने लगी थी. उसके बाल नहीं, सिर ही कलम कर दिया गया था. लेकिन चलेगी.

हिम्मत करते हुए अंदर जाता हूं. कोई नहीं है. इधर-उधर झांकता हूं. अचानक आवाज़ सुनता हूं : हल्ल्लो डियर.

चौंककर देखता हूं. नहीं, झाड़ी-मूंछ वाला कोई हैर म्युलर या मायर नहीं, 27-28 साल का एक छरहरा नौजवान है. वह कोई लबादा नहीं, बल्कि जिस्म से सटा हुआ काले रंग का स्लैक और टी शर्ट पहना हुआ है. देखने वह सर्कस का ट्रैपिज़ कलाकार लग रहा है.

मैं पास्काल हूं जी, कहते हुए उसके सारे बदन में एक लहर सी बह जाती है. “तुम्हें क्या पसंद है?” – बड़ी अदा के साथ वह पूछता है.

“पसंद-वसंद नहीं, मुझे बाल बनवाने हैं.”

“सिर्फ़ बाल? अफ़सोस-अफ़सोस…”, पता नहीं क्यों वह खी-खी कर हंसते हुए कहता है. मेरे कुर्सी पर बैठने के बाद वह पूछता है: “कित्ता रक्खूं? बस इत्ता सा, या इत्ता सा या फिर इ-इ-इत्ताआआ लंबा?” वह अपनी उंगली में नाप दिखाकर पूछता है.

“सिर के ऊपर पांच मिलीमीटर, गर्दन और कान के ऊपर साफ़”- गंभीर होकर मैं कहता हूं.

वह बाल बनाने लगता है. लगातार बात किये जाता है, और वह भी किसी शर्माती और स्मार्ट बनती हुई प्रेमिका की तरह. जब भी उसके हाथ मेरी चमड़ी से छू जाते हैं, थोड़ा परेशान हो जाता हूं.

खैर, बाल ठीकठाक बन गया. लगभग फ़ुसफ़ुसाते हुए उसने पूछा : “क्यों जी, मसाज कर दूं?”

“नहीं-नहीं, कितने देने हैं?” घबराकर मैं पूछता हूं.

“सिर्फ़ दस यूरो. लेकिन टिप्स इतना देना कि तुम्हें कॉफ़ी पिलाने ले जा सकूं.”

चुपचाप मैंने पंद्रह यूरो दे दिये. अगली बार हैर म्युलर या हैर मायर के पास जाऊंगा.

‘घाट-घाट का पानी’ के सभी अंक पढने के लिए कृपया यहां क्लिक करें

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.