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ईरानी औरतों की कहानियाँ : मेरे बालिग़ होने में थोड़ा वक्त है !

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इस कोरोंटाइन समय में आपको दुनिया की बेहतरीन फ़िल्मों से परिचय संजय जोशी करवाएंगे. मकसद यह है कि हिन्दुस्तानी सिनेमा के साथ –साथ पूरी दुनिया के सिनेमा जगत की पड़ताल हो सके और इसी बहाने हम दूसरे समाजों को भी ठीक से समझ सकें. इसी कड़ी में सबसे पहले पेश है ईरानी औरतों की कहानियां. इस श्रृंखला में वर्णित अधिकाँश फ़िल्में यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं और जो आसानी से यू ट्यूब पर नहीं मिलेंगी उनका इंतज़ाम संजय आपके लिए करेंगे. 

दुनियाभर के जरुरी सिनेमा को आम लोगों तक पहुचाने का काम संजय पिछले 15 वर्षो से लगातार ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के जरिये कर रहे हैं. उनसे thegroup.jsm@gmail.com या 9811577426 पर संपर्क किया जा सकता है . (संपादक)        

ईरानी फ़िल्मकार मर्ज़ियेह मेश्किनी ने एक दूसरे बहुत मशहूर फ़िल्मकार मोहसेन मखलमबाफ़ की स्क्रिप्ट के सहारे तीन लघु कथा फ़िल्मों के जरिये ईरानी समाज में औरतों की दुनिया को बहुत संजीदगी से समझने की कोशिश की है. इस कथा श्रृंखला का नाम है ‘द डे आई व्हेन आई बीकेम अ वुमन’ यानि वह दिन जब मैं औरत बनी. इस श्रृंखला की तीन फ़िल्में हैं – हवा, आहू और हूरा. तीनों क्रमशः बचपन, युवावस्था और बुढ़ापे के काल को अपनी कहानी में समेटने की कोशिश करती हैं. 

हम सबसे पहले हवा की कहानी से इस समाज को जानने की कोशिश करते हैं. यह फ़िल्म नौ साल की उम्र की दलहीज पर कुछ ही घंटों में पहुँचने वाली मासूम बच्ची हवा और उसके अनाथ दोस्त हसन की कहानी है. हवा की हसन के साथ खूब जमती है और फ़िल्म की शुरुआत ही उसके इस असरार से होती है कि उसे हसन के साथ खेलने जाना है. इस असरार में थोड़ी दूरी पर खड़ा हसन भी है. हवा की दोस्ती के मस्ती में कुछ देर के लिए व्यतिक्रम आता है जब उसकी दादी उसके नौ साल के होने पर आजादी से खेलने पर रोक लगा देती है और हवा से कहती है कि अब उसे औरतों की तरह पेश आना होगा. मासूम हवा के लिए इस रोक के कोई मायने नहीं है उसे तो बस अपने प्रिय दोस्त हसन के साथ समंदर के किनारे खेलना है. दरअसल आज दुपहर 12 बजे वह नौ साल की हो जायेगी और तब उसे बच्चों वाली सारी छूटें मिलना बंद हो जायेंगी. उसकी मां और दादी हवा के लिए एक बुरके का इंतज़ाम करने में भी लगीं हैं. उनकी बातचीत से ही हवा को पता चलता है कि वह दुपहर 12 बजे पैदा हुई थी. इस सूत्र को पकड़कर हवा दोनों सीनियर महिलाओं के सामने यह तर्क देती हैं कि चूंकि उसके औरत बनने में अभी एक घंटे का वक्त बचा है इसलिए उसे खेलने की मोहलत दी जाय. दादी इस शर्त पर एक घंटे और खेलने के लिए छूट देने पर राजी होती है कि ठीक 12 बजते ही हवा घर को वापिस चल देगी. खेलने पर जाने से पहले उसकी दादी उसे एक डंडी देती है जिसको जमीन में गाढ़कर उसकी परछाई से हवा को 12 बजने का पता चल जाएगा.

अब हवा तेजी से अपने दोस्त हसन के घर पहुँचती है. हसन को उसकी बड़ी बहन ने होमवर्क पूरा करने के लिए घर में बंद कर रखा है. जमीन में डंडी गाढ़कर हवा खिड़की से हसन को पुकारती है. बीच – बीच में हवा डंडी के नजदीक बनती परछाई को भी नापती रहती है. परछाई का ख़त्म होना उसके समय के न रहने का सूचक है. हसन को होम वर्क पूरा करना है और हवा को उसके साथ घटते हुए बचे –खुचे समय में खेलने का मजा लेना है. आख़िरकार हसन उसका मन रखने के लिए कुछ पैसे देता है ताकि हवा खेलने के बदले आईसक्रीम खाने का मजा लूट सके. आइसक्रीम न मिलने पर हवा चटपटी इमली और टॉफी ही ले आती है. बार –बार कम होती परछाई से हवा को अपने मजे के ख़त्म होने का अहसास होता रहता है. धीरे –धीरे आपस में चटपटी इमली और टॉफी खाना ही एक खेल में बदल जाता है. एक बार हसन खिड़की के सीखंचो के पीछे से टॉफी को चूसता है तो फिर उसे हवा भी चूसती है . बीच –बीच में इस मजे को बढ़ाने के लिए चटपटी इमली का स्वाद ही लिया जाता है. जब एक बार और हवा हसन द्वारा झूठी टॉफी को चूसना शुरू करती है तभी समय ख़त्म होने की सूचना के साथ उसकी मां इस खेल में व्यवधान बनती है. इमली की तरह नाजुक और चुलबुली लड़की अब नौ साल की हो गई है. उसकी मां उसे काले हिजाब से ढँकने की कसरत शुरू होती है और फ़िल्म का अंतिम शॉट परदे पर आता है. यह अंत मिड शॉट में दिखते उसी काले मस्तूल के कपड़े से होता है जिससे फ़िल्म शुरू हुई थी और वह हवा का ही काला स्कार्फ़ था जिसे उसने समन्दर के किनारे खड़े लड़कों को मछली वाले खिलौने के बदले उसने दे दिया था.                          

 

मुझे हवा में  उड़ने दो 

ईरानी महिला फ़िल्मकार मरजियेह मेश्किनि की पहली फ़िल्म द डे व्हेन आई बीकेम वुमन तीन छोटी फ़िल्मों में से दूसरी फ़िल्म आहू भी ईरानी समाज  की महिलाओं के गहरे दुःख और उससे मुक्त होने  की चाह की कहानी है। 

फ़िल्म एक ऐसे  लैंडडस्केप से  शुरू होती है जहां एक बड़े भूदृश्य में तेजी से घोड़ा दौड़ाते हुए एक कबीलाई आदमी आहू -आहू की आवाज लगाते हुए दिखता है. इसके बाद का दूसरा भूदृश्य दर्शकों को थोड़ा दिग्भ्रमित भी करता है जब उसी इलाके में मस्ती से घूमते हुए हिरणों का झुंड भी हमें दिखलाई पड़ता है। यह भ्रम जल्द ही टूटता है जब वह कबीलाई आदमी समुन्दर और पंछियों के झुंड  वाले बैंकड्रॉप में तेजी से घोड़ा दौड़ाते हुए एक ऐसे समूह के नजदीक पहुँच जाता है जो सिर तक हिजाब चढ़ाए साईकिल को दौड़ाती हुई ईरानी लड़कियों का विशाल समूह है। कबीलाई अपनी बीबी आहू को इन्ही  साइकिल सवारों के बीच खोजता रहता है और आखिरकार आहू तक पहुँच ही जाता है। वह आहू को दौड़ में न भाग लेने की हिदायत देता है।  आहू, चुपचाप अपना  संतुलन दौड़ में लगाने की कोशिश करती है। आखिरकार वह आहू को धमकी देने के साथ अपने घोड़े का मुंह मोड़ता है और अपने हिजाबों और समंदर के किनारे चल रही हवा से लोहा लेती ईरानी लड़कियों का अपनी -अपनी साइकिल के जरिये संघर्ष जारी रहता है। 

आहू की दौड़ में शामिल रहने और सबसे आगे रहने की चाह उसके पति की धमकी की वजह से ही नहीे रुकती बल्कि फ़िल्म के अगले 20 मिनटों में दौड़ के समानांतर एक दौड़ उसकी ज़िंदगी में चल रही होती है जब एक – एक करके कई लोग उसे धमकाने आते हैं। जल्द इस क्रम में उसका पति  उनके इलाके के धर्मगुरु को ले आता है और अब साइकिल के ट्रैक के अगल बगल दो घोड़े दौड़ रहे हैं।  यह धर्मगुरु उसे समझाता है कि तुम साइकिल नही बल्कि शैतान से जड़ी चीज चला रही हो। वह उसे तलाक के प्रस्ताव का भी अंदेशा देता है जिसपर आहू अपनी मुहर लगा देती है। अब थोड़ा चैन से वह दौड़ में अपने पिछड़ने को बराबर करने के लिए जोर लगाती है तभी कुछ ही देर में चार घुड़सवार साइकिल ट्रैक पर दिखते हैं जिसमे  से एक पर उसका पिता सवार है और वह आहू से अपने कबीले के रीतिरिवाज की दुहाई देते हुए तलाक वाली बात को ख़त्म  करने की सलाह देता है। आखिरकार बूढ़ा सात तक गिनती करके आहू से रिश्ता ख़त्म करके अपने झुण्ड के साथ वापिस हो जाता है. 

आहू  साइकिल को जितना साधने की कोशिश करती है उसका कबीला और कबीले के आदमी उसे उतना ही पटरी से उतारने की कोशिश करते हैं । अब वह दौड़ को लगभग ख़त्म करने और जीतने के करीब है।  दर्शक भी ईरानी औरत की विजयी दिखती कहानी के रोमांच में डूबने को होते हैं कि एक बड़े झटके के बतौर अब पांच घुड़सवार भूदृश्य में शैतान के चेलों  की माफिक नमूदार होते हैं और उसे चेतावनी देते हैं कि तुमने अपने पिता की बात को ठुकराकर कबीले की इज्जत पर सवाल उठाया है। अब तुम्हारे भाई आकर तुम्हे ले  जाएंगे।     

आहू,अब दौड़ जीतने को ही है कि ट्रैक पर उसे दो घुड़सवार दिखते हैं जो उसको जबरदस्ती ले जाने वाले उसके ही भाई हैं। आखिर में हम उसे न सिर्फ दौड़ हारता हुआ देखते हैं बल्कि वह दौड़ के ट्रैक से भी उतारकर वापिस अपने कबीले की तरफ धकेली हुई ले जाते हुई  दिखती है.

 

हूरा : अधूरे ख्वाबों की कहानी

मरजियेह मश्किनि निर्देशित पहली फ़िल्म द डे व्हेन आई बीकेम अ वुमन की तीसरी लघु फ़िल्म हूरा एक तरह से पिछली दो कहानियों का ही अंतिम  विस्तार हैं और उन दोनों कथानकों पर कही गयी निर्देशिका की अंतिम निर्णायक टिप्पणी भी। इस श्रृंखला की पहली लघु फिल्म हवा में  छोटी बच्ची को बहुत जल्दी ही सामाजिक जकड़बंदी में फांसने की कोशिश के तहत खेलने भी नही दिया जाता वही दूसरी फिल्म आहू में एक जवान युवती को साइकिल दौड़ में भाग लेने मात्र से विद्रोही समझ लिया जाता और उससे जोर जबरदस्ती करके दौड़ से निकाल लिया जाता है। हूरा इन दोनों फिल्मों के उलट औरत की जीत की कहानी है।  यह अलग बात है कि यह जीत एक ऐसी बुढ़िया को मिलते दिखाई देती है जो अपने जीवन के अंतिम वर्षों में है। 

झुककर चलती हुई हूरा जब हवाई जहाज से उतरकर शहर की तरफ आगे बढ़ती  है तब किसी को अहसास नहीं होता कि कैसी जोरदार कहानी हमे देखने को मिलने वाली है. जल्दी ही  बुढ़िया हूरा को हवाई अड्डे पर ट्रॉली चलाने वाला एक किशोर लड़का अपनी ट्रॉली में बैठा लेता है।  कहानी तब शुरू होती है जब हूरा उससे बाजार चलने को कहती है जहां उसे बहुत सा फर्नीचर खरीदना है। बहुत शुरू में भी हम इस फिल्म को नहीं पकड़ पाते जब बुढ़िया आम उपभोक्ता की तरह सामान पर सामान  खरीदे जा रही है।  फिल्म तब समझ में आती है जब समंदर के किनारे पर बुढ़िया के खरीदे सामान से एक एब्सर्ड लैंडस्केप निर्मित हो गया है।  इस परिदृश्य में सोफे है, किचन है , विशालकाय फ्रिज है ,आदमकद शीशा है और तरह तरह का सामान अरघनी पर टंगा है।  बुढ़िया को यह सब सामान एक बड़े जहाज पर लादकर ले जाना है और उस इलाके के किशोर बच्चे इस खातिर छोटी नावों के इंतज़ाम में जुटे हैं जो सामान को समंदर के अंदर तक बड़े जहाज के पास ले जाएंगी। 

फिल्म तब हमें ख़ास लगती है जब आखिरी हिस्से में समंदर  के किनारे फैले सामान को देखते हुए वो लडकियां आती हैं जो साइकिल दौड़ में आहू के साथ खुद भी साइकिल चला रहीं थीं।  वे बुढ़िया से अचरज के साथ कहती हैं कि ये सब सामान का आप क्या करोगी।  वे यह भी  कहती हैं कि हमें दे दो हमारे दहेज़ में काम आएगा।  बुढ़िया जब यह कहती है कि मैं आजतक अपने मन का कुछ खरीद ही न सकी तो दरअसल वह अपना ही दुःख नहीे व्यक्त कर रही थी बल्कि उन लड़कियों की कहानी  भी कह रही थी और उस बच्ची की भी कहानी कह रही थी जिसे नौ साल का होते ही काले हिजाब से अनुशासन में जकड़ दिया गया। 

मजे की बात है कि बुढ़िया अपनी आखिरी अंगूठी देखते हुए साइकिल वाली लड़कियों से पूछती है क्या तुम्हे कोई ऐसा सामान दिख रहा है जो मैंने अब तक नही खरीदा ?  आखिर में जब बहुत सी नावों में लदकर  बुढ़िया और उसका सामान समंदर में  जहाज के करीब पहुँच रहा होता है तो बुढ़िया चिल्लाकर किनारों पर खड़ी लड़कियों से कहती है अरे , मैं तो सिलाई मशीन खरीदना ही भूल गयी।‘ 

एक स्वप्न दृश्य की तरह से बुढ़िया नाव पर सवार  अपने सपने को पूरा करते दिखाई  देती है और किनारे पर साइकिल सवार लड़कियों के अलावा हम  हवा फिल्म वाली छोटी लड़की को भी यह सब घटित होता हुए देखते हैं। 

और फिर जो भी दर्शक इस फिल्म को देखंगे और इस कहानी को पढ़ेंगे वे भी तो अपने -पने जहाज़ों को खोजेंगे ?

 


      

 

15 COMMENTS

  1. फिल्म की उपलब्धता की मुख्य समस्या एवं यूट्यूब पर ना मिलना

  2. ईरानी फिल्मों का भारत में कम लोकप्रिय होना एवं महिला प्रधान फिल्मों के प्रति उदासीनता पुरुष प्रधान विचारधारा का आरोपण

  3. ईरानी महिला.
    आलेख बहुत ही बढ़िया जानकारी है. प्रतिरोध की सिनेमा को लोगों के बीच लाना जरूरी है

  4. आप सभी से अपील है कि मेरे ईमेल पर सम्पर्क करें में फ़िल्म को उपलब्ध करवाने की कोशिश करता हूँ।

  5. मुझे याद है संजय जी ने ये फ़िल्में पालमपुर सम्भावना इन्स्टिटूट में दिखा के समय बांध दीया था । एक बार फिर शुक्रिया संजय जी ।

  6. बजरंग बिहारी

    संजय जी बड़ी बारीकी से फिल्म देखते हैं। वे उतनी ही बारीकियों के साथ पाठकों को अपने समीक्षा-लेख के साथ जोड़ते हैं।
    ‘मेरे बालिग होने में अभी थोड़ा-सा वक्त है’ फ़िल्मकार के अंतस्तल को शब्द दे सकने में समर्थ हो सकी समीक्षा है।
    एक सीरीज में निर्मित ये तीनों ही लघु फिल्में ईरानी औरतों की व्यथापूरित स्वप्न कथा हैं ही, वे दुनिया भर की उत्पीड़ित किंतु प्रयासरत स्त्रियों की कहानी भी हैं।

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