Home ओप-एड आवश्यक वस्तु अधिनियम से आलू-प्याज़-दाल बाहर करना भुखमरी को बुलावा !

आवश्यक वस्तु अधिनियम से आलू-प्याज़-दाल बाहर करना भुखमरी को बुलावा !

बंगाल के अकाल (1942-43) में लगभग 4,00,0000 लोग तबाह हो गए थे। यह भुखमरी हमारे इतिहास की सबसे त्रासद घटनाओं में से एक है। अंग्रेजों ने कम दाम पर किसानों से अनाज खरीद कर गोदामों में भर लिया था और उसकी कालाबाजारी शुरू कर दी थी। अकाल के समय इन वस्तुओं की कीमत आसमान छूने लगी लेकिन सरकार ने मूल्य नियंत्रण नहीं किया। उल्टे उसे विश्व युद्ध के दौरान मोर्चों पर भेजती रही। इसके चलते भारी संख्या में गरीब जनता भुखमरी का शिकार हुई और ऊपरी तबके के लोग भी इस अभाव के चपेट में आए।

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बुधवार, 3 जून को पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट मीटिंग में आवश्यक वस्तु अधिनियम,1955 में तब्दीली को मंज़ूरी दे दी गयी। 65 साल बाद हुए इस बदलाव  पर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, हालाँकि किसानों की मर्ज़ी से उत्पाद की ख़रीद-बिक्री को लेकर तमाम संदेह जताये जा रहे हैं। ख़ास तौर पर खाद्य तेल, आलू, प्याज, दलहन और प्याज, चीनी आदि बहुत जरूरी चीज़ों की स्टाक लिमिट ख़त्म करने को ग़रीबों के लिए आफत का संकेत माना जा रहा है। पढ़िये दिगम्बर की एक ज़रूरी टिप्पणी- संपादक

 

दिगम्बर

3 जून को सरकार ने आवश्यक वस्तु कानून में बदलाव करके अनाज, दाल, तिलहन, खाने का तेल, प्याज और आलू जैसी रोजमर्रा की जरूरी चीजों को आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर कर दिया।

ये ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी आवश्यक वस्तु कानून के तहत आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेवारी होती थी, ताकि जनता की जिंदगी को जमाखोरी और कालाबाजारी के बुरे असर से बचाया जा सके। अगर सरकार को लगे कि इनकी आपूर्ति बाधित हो रही है तो इस कानून के तहत वह कुछ समय के लिए इनके स्टॉक की सीमा तय कर सकती थी। इस तरह इन वस्तुओं के थोक या खुदरा विक्रेता या आयातकर्ता को इन वस्तुओं की जमाखोरी से रोका जाता था। हालाँकि सरकार पहले भी उन पर अंकुश लगाने का काम बहुत कम ही करती थी, लेकिन अगर करती तो जमाखोरों को अपना अतिरिक्त माल तत्काल बाजार में बेचना जरूरी हो जाता। इस तरह आपूर्ति पटरी पर आ जाती और कीमत भी कम हो जाती। सरकारी एजेंसी जमाखोरों के गोदाम पर छापे मारकर उनको सजा देती और उनके जब्त माल को भी नीलाम कर देती।

बंगाल के अकाल (1942-43) में लगभग 4,00,0000 लोग तबाह हो गए थे। यह भुखमरी हमारे इतिहास की सबसे त्रासद घटनाओं में से एक है। अंग्रेजों ने कम दाम पर किसानों से अनाज खरीद कर गोदामों में भर लिया था और उसकी कालाबाजारी शुरू कर दी थी। अकाल के समय इन वस्तुओं की कीमत आसमान छूने लगी लेकिन सरकार ने मूल्य नियंत्रण नहीं किया। उल्टे उसे विश्व युद्ध के दौरान मोर्चों पर भेजती रही। इसके चलते भारी संख्या में गरीब जनता भुखमरी का शिकार हुई और ऊपरी तबके के लोग भी इस अभाव के चपेट में आए।

जरा सोचिए! अंग्रेजों के राज में और इस नव उदारवादी पूँजीवाद में कितनी समानता है? पिछले दिनों वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के नाम पर कृषि क्षेत्र में जिन सुधारों की घोषणा की थी, उसका मकसद कृषि उत्पादों की खरीद, भंडारण और व्यापार को बाजार और मुनाफे के हवाले करना ही था। आवश्यक वस्तु कानून में बदलाव ने कृषि उत्पाद के व्यापार, आयात-निर्यात और और सट्टेबाजी में लगे देशी-विदेशी पूँजीपतियों के बेलगाम मुनाफे की गारंटी कर दी। निश्चय ही इसकी कीमत आम जनता को इन वस्तुओं की कीमतों में बेलगाम बढ़ोतरी और भूखमरी के रूप में झेलना होगा, खास तौर पर बदहवासी में कोरोना तालाबन्दी करके सरकार ने जिन करोड़ों लोगों की रोजी- रोटी छीन ली, उनका जीना मोहाल हो जाएगा।

 

. लेखक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।



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