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‘हाइया सोफ़िया’ म्यूज़ियम का मस्जिद बनना यानी कट्टरता की राह में बढ़ा तुर्की भी..

"916 साल तक गिरजाघर रहा 'हेजिया सोफ़िया' को ऑटोमन एम्पायर के आक्रमण के बाद मस्ज़िद बना दिया गया। पिछले 85 सालों से इस्तानबुल की इस शान के ईसाई और मुसलमान दोनों धर्म के लोग बड़े प्रेम से दर्शन करते थे। लेकिन जैसा कि दुनियाभर में धर्म और राष्ट्र का मिश्रण करके राजनीति करने वाले नेता कर रहे हैं, तुर्की में भी ऐसा ही हुआ। राष्ट्रपति एर्दोआन इस्लामिक राष्ट्रवाद की राजनीति करते हैं तो उनको भी तुर्की के बापू का फैसला पसंद नहीं। जैसे अमरीका में ट्रम्प का मार्टिन लूदर किंग के विचारों से टकराव हो जाता है, भारत में गाँधी के हत्यारों को देशभक्त बताने वालों को सांसद बनाया जा रहा है तो एर्दोआन को अतातुर्क के विचार असहज कर रहे हैं।"

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अनुपम 

 

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने इस्तानबुल की विश्व सांस्कृतिक धरोहर ‘हाइया सोफ़िया’ को मस्ज़िद घोषित करके नमाज़ के लिए खोल दिया है। आपको सुनने में ये आम खबर लग सकती है, लेकिन सच ये है कि तुर्की ही नहीं पूरी दुनिया के लिए ये बड़ी खबर है।

तुर्की की उच्च अदालत ने इस शानदार इमारत को 1934 में म्यूज़ियम बनाने के फैसले को ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया। इसके एक घंटे में ही राष्ट्रपति एर्दोआन ने अपना फैसला सुना दिया और शाम को नए मस्ज़िद से अज़ान भी हो गया। दुनिया भर से एर्दोआन के फैसले पर अब कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है।

537 ईसवी में चर्च के रूप में बना ‘हाइया सोफ़िया’ ईसाइयों और मुसलमानों के बीच इतिहास में तनाव का मुद्दा रहा है। रोमन साम्राज्य द्वारा बनाये इस कैथेड्रल को पंद्रहवीं शताब्दी में ऑटोमन एम्पायर की स्थापना के बाद मस्ज़िद में तब्दील कर दिया गया था।

पिछले 85 साल से ‘हाइया सोफ़िया’ एक आलीशान म्यूज़ियम था, जिसे देखने मुसलमान और ईसाई ही नहीं हर धर्म के लोग इस्तानबुल आते थे। तुर्की के बापू माने जाने वाले मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क के लिए म्यूज़ियम बनाने का यह फैसला नए ज़माने के धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील तुर्की की पहचान थी। तुर्की के राष्ट्रपिता, यानी ‘अतातुर्क’ एक महान नेता थे जिन्होंने गणराज्य की स्थापना की और कई सामाजिक सुधार किए। इन्हीं कारणों से बीसवीं शताब्दी के विश्व के सबसे महान नेताओं में अतातुर्क की गिनती होती है।

916 साल तक गिरजाघर रहा ‘हाइया सोफ़िया’ को ऑटोमन एम्पायर के आक्रमण के बाद मस्ज़िद बना दिया गया। पिछले 85 सालों से इस्तानबुल की इस शान के ईसाई और मुसलमान दोनों धर्म के लोग बड़े प्रेम से दर्शन करते थे। लेकिन जैसा कि दुनियाभर में धर्म और राष्ट्र का मिश्रण करके राजनीति करने वाले नेता कर रहे हैं, तुर्की में भी ऐसा ही हुआ। राष्ट्रपति एर्दोआन इस्लामिक राष्ट्रवाद की राजनीति करते हैं तो उनको भी तुर्की के बापू का फैसला पसंद नहीं। जैसे अमरीका में ट्रम्प का मार्टिन लूथर किंग के विचारों से टकराव हो जाता है, भारत में गाँधी के हत्यारों को देशभक्त बताने वालों को सांसद बनाया जा रहा है तो एर्दोआन को अतातुर्क के विचार असहज कर रहे हैं।

पिछले कुछ समय से तुर्की की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रही है और राष्ट्रपति एर्दोआन की लोकप्रियता भी घट रही थी। जनता बेरोज़गारी और आर्थिक तंगी पर सवाल करने लगी थी। एर्दोआन ने तुर्की की मीडिया से लेकर न्यायपालिका तक में अपने लोगों को बिठाकर उसकी स्वतंत्रता खत्म कर दी है। सवाल पूछने वालों को जेल में डालना या प्रताड़ित करना आम है। सोशल मीडिया तक को रेगुलेट किया जाता है ताकि जनता एर्दोआन का खुलकर विरोध करने से डरे।

लेकिन अब शायद जनता भी संतुष्ट हो जाएगी क्योंकि उसे उसका मस्ज़िद मिल गया। यही जनता अब कहेगी की अर्थव्यवस्था तो ऊपर नीचे होती रहती है लेकिन ये सैकड़ों साल पुरानी जंग बार बार नहीं जीती जाती।

एर्दोआन के फैसले के कुछ ही देर में ‘हाइया सोफ़िया’ के बाहर कुछ लोग जश्न मनाने लगे, जमकर धार्मिक नारे लगाने लगे। यही तो चाहिए राष्ट्रवाद के नाम पर उन्माद या धर्म के नाम पर हुल्लड़बाज़ी करवाने वाले नेताओं को। इन्हीं नारों में तुर्की की जनता के असल सवाल दब जाएंगे। इन्हीं नारों में सरकार की घटती लोकप्रियता एक बार फिर संभल जाएगी। इन्हीं नारों में एर्दोआन के मसीहा होने की गूंज सुनाई देगी।


अनुपम, युवा-हल्लाबोल आंदोलन के संस्थापक हैं।

 


 

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