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कुल्ली भाट, निराला और दो महामारियाँ

इस कयामत का एक तटस्थ वर्णन किताब में मिलता है। संदेश आया, पत्नी बीमार है, आखिरी बार देख लो। कलकत्ता से ससुराल पहुंचे, पत्नी मर चुकी थीं। दादाजाद भाई उन्हें देखकर घर लौटे हैं। गांव में घुसते ही उनकी अर्थी आती दिखी। घर गए, भाभी ने पूछा, तुम्हारे भैया कितनी दूर गए होंगे, और देह छोड़ दी। चाचा की सांस अटकी थी। पूछा, तू यहां क्यों आया। ‘आप ठीक हो जाएं तो सबको लिवाकर बंगाल चलूं।’ उधर पत्नी के पीछे दो बेटे और एक बेटी गई, इधर गांव में दो भतीजों को छोड़ पूरा परिवार साफ हो गया।

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महामारियों के साथ खास बात यह जुड़ी है कि लोग उन्हें भूल जाते हैं। सौ-सवा सौ साल पहले का समय भारत में बड़ी महामारियों का था लेकिन मेरे गांव में उसकी याद एक ऐसे दौर के रूप में संचित है, जब लोगों को गांव के सिवान में बसना पड़ा था। उस कठिन वक्त की याद में किसी का नाम बसाऊ, किसी का पंड़ोही, किसी का जंगली पड़ गया, और बस। कितने लोग तब प्लेग या फ्लू की चपेट में आकर मारे गए, कौन सा खास व्यक्ति उसका शिकार हुआ, इसका कोई जिक्र गांव के बूढ़े से बूढ़े व्यक्ति से खोदकर पूछने पर भी नहीं निकलता।

अलबत्ता 1942-43 का अकाल बहुतों की स्मृति में है। महीनों आलू-सेम का चोखा खाकर उससे लड़ी गई लड़ाई। आपदाओं से टकराने वाला हिस्सा ही दिमाग पर छपता है। जो झकोरा सब कुछ साथ लिए जाता है, उसे लोग भूल जाते हैं। भले ही कागजों में वह बड़ी विभीषिका के रूप में क्यों न दर्ज हो। अभी कोविड-19 के हल्ले में हमारे यहां ब्यूबोनिक प्लेग (1896-1914) और स्पैनिश फ्लू (1918) पर चर्चा शुरू हुई है। दोनों ने भारत में ही करीब ढाई करोड़ लोगों को आधा-आधा निपटा दिया। एक ने इस काम में बीस साल लिए, दूसरी ने सिर्फ तीन महीने। लेकिन इन पर सार्वजनिक दायरे में कहीं कोई चर्चा मैंने आज तक नहीं सुनी।

1918 के फ्लू ने- जिसके बारे में ज्यादा चिंता न करने की सलाह तब के टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुंबई के अपने पाठकों को दी थी- महात्मा गांधी और प्रेमचंद को भी अपनी गिरफ्त में लिया था और कुछ बड़े काम करने के लिए छोड़ दिया था। लेकिन प्लेग और फ्लू, दोनों के जीवन बदलने वाले प्रभावों का यादगार जिक्र हिंदी के शीर्ष कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के ही यहां मिलता है। उनकी रचना ‘कुल्ली भाट’ पर हम विस्तार से बात कर सकते हैं क्योंकि कवि और महामारी की भिड़ंत के दृश्य दुनिया में विरले ही दिखाई देते हैं। इस किताब में कुछ रंग आत्मकथा के भी हैं, हालांकि हमें ज्यादा बात उस साधारण इंसान पर ही करनी चाहिए, जिसका जीवन चरित इसमें उकेरा गया है।

1896 में बंगाल में जन्मे निराला कुल 17 साल की उम्र में अपना गौना कराने उन्नाव स्थित अपनी पैतृक भूमि पर नमूदार हुए। ‘गौना हुआ। बड़ी बिपत। गांव में प्लेग। लोग बागों में पड़े। हमारा एक बाग गांव के करीब है। प्लेग का अड्डा होता है- लोग वहां झोपड़े डालते हैं। हम लोग बंगाल से आए, उसी दिन लोग निकलने लगे। आखिर एक महुए के नीचे दो झोपड़े डलवाकर पिताजी मुझे और कुछ भैयाचार नातेदारों को लेकर गौना लेने चले।’ 1913 का साल रहा होगा। 17 के निराला, 13 की पत्नी मनोहरा, और जंगल में मंगल जैसी कुल पांच दिन की गृहस्थी। प्लेग के डर से पांचवें दिन ससुर अपनी लड़की को लिवाने आ गए। निराला के पिता नाराज कि सिर्फ पांच दिन बेटा-बहू को साथ रखने हम कलकत्ता से यहां आए हैं? नहीं चलेगा। लड़के का दूसरा ब्याह करेंगे।

कुछ समय बाद लड़कपन की तमाम खुराफातों के साथ निराला की ससुराल यात्रा। स्टेशन पर हमउम्र नंबरदार राय पथवारीदीन ‘कुल्ली’ से उनकी मुलाकात और किस्सा शुरू। ‘कुल्ली भाट’ सुनकर लगता है जैसे यह किताब चारण जाति के किसी मजदूर के बारे में होगी। लेकिन मामला अलग है। होमोसेक्शुअल मिजाज वाला, बिना परिवार का एक खाता-पीता अय्याश, जो निराला पर बुरी तरह रीझा हुआ है। दोनों की नजदीकी देख ससुराल के लोग निराला से नाराज हो जाते हैं। उसके तौर-तरीके खीझ पैदा करने वाले हैं हालांकि निराला खीझते नहीं। लेकिन पांच साल बाद स्थितियां बदलती हैं। फ्लू में निजी और पैतृक परिवार खोकर ठूंठ हुए निराला एक बार फिर ससुराल जाते हैं और पाते हैं कि ‘यह सच्चा मित्र है।’

इस कयामत का एक तटस्थ वर्णन किताब में मिलता है। संदेश आया, पत्नी बीमार है, आखिरी बार देख लो। कलकत्ता से ससुराल पहुंचे, पत्नी मर चुकी थीं। दादाजाद भाई उन्हें देखकर घर लौटे हैं। गांव में घुसते ही उनकी अर्थी आती दिखी। घर गए, भाभी ने पूछा, तुम्हारे भैया कितनी दूर गए होंगे, और देह छोड़ दी। चाचा की सांस अटकी थी। पूछा, तू यहां क्यों आया। ‘आप ठीक हो जाएं तो सबको लिवाकर बंगाल चलूं।’ उधर पत्नी के पीछे दो बेटे और एक बेटी गई, इधर गांव में दो भतीजों को छोड़ पूरा परिवार साफ हो गया।

किताब में महामारियों का जिक्र निराला ने अपने ही संदर्भ में किया है। किताब के नायक कुल्ली भाट का जीवन इनसे अछूता है। यह आदमी बिना परिवार का क्यों है, यह सवाल पाठक के मन में उठता है लेकिन जवाब में लेखक एक भी शब्द खर्च नहीं करता। मैंने दुनिया की कई महान पुस्तकें पढ़ी हैं, लेकिन उनका कोई किरदार नकली हुए बगैर खुद को जड़ से बदल ले, ऐसे उदाहरण एकाध ही देखे हैं। कुल्ली भाट ऐसा ही किरदार है। उसके दुर्गुणों से समाज को कोई परेशानी नहीं। इलाके के तमाम प्रतिष्ठित लोगों की तरह वह भी कांग्रेस का काम कर रहा है। लेकिन जैसे ही एक मुस्लिम स्त्री से शादी करता है और अछूत बच्चों को पढ़ाने लगता है, समाज उससे यूं कन्नी कटाता है कि बीमारी से गलकर मर जाना ही उसके लिए शेष बचता है।

कुल्ली के इस बदलाव का अद्भुत चित्र निराला खींचते हैं- ‘कुल्ली की आग जल उठी। सच्चा मनुष्य निकल आया, जिसमें बड़ा मनुष्य नहीं होता। प्रसिद्ध मनुष्य नहीं। यही मनुष्य बड़े से बड़े प्रसिद्ध मनुष्य को भी नहीं मानता। सर्वशक्तिमान ईश्वर की मुखालिफत के लिए भी सिर उठाता है, उठाया है।’ गौर से देखें तो ऐसा ही बदलाव हमें निराला में भी दिखता है। महामारी उनका सर्वस्व ले गई। बदले में ऐसी दृष्टि दे गई, जिससे चीजों और लोगों का आभामंडल नहीं, केवल उनका अंतर्तम ही उन्हें दिखता था। हिंदी में एक से एक लिखने वाले उनके बाद हुए। आगे भी होंगे। लेकिन उनके जैसा कोई निर्लिप्त लिखारी जब आएगा, भाषा का मिजाज बदल जाएगा।

 


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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