Home Corona कोरोना: एक वायरस ने तोड़ डाला ग्लोब का ताना-बाना !

कोरोना: एक वायरस ने तोड़ डाला ग्लोब का ताना-बाना !

विश्व के 166 देशों में लॉकडाउन जैसे हालात हैं। इन देशों के स्कूलों और विश्वविद्यालय में व्यापक बंदी का असर बच्चों की पठन-पाठन क्रियाओं पर भी देखा जा सकता है। लगभग 152 करोड़ बच्चे अपने घरों में कैद हैं। इनमें 74 करोड़ लड़कियां और 78 करोड़ लड़के हैं। इसी तरह लगभग 6.5 करोड़ अध्यापक भी अपने पेशे से दूर हो गए हैं। स्कूल और विश्वविद्यालय समाजीकरण प्रक्रिया के प्रमुख स्तम्भ हैं। बच्चों का इस तरह स्कूलों  और युवाओं का विश्वविद्यालयों से दूर होना ना सिर्फ उनकी सीखने की प्रक्रिया में बाधक बन रहा है, बल्कि उनके व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया में भी अवरोध पैदा कर रहा है।

SHARE

अनुराग पांडेय

 

कोरोना वायरस ने पहले से ही नाज़ुक हालात से गुजर रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। वित्तीय वर्ष 2018-19 की वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर, 2008-09 की मंदी के बाद के अपने सबसे निम्न स्तर पर थी। कोविड-19 के प्रसार ने इसे 2008 जैसी मंदी के गर्त में धकेल दिया है। एक बड़े तबके को  रोजगार से वंचित होना पड़ा है। महामारी के प्रसार को रोकने के लिए उठाए गए कदमों मसलन क्वारंटाइन, सामाजिक दूरी बनाना, शहरों को लॉकडाउन करना और यात्रा प्रतिबंधों ने, मांग और आपूर्ति के चक्र को प्रभावित किया है। खुदरा कारोबार, परिवहन व्यवस्था से जुड़े उद्यम-उद्योग और मनोरंजन के क्षेत्र से जुड़े लोगों की आजीविका पर इसका नकारात्मक असर पड़ा है। इसका सीधा प्रभाव शेयर बाजार पर भी पड़ा और उसने गर्त में गोता लगा लिया।

कोरोना वायरस के कारण पहले ही मैनुफैक्चरिंग यानी विनिर्माण उद्योग की आपूर्ति चक्र बाधित होने के साथ ही सामानों और तेल के दामों में बेतहाशा गिरावट दर्ज की जा रही है। इसका सीधा असर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। तरलता की कठोर शर्तों ने विकासशील देशों में पूंजी के प्रवाह को प्रभावित किया है और कुछ देशों में डॉलर की कमी के कारण विदेशी विनिमय बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। डॉलर के मुकाबले कमजोर मुद्रा वाले इन देशों की सरकारों को इस स्वास्थ्य और मानवता के संकट का सामना करने में पर्याप्त आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

रोजगार पर संकट 

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अनुमान के अनुसार इस दौरान पूरे विश्व में तकरीबन 50 लाख से 2.5 करोड़ लोग अपने काम से हाथ धो सकते हैं। इनमें उच्च और निम्न दोनों आय वर्ग के लोग शामिल हैं। लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योग और दिहाड़ी मजदूरों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानताओं, और महिलाओं के कार्य क्षेत्र में भागीदारी जैसे प्रयासों से होने वाले फायदों को, वर्तमान संकट वापस पीछे धकेल सकता है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन में शामिल देशों के कुल श्रम बल का लगभग 30% प्रवासी श्रमिकों पर आधारित है।

जिन पर इस स्थिति का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ सकता है। रोजगार जाने का सीधा प्रभाव अलसलवाडोर, कज़ाकिस्तान, नेपाल, तजाकिस्तान और हैती जैसे उन देशों पर सर्वाधिक पड़ेगा जिन देशों की अर्थव्यवस्था दूसरे देशों से आने वाले धन के प्रवाह पर काफी हद तक निर्भर है। बाजार की अनिश्चितता का प्रभाव असंगठित और संगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ने का आसार है।

‎विकासशील, अल्प विकसित, द्वीपीय देशों की अर्थव्यवस्था पर इस कोरोना काल का प्रभाव चिंता का विषय है। बढ़ते हुए कर्ज के कारण इन देशों की आर्थिक हालत पहले से ही खराबी थी और कोरोना वायरस से पड़ने वाले प्रभावों ने इसे नाज़ुक हालात में पहुँचा दिया है। संसाधनों की न्यूनता के बीच बड़ी आबादी वाले इन देशों के लिए साफ-सफाई, स्वच्छता और सामाजिक दूरी जैसे नियमों का पालन करना बिल्कुल भी आसान नहीं है। दशकों से गरीबी निवारण, महिला सशक्तिकरण और असमानता को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों को कोविड-19 के कारण झटका लगा।

खाद्य वस्तुओं और जरूरी सामानों की बढ़ती जमाखोरी ने इनके मूल्य में अचानक वृद्धि कर दी है। इसने भुखमरी और कुपोषण से लड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों को धक्का पहुँचाया है। इस वायरस से निपटने के लिए जो उपाय अपनाये जा रहे हैं वो घनी आबादी वाले अल्प विकसित देशों की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा चोट पहुचायेंगे। इन देशों में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों की बड़ी संख्या है, जिनके सामने बेरोजगार होने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

शिक्षा-स्वास्थ्य पर संकट

विश्व के 166 देशों में लॉकडाउन जैसे हालात हैं। इन देशों के स्कूलों और विश्वविद्यालय में व्यापक बंदी का असर बच्चों की पठन-पाठन क्रियाओं पर भी देखा जा सकता है। लगभग 152 करोड़ बच्चे अपने घरों में कैद हैं। इनमें 74 करोड़ लड़कियां और 78 करोड़ लड़के हैं। इसी तरह लगभग 6.5 करोड़ अध्यापक भी अपने पेशे से दूर हो गए हैं। स्कूल और विश्वविद्यालय समाजीकरण प्रक्रिया के प्रमुख स्तम्भ हैं। बच्चों का इस तरह स्कूलों  और युवाओं का विश्वविद्यालयों से दूर होना ना सिर्फ उनकी सीखने की प्रक्रिया में बाधक बन रहा है, बल्कि उनके व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया में भी अवरोध पैदा कर रहा है।

स्कूल में मिलने वाली खाद्य सुरक्षा से बच्चों को महरूम होना पड़ा है। परिवारों की आय कम होने का सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों और महिलाओं के पोषण स्तर पर पड़ेगा। यह कुपोषण के खिलाफ हमारी लड़ाई को पीछे धकेलने वाला कदम होगा। एक अनुमान के मुताबिक विश्व  के 120 देशों के लगभग 32 करोड़ स्कूलों में संचालित विश्व खाद्य कार्यक्रम कोरोना वायरस के कारण बंद कर दिया गया है।

बच्चों इस तरह स्कूलों से दूर होने का दूरगामी परिणाम बाल मजदूरी और बाल विवाह में इजाफे के रूप में देखने को मिल सकता है। आईएमएफ की एक हालिया रिपोर्ट से यह बात उभर कर आयी है कि बाल विवाह से अल्प विकसित देशों को सकल घरेलू उत्पादन में 1% का नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि इस संकट से निपटने में संचार तकनीकी ने सकारात्मक भूमिका अदा की है और लोगों की मुश्किलों को कुछ हद तक आसान किया है। चाहे जरूरी सामान के लिए ऑनलाइन भुगतान करना हो या बच्चों को मोबाइल पर ही शिक्षा देने की व्यवस्था या लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से एक दूसरे से जोड़े रहने की व्यवस्था, इन माध्यमों ने लोगों के मानसिक  रूप से स्वस्थ्य रहने में बड़ी भूमिका अदा की है। पर अंतरराष्ट्रीय दूर संचार संघ (आईटीयू) की एक रिपोर्ट को देखे तो इस तस्वीर का एक स्याह पक्ष भी उभर कर आता है। इस रिपोर्ट के अनुसार विकासशील और अल्प विकसित देशों के लगभग 360 करोड़ लोग अभी तक ऑफलाइन हैं अर्थात उनके पास इंटरनेट की उपलब्धता नहीं है।

महिलाओं की मुश्किलें

इस महामारी के दौर में महिलाओं की मुश्किलें और बढ़ गयी है। हेल्थ सेक्टर के कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 70 फीसद है। इन महिलाओं के ऊपर संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। अगर घरेलू परिदृश्य को देखें तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं, पर पूरे तंत्र का ध्यान महामारी से निपटने की ओर लगा होने हुआ है, जिससे महिलाओं की मुश्किलें और बढ़ी ही हैं। बच्चों को भी घर में कैद होने का खामियाजा उठाना पड़ रहा है, जिसके कारण ऑनलाइन चाइल्ड एब्यूजिंग के मामले भी बढ़ सकते है। इन सबके अतिरिक्त बुजुर्गों और विकलांग लोगों के लिए फैमिली आइसोलेशन की प्रक्रिया ने नई दुश्वारियों को ही पैदा किया है। क्योंकि इन लोगों को विशेष देखभाल की जरूरत होती है। इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सालयों में भर्ती मरीजों, जेलों में बंद अपराधियों और डिटेंशन सेंटर में रखे गए लोगों के लिए ये सबसे चुनौती पूर्ण समय है।

‎एजेंडा 2030 और पेरिस समझौते पर प्रभाव

सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बनाये गए एजेंडा 2030, के तहत की जा रही कार्रवाइयों को इस वायरस संक्रमण के कारण बड़ा झटका लगा है। महिलाओं, बच्चों, कमजोर तबकों और असंगठित मजदूरों को इस  कोरोना काल ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। दूसरी तरफ पेरिस जलवायु समझौते के तहत पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन से सकारात्मक बल मिला है। विनिर्माणीय गतिविधियों के रुकने से कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा में कमी आयी है। कई क्षेत्रों में प्रदूषण के स्तर में उल्लेखनीय कमी आयी है पर यह ना कोई स्थायी कमी है और ना कोई स्थायी समाधान। जब तक सभी देश सतत विकास के लक्ष्यों को पाने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं करते हैं तब तक  वातावरण में होने  वाला यह सुधार कोई स्थायी समाधान की शक्ल नहीं ले पायेगा।

हालांकि इस महामारी के विस्तार और संक्रमण की गति को देखते हुए इस बात की पूरी संभावना है कि विभिन्न देशों को होने वाले आर्थिक नुकसान का असर सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने की कार्य योजना पर भी पड़े। सतत, समावेशी और लचीले समाज के निर्माण के लिए विकासशील और अल्प विकसित देशों में नए निवेश को बढ़ावा देकर इस महामारी से होने वाले नुकसान को कुछ कम किया जा सकता है। सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक समाज के हर वर्ग की पहुंच सुनिश्चित करके हम ना सिर्फ सहस्राब्दी और सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं बल्कि भविष्य में ऐसी महामारियों का मुकाबला ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकते हैं।

राजनीतिक नेतृत्व और आपसी सहयोग

कोविड-19 एक वैश्विक महामारी है। इससे निपटने के लिए कुशल नेतृत्व, आपसी तालमेल, पारदर्शिता और विश्वास की जरूरत है। संकट की इस घड़ी में सभी देशों को निजी हितों, प्रतिबंधों, आरोपों और महामारी के राजनीति करण से परे कराह रही दुनिया की तरफ मानवता की दृष्टि से देखना चाहिए। इस मामले में विभिन्न देशों के नेतृत्व कर्ताओं का लहज़ा भी अहम हो जाता है सीमाओं को सील करना, यात्रा को प्रतिबंधित करना या पर्याप्त चिकित्सकीय सामानों को उपलब्ध ना कराकर, हम इस समस्या का वैश्विक समाधान हासिल नहीं कर सकते। इस महामारी के प्रसार के लिए किसी खास जाति, धर्म या वर्ग को चिन्हित करना और उसे शक की नज़र से देखना भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

सत्ताओं और इससे जुड़ी संस्थाओं के सामने भी इस महामारी ने विश्वास का संकट पैदा कर दिया है। किसी खास धर्म या समुदाय विशेष को निशाना बनाने से समाज में दंगे भड़क सकते हैं और सामाजिक अलगाव पैदा हो सकता है। व्यापक स्तर पर आय असमानता से जूझ रहे समाज के लिए यह एक अपूरणीय आर्थिक क्षति होगी। इसके अतिरिक्त इस वैश्विक महामारी ने लोकतांत्रिक कैलंडर को भी प्रभावित किया है खासकर उन देशों की चुनावी प्रक्रिया में रुकावट आयी है जिन देशों में चुनाव सम्पन्न कराने के लिए जरूरी संसाधन, मतदान और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का काम संयुक्त राष्ट्र कर रहा है।


लेखक आईआईएमसी के छात्र हैं

 

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.