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कोराना हॉट स्पॉट बन चुकी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में लॉकडाउन खोलना आसान नहीं

कोरोना से सर्वाधिक पीड़ित मुंबई में सोशल डिस्टेंसिंग की समस्याओं की पड़ताल और लॉकडाउन खोलने की व्यवहारिक समस्याओं की पड़ताल करता आलेख।

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अनमोल गुप्ता

दुनिया भर के प्रमुख शहर कोरोना वायरस महामारी के केंद्र बने हुए हैं. अमेरिका में न्यूयॉर्क इससे सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र है. वहां कोरोना वायरस के कुल मामलों का 20 प्रतिशत अकेले न्यूयॉर्क सिटी में है. ऐसा ही भारत के मुंबई में हैं. महाराष्ट्र में जहाँ 17 मई तक देश के कुल मामलों के 33 प्रतिशत से अधिक मामले पाए गए और इसकी राजधानी मुंबई की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती, धारावी में 5 मई तक 650 से अधिक कोरोना के मामले सामने आ चुके थे. एशिया का सबसे बड़ा स्लम धारावी, जहां आबादी का घनत्व 2 लाख लोग प्रति वर्ग किलोमीटर है, वहां लोग चाहकर भी सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन नहीं कर सकते हैं. अगर धारावी जैसी जगहों पर सभी की स्क्रीनिंग कर भी लेते हैं, तो उन्हें आइसोलेट करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होगा.

मुंबई में हर दिन कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. 50 फीसदी से ज्यादा पॉजिटिव मामले शहर के उन वॉर्डों से हैं, जहां घनी आबादी है. बीएमसी के आंकड़ों से पता चलता है कि करीब आधे कन्टेन्मेंट जोन तंग क्षेत्र वाले हैं. इनमें बांद्रा स्लम पॉकेट, बहुत भीड़ वाला कुर्ला और दूसरे क्षेत्र शामिल हैं. माना जाता है कि भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में कोरोना के ज्यादा मामले इसलिए आए कि व्यवसाय आदि के कामों से कई विदेशी यहां आते रहते हैं और लाखों लोग मुंबई से बाहर भी जाते हैं. इस साल मार्च से यहां कोरोना के केस मिलने शुरू हो गए थे और फिर जैसे-जैसे यहां स्क्रीनिंग और टेस्टिंग बढ़ने लगी, वैसे-वैसे संक्रमितों की संख्या भी बढ़ती चली गई.

मुंबई का धारावी स्लम

कोरोना से निपटने के लिए दुनियाभर में लॉकडाउन को अपनाया गया. भारत में 25 मार्च से 14 अप्रैल तक पहला लॉकडाउन घोषित किया गया, जिसे बढ़ाकर 3 मई और उसके बाद 17 मई और अब ये 31 मई तक जारी रहेगा. अंतराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान तीसरी तिमाही में भारत के जीडीपी विकास की दर 0.8 फीसदी के आसपास रह सकती है. चूंकि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है, इसलिए लॉकडाउन खोलने को लेकर यहां चुनौतियां भी भरपूर हैं. आइए जानते हैं इनके बारे में.

स्वास्थ्य सुविधाएं

जिस तरह मुंबई में कोरोना के मामले सामने आए हैं, उससे लगता है कि लॉकडाउन खुलने के बाद कोरोना के मामले यहां और तेजी से बढ़ेंगे. ऐसे में कुछ रिपोर्ट से ये बात सामने आई है कि मुंबई में अभी भी पर्याप्त आईसीयू बेड नहीं हैं. लॉकडाउन खुलने के बाद शायद मुंबई में अस्पताल बेड, नर्स और एम्बुलेंस सहित सभी आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी हो सकती है.

कस्तूरबा हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट और महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (MGIMS) में डायरेक्टर डॉ एसपी कलंत्री ने चिंता जताई है कि मानसून के मौसम में मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस, स्क्रब टाइफस और चिकनगुनिया के मामले बढ़ेंगे. ऐेसे में आईसीयू और वेंटिलेटर की उपलब्धता हेल्थकेयर सिस्टम के लिए चुनौती होगी.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में लगभग 12 हजार आईसीयू बेड हैं, जिनमें से केवल 25 फीसदी पब्लिक सेक्टर में हैं. छह हजार वेंटिलेटर में से सिर्फ़ 2,500 पब्लिक सेक्टर में हैं. इसलिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो यही होगी कि वो आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता सुनिश्चित करे. इसके साथ ही सरकार प्राइवेट सेक्टर का पूरी तरह से उपयोग करे.

बुनियादी ढांचा

मुंबई शहर की बेतरतीब संरचना, ट्रैफिक व्यवस्था और सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग के कारण लॉकडाउन खोलना शहर के लिए भारी पड़ सकता है. मुंबई में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली लोकल ट्रेनें और बसें लॉकडाउन खुलने पर कोरोना कैरियर बन सकती हैं. मुंबई में वैसे भी मजदूरों की संख्या अधिक है, जो नाला सोपारा, विरार और धारावी जैसे इलाके में रहते हैं. साथ ही यहां शहरों के आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों की दूरी अधिक है. कुछ इलाकों में तो दो-दो घंटे तक की दूरी तय करके लोग अपने घर जाते हैं, जिसमें सार्वजनिक परिवहन की अहम भूमिका है.

मुंबई में इसी सार्वजनिक परिवहन पर लोगों की निर्भरता है. साल 2011 की जनगणना के अनुसार, मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र (एमएमआर) के 20 लाख लोग, जो पूरे वर्क फोर्स का एक-तिहाई है, आने-जाने के लिए लोकल ट्रेनों का ही इस्तेमाल करते हैं. जनगणना में इस वर्क फोर्स में कृषि और घरेलू उद्योगों के अलावा अन्य कामों मे लगे लोगों को भी गिना गया है.

जनगणना के अनुसार, लोकल ट्रेन की यह यात्रा ठाणे जिले के कस्बों से आने वाले लोगों के लिए लंबी होती है. ठाणे से आने-जाने वाले लोगों को एक तरफ की यात्रा में लगभग 30 किलोमीटर की पड़ती है और वे लगभग 50 मिनट से अधिक समय ट्रेन में ही व्यतीत करते हैं. शहर के लोकल ट्रेन में यात्रा करने वाले अधिकतर यात्रियों का भी यही हाल है. विल्मर स्मिथ की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, शहर में वर्किंग टाइम में (सुबह 7 बजे से 11 बजे और फिर शाम 4 बजे से 8 बजे के बीच) में 1,100 यात्रियों की क्षमता वाली एक लोकल ट्रेन में लगभग 4,000 लोग यात्रा करते हैं.

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अगर मुंबई में लॉकडाउन खुला तो कोरोना के थर्ड स्टेज को रोकने के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां सार्वजनिक परिवहन में अत्यधिक भीड़ का होना ही है. साथ ही लोकल ट्रेनों की ये भीड़ मुंबई मेट्रोपोलिटन एरिया (MMR) के अव्यवस्थित विकास को भी दर्शाता है. एमएमआर की तकरीबन 40 फीसदी जनसंख्या बीएमसी के बाहर रहती है. इनमें से अधिकतर जनसंख्या ठाणे जिले के आसपास की है, जहां सिर्फ 30 प्रतिशत ही रोजगार है. सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तो यह आंकड़ा कम होकर 20 प्रतिशत के आसपास ठहर जाता है. ये सभी आंकड़े साल 2011 की जनगणना और साल 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के हैं. साल 2020 में ये आंकड़े और बढ़ सकते हैं.

भविष्य की प्लानिंग

कहते हैं कि हर क्राइसिस एक अपॉर्च्युनिटी लेकर आता है. इस हिसाब से देखें तो मुंबई शहर को व्यवस्थित करने का यह सबसे उचित समय है. मुंबई के नीति-निर्माताओं के लिए इससे अच्छा वक्त नहीं हो सकता है, जब मुंबई शहर कई महीनों से ठप्प पड़ा है और आगे भी कुछ समय के लिए ठप्प रहेगा. ऐसे में शहर को व्यवस्थित करने के कुछ प्लान आसानी से लागू हो सकते हैं. शहर की रूपरेखा से लेकर उसमें तमाम ढांचागत बदलाव भी किए जा सकते है. भीड़ को शिफ्ट करने की योजना पर भी काम किया जा सकता है. इसके अलावा रोजगार के नये अवसर शहर से बाहर भी पैदा किये जा सकते हैं. बाहरी क्षेत्र में जितनी अधिक कंपनियां शुरू होगी, शहर को व्यवस्थित करने में उतना अधिक लाभ मिलेगा. बस जरूरत है राजनीतिक इच्छा शक्ति की.


लेखिका, अनमोल गुप्ता भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही हैं. इनकी रुचि कृषि, पर्यावरण, अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध और अर्थव्यवस्था में है.

 

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