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गाड़ी लोहरदगा मेल: अतीत हो रही एक ट्रेन के ज़रिये वर्तमान और भविष्य की पीड़ा !

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(इस कोरोंटाइन समय में आपको दुनिया की बेहतरीन फ़िल्मों से परिचय संजय जोशी करवा रहे हैं. यह मीडिया विजिल के लिए लिखे जा रहे उनके साप्ताहिक स्तम्भ सिनेमा-सिनेमा की पांचवीं कड़ी है। मक़सद यह है कि हिन्दुस्तानी सिनेमा के साथ–साथ पूरी दुनिया के सिनेमा जगत की पड़ताल हो सके और इसी बहाने हम दूसरे समाजों को भी ठीक से समझ सकें. यह स्तम्भ हर सोमवार को प्रकाशित हो रहा है -संपादक)

 

‘अखड़ा में केहर नाची सरई फूल खेसी’ 

 

झारखंडी समाज में ‘अखड़ा’ के वही मायने हैं जो बंगाली समाज में ‘अड्डा’ के. ‘अखड़ा’ यानि मिलने –जुलने गप्प मारने और नाचने की जगह. झारखंडी गावों में अनिवार्य तौर पर गाँव के बीचो बीच एक छोटा सा अखड़ा जरुर मिलेगा जहाँ मौका मिलते ही युवा लोग आकर नाच गाना करेंगे, मिलेंगे, बतियायेंगे. झारखंडी संस्कृति के गहरे जानकार डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस बात को बाक़ायदा सैंद्धातिक  जामा पहनाते हुए कहा भी  ‘नाची ते बाची’ यानि नाचेंगे तो बचेंगे. यहाँ नाचने का अर्थ बहुत विस्तृत है. नाचना अपनी संस्कृति को अपनाना भी है और बचाना भी. राँची में ऐसे ही अर्थ छवि से संपृक्त‘अखड़ा’ नाम का एक सांस्कृतिक समूह भी है जो 1995 से लगातार कार्यरत है.    

सन 2000 तक बिहार से अलग होकर स्वतंत्र झारखंड राज्य की स्थापना हो चुकी थी और तेज गति से विकास शुरू हो चुका था. शायद इन्ही नए राजनीतिक बदलावों के चलते 2004 में लोहरदगा से रांची के बीच 74 किमी की दूरी तय करने वाली सौ साल पुरानी ट्रेन ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ को बंद किया जाने वाला था. कारण, रेल की पटरी को मीटर गेज से ब्रॉड गेज में बदलना था. यहाँ यह जानना बेहद जरुरी है कि लोहरदगा मेल कोई सामान्य ट्रेन नहीं बल्कि झारखंड की जीवन रेखा थी. इसी पर सवार होकर हज़ारों झारखंडी ‘कोड़ा’ कमाने आसाम के चाय बागान और दूसरी जगह गए. यही ट्रेन बाहर के लोगों को झारखंड के अंदर लाने का जरिया बनी. 

रांची के अखड़ा समूह ने अपनी इस महत्वपूर्ण ट्रेन को इतिहास में समा जाने से पहले अपने कैमरे के माध्यम से रिकार्ड करने का मन बनाया और 2003 के जाड़ों में झारखंड के कुछ चुनिन्दा संस्कृतिकर्मियों को साथ लेकर एक रिकार्डिंग शिड्यूल की योजना बनायी. तीन दिन की रिकॉर्डिंग के बाद 27 मिनट का जो ऑडियो –विज़ुअल दस्तावेज़ ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ के नाम से यह हासिल हुआ वह हमारे नए हिन्दुस्तानी सिनेमा की अमूल्य निधि है जो अपनी दृष्टि के कारण दस्तावेज़ी सिनेमा की धारा में एक प्रभावशाली हस्तक्षेप भी करती है. 

जाहिर है यह दस्तावेज़ीकरण किसी बड़े संस्थान द्वारा नहीं बल्कि झारखंड राज्य के आंदोलन में तन-मन से जुटे वहीं के ईमानदार संस्कृतिकर्मियों की पहल पर हो रहा था इसलिए उनका जोर ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ जैसी शाही ट्रेन के चयन पर नहीं बल्कि एक ऐसी जीवनरेखा पर था जिससे झारखंडी समाज और जीवन की हलचलों के मानी अपनी तमाम उलझनों के साथ दर्ज होने थे. इसलिए इस दस्तावेज़ीकरण से बाद में तैयार हुई फ़िल्म में एक सुचिंतित योजना भी दिखाई देती है. यह योजना थी एक ट्रेन के बहाने झारखंडी जीवन और संघर्ष को कैद करने की. इस चिंता को सिनेमाई रूप देने के लिए एक आसान तकनीक को अपनाया गया है. तकनीक यह थी कि ट्रेन की यात्रा में सात गानों को पिरोकर झारखंडी अस्मिता और संघर्ष का दस्तावेज़ हासिल करना . ये गाने झारखंडी भाषा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवियों-कलाकारों यथा डॉ राम दयाल मुंडा, मधु मंसूरी हंसमुख और मुकुंद नायक द्वारा लिखे और गाये गए हैं,इसलिए यह दस्तावेज़ीकरण और ख़ास हो जाता है. कैमरा किन लोगों के हाथ में है इससे बहुत कुछ फ़िल्म की प्रकृति का निर्धारण होता है. इसलिए इन गानों के साथ –साथ खिड़की से बाहर दिखते दृश्य और ट्रेन के अन्दर बैठे आम झारखंडी चेहरे इसे और प्रामाणिक संगति प्रदान करते हैं. 

फ़िल्म का पहला दृश्य ही दस्तावेज़ी विधा के अनूठेपन की तरफ़ इशारा करता है. कथा फिल्मों की तुलना में दस्तावेज़ी फ़िल्मों में दृश्यों की रिकॉर्डिंग न्यूनतम तामझाम से भी कम संसाधनों से हासिल की जाती है. यह दस्तावेज़ी विधा की जरुरी शर्त भी है और दस्तावेज़ी फ़िल्मों के लिए वित्त उपलब्ध न होने के कारण अपनी जरुरत से उपजा कौशल भी. इसी जरुरत और कौशल से हासिल फ़िल्म का पहला दृश्य गौर करने लायक है. यह द्रश्य फ़िल्म की एकदम शुरुआत में बमुश्किल 12 सेकण्ड (1 मिनट 38 सेकण्ड से 1 मिनट 50 सेकण्ड)  के लिए ही रहता है जिसमे झारखंडी महिलायें ट्रेन के डब्बे में बैठे हुई गाती हैं. गीत के बोल का हिंदी में अनुवाद इस तरह है : अरे ओ प्यारी मैना, ट्रेन तेजी से दौड़ रही है , हर स्टेशन पर इसके टिकट मिल रहे हैं’ . यहाँ ख़ास है उन्मुक्त भाव से गाती हुई उन महिलाओं को अपनी फ़िल्म में जगह देना. अगर आपको याद आ रही हो तो ऐसा ही प्रवेश शायद इतनी ही अवधि के लिए ही ऋत्विक घटक ने अपनी फ़िल्म ‘अजांत्रिक’ में दिया था जब एक झटके से संथाल आदिवासियों की टोली का एक समूह हमारे सामने से गुजरता है. 

झारखंडी समाज को जगह देने का निर्वाह पूरी फ़िल्म में चलता है. बहुत सजगता से बीजू टोप्पो का कैमरा बहुत आत्मीयता से दृश्यों का एक बंध निर्मित करता है जिसके द्वारा अगले 25 -26 मिनट में झारखंडी समाज हमें नजदीकी से दिखना शुरू होता है. इस फ़िल्म में मधु मंसूरी हंसमुख द्वारा गाये ‘चांदो और फागू’ की कहानी वाले गीत पर गौर फरमाएं जो फ़िल्म में 5 वें मिनट पर शुरू होता है. 

गीत के बोल इस तरह हैं :   

चांदो रे SSS चांदो रे SSS 

तोये कोड़ा मत जाबे हमर प्रेम तोड़ी 

तोये कोड़ा मत जाबे हमर प्रेम तोड़ी

 कतई दिन अलग डिंडा अलग 

  जन्म ठांव छोड़ी 

  हरे कोड़ा मत जाबे चांदो हमर प्रेम तोड़ी

  जाबे जहाँ पाबे कहाँ हीरा नागपूर 

  छ्हुआ बेरा खेलत रहो ईंटा पत्थर धूर 

  तोर बिना सूना सूना 

  कुईआं पोखर डाड़ी  

  जाबे जहाँ पाबे कहाँ नीरझर पानी  

  सात सुन्दर हित मधुर प्रेम वाणी 


गाने में आगे की पंक्तियां इस तरह आती हैं :

  जाबे जहाँ बनबे परदेसी      

   खड़ा में केहर नाची सरई फूल खेसी.  

 

गीत की ये पंक्तियाँ पूरे दस्तावेज़ीकरण की सबसे खास उपलब्धि हैं. फागू का अपने प्रेमी चांदो से यह कहना कि तुम्हारे जाने के बाद अखड़ा में किसके साथ नाचूंगी. सरई फूल खोस कर, बिछड़ने का यह दर्द आदिवासी इलाकों से हुए विस्थापन की पीड़ा को बहुत गहराई से व्यक्त करता है. 

यह पूरी फ़िल्म माय, माटी, मान और संघर्ष के ऐसे ही गानों से सजी हुई है जो ट्रेन यात्रा के साथ –साथ झारखंडी जीवन की यात्रा के प्रामाणिक दस्तावेज़ के रूप में सामने आती है. कई बार फ़िल्म की विधा और उसके निर्माण का तरीका भी उसके स्वरुप को निर्धारित करता है. इस आध घंटे की फ़िल्म में जैसी सहजता इसके निर्देशकों ने हासिल की उसको आप तभी पा सकते हैं जब बिना ताम झाम के लोगों के बीच खोकर दृश्यों को कैद करना शुरू करेंगे और वह कई बार सिर्फ और सिर्फ़ हिन्दुस्तानी दस्तावेज़ी फिल्मों में ही हासिल किया जा सका है. सिंगल यूनिट का कैमरा किसी निर्देशक, किसी बड़े संस्थान का कैमरा न होकर लोगों की अपनी फिल्म बनने लगता है. फ़िल्म में 19 वें मिनट के बाद जब डॉ रामदयाल मुंडा अपना गाना ख़त्म करते हैं तब एक बहुत सुन्दर दृश्य निर्देशकों ने हासिल किया है. एक गरीब प्रौढ़ महिला फ़िल्म के छायाकार को सुझाव दे रही है कि नरकोपी स्टेशन आने पर सब्जी वाले चढ़ेंगे तो सब टोकरी बगैरह का फ़ोटो खींच लीजियेगा और फिर निर्देशक उस महिला के सुझावों का बाकायदा निर्वाह भी करते हैं. ऐसा नहीं है कि निर्देशक को वो सब कैद करना मालूम नहीं रहा होगा लेकिन फ़िल्म की प्रकृति ऐसी ही कि उसमे अधिकाधिक लोगों का प्रवेश है. न सिर्फ़ तमाम दृश्यों में अपनी पूरी उपस्थिति के साथ बल्कि फ़िल्म के निर्माण में क्रिटिकल सहयोगी बनकर भी. नए हिन्दुस्तानी का सिनेमा का यह ख़ास गुण उसने अपने स्वतन्त्र होने के कारण अर्जित किया है. 

 

झारखंडी फ़िल्म बनाने की चिंता के कारण दूसरे गाने भी इसी चिंता के साथ चुने गए गए हैं. 12 वें मिनट पर एक और प्रसिद्ध लोकगायक और गीतकार मुकुंद नायक द्वारा गाया गाना गौर करने  लायक है. झारखंड बन गया है और शहर आने पर एक आदमी को अपने लोग नहीं मिलते, अपनी ही जमीन पर वह पराया हो गया है इसकी मार्मिक अभिव्यक्ति इस गाने में है.

बहुते उमंग भरी 

      आली नगरी पुराना गोतिया कर 

       मिले न बनरे 

झारखंडे बनली परदेसी निज घरे 

           घुमली रे टोली टोली 

           सब गली गली

भेटली न सहिया रे भेटली न सहिया रे 

             दुलरा यारे 

             झारखंडे बनली परदेसी निज घरे

 

यहाँ इस फ़िल्म के निर्माताओं की दृष्टि की दाद देनी पड़ेगी कि नया राज्य बनने के बावजूद इस ट्रेन की यात्रा के जरिये वे झूठे गीत फिल्माने की बजाय अपने ही घर में परदेसी बनने जैसी कड़वी बात को दर्ज कर सके. 

अब यहाँ पर यह समझना जरुरी हो जाता है कि किसी रचना का निर्माण अगर स्वतंत्र तरीके से से होता है तब क्या होता है. इसी फ़िल्म को अगर राज्य द्वारा भारी भरकम मदद मिली होती तो बहुत सम्भावना है कि मुकुंद नायक को ट्रेन में बैठाया ही नही जाता और अगर बैठाया भी जाता तो मुकुंद जी जो गा रहे होते, न तो वह उनका होता, न ही ट्रेन में सवार आम लोगों का और न ही फ़िल्म के निर्माताओं का. 

फ़िल्म में एक और गाना बहुत सुरीली बांसुरी के साथ डॉ राम दयाल मुंडा  गाते हैं जो झारखंडी अस्मिता को जाग्रत करने वाला है – ‘जागू –जागू झारखंडी जवान, उठ निज माय लागिया …. उठ उठ वीर धनु धर तीर, उठ निज माय लागिया.’  

यह फ़िल्म, 2004 में भी सिर्फ़ तीन या चार हजार रुपयों में निर्मित हुई. कुल तीन दिन की शूटिंग हो पाई थी. एक दिन अखड़ा के संगी साथियों के साथ यात्रा और बाकी दो दिन स्टेशन और ट्रेन के अन्य दृश्य.  लेकिन इतने कम संसाधनों में शूटिंग होने के बावजूद यह फिल्म अच्छी तरह से दर्शकों को फ़िल्म के मकसद से बांधे रखती है. 21 वें मिनट पर आने वाला मधु मंसूरी हंसमुख द्वारा गाया फ़िल्म का अंतिम गाना – झारखंड का कोरा, नदी नाला टाका टुकु बन रे पतरा- छायाकारी और सम्पादन का अद्भुत नमूना है. मधु मंसूरी के गाने से दृश्यों का ऐसा तालमेल बनता है मानो गाड़ी लोहरदगा मेल रेल पटरी पर दौड़ नहीं नाच रही है. एक जगह बीजू बहुत ख़ूबसूरती के साथ कैमरे को ऊपर नीचे घुमाते है जिससे ट्रेन के नाचने का रोमांच हासिल होता है. 

 

इस अंतिम गाने के साथ ही लोहरदगा का स्टेशन आता है, अंतिम फ़्रेम फ्रीज़ होता है और फ़िल्म के क्रेडिट आने शुरू होते हैं. फ़िल्म यहाँ खतम होते हुए भी ख़त्म नहीं होती. पिछले 27 मिनट में सुने 7 गाने और उससे जुड़े दृश्य हमारे मन में बस जाते हैं और सबसे बड़ी बात हमें अपनी-अपनी ट्रेन की याद आती है जैसे हिंदी कवि आलोक धन्वा को अपनी एक कविता ‘रेल’ में आयी है –  

हर भले आदमी की एक रेल होती है 

जो मां के घर की ओर जाती है  

सीटी बजाती हुई 

धुआँ उड़ाती हुई.       

यह फ़िल्म यूट्यूब पर देखी जा सकती है।  फ़िल्म का लिंकhttps://www.youtube.com/watch?v=lk9dC0Lv6kA

 


इस शृंखला में वर्णित अधिकाँश फ़िल्में यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं और जो आसानी से नहीं मिलेंगी उनका इंतज़ाम संजय आपके लिए करेंगे. 

दुनियाभर के जरुरी सिनेमा को आम लोगों तक पहुचाने का काम संजय जोशी पिछले 15 वर्षो से लगातार ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के जरिये कर रहे हैं.

संजय से thegroup.jsm@gmail.com या 9811577426 पर संपर्क किया जा सकता है -संपादक

 


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4 COMMENTS

  1. कमजोर नेटवर्क के बावजूद फिल्म देख गया। बहुत ही खुबसूरत रचना है। कैमरामैन ने तो कमाल कर दिया है। गीत तो पूछिए मत। फिलिम खतम होते होते हमें उदास कर देती है, the end के पीलेपन की तरह।

    खुबसूरत फिल्म की खुबसूरत समीक्षा।

    बधाई।

  2. संजय जोशी

    शुक्रिया सुजीत जी। लिखना सार्थक हुआ।

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