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हम सब नींद में थे, कुछ पता ही नहीं चला और विष्णु खरे ग़ुज़र गए!

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हिंदी साहित्य में अपनी तरह के अनोखे और खरे व्यक्तित्व, कवि, पत्रकार और अनुवादक विष्णु खरे का आज दोपहर क़रीब साढ़े तीन बजे निधन हो गया। वे 12 सितंबर से दिल्ली के जी.बी.पंत अस्पताल में आईसीयू में भर्ती थे। 11 सितंबर की देर रात या शायद 12 सितंबर की भोर उन्हें मस्तिष्क आघात हुआ था। उनके शरीर के बाएँ हिस्से को लकवा भी मार गया था। बहरहाल, यूँ जीवन लीला समाप्ति का कारण डाक्टरी भाषा मे ं अचानक पड़ा दिल का दौरा बताया जा रहा है। वे 78 साल के थे।

दिल्ली सरकार ने  विष्णु खरे को हाल ही में दिल्ली हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष नियुक्त किया था और इसी वजह से उनका फिर दिल्ली आना हुआ था। वरना कुछ साल पहले वे दिल्ली का सारा सरअंजाम समेटकर पहले अपने गृहनगर छिंदवाड़ा और फिर मुंबई चले गए थे। मुंबई में उनका परिवार है। बेटी प्रीति खरे, मशहूर अभिनेत्री हैं और बेटा अप्रतिम भी फ़िल्मों से जुड़ा है। उनकी छोटी बेटी जर्मनी में थीं। बीमारी की ख़बर पाकर पत्नी समेत पूरा परिवार दिल्ली आ गया था।

विष्णु खरे का अंतिम संस्कार कल यानी 20 सितंबर को दिन में 11 बजे निगमबोध घाट स्थित सीएनजी शवदाहगृह में होगा।

विष्णु खरे मयूर विहार के हिंदुस्तान अपार्टमेंट में किराये के एक कमरे में रहते थे। उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ, इसका पता 12 सितंबर की सुबह तब चला, जब दूधवाला आया। घर का दरवाज़ा खुला हुआ था। ब्रेन स्ट्रोक की जानकारी सबसे पहले उनके पड़ोसी और वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ अहमद को हुई। वे पास के निजी अस्पताल में विष्णु जी को लेकर गए, लेकिन उसने हाथ खड़े कर दिए। हारकर उन्होंने उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से संपर्क किया जिन्होंने जी.बी.पंत अस्पताल ले जाने और सारी व्यवस्था को लेकर निश्चिंत रहने का आश्वासन दिया। परवेज़ जी उन्हें अस्पताल ले गए लेकिन सी.टी स्कैन आदि के बाद डॉक्टरों ने चिंता ज़ाहिर की थी कि उन्हें लाने में विलंब हो गया है और स्थिति थोड़ी जटिल है। स्ट्रोक के छह घंटे के अंदर मरीज़ को दवाएँ न मिलें तो यूँ ख़ून में जमा थक्का घुलाना मुश्किल हो जाता है। उनका पेशाब भी नहीं रुक पा रहा था।

हाँलाकि विष्णु जी देख पा रहे थे कि उनके साथ क्या हुआ। मित्रों को पहचान रहे थे और ज़रूरत भर बोल भी पा रहे थे। ..लेकिन धीरे-धीरे वे कोमा में चले गए और फिर चले ही गए..!

विष्णु खरे का शुमार देश के बड़े हिंदी पत्रकारों में था। उन्होंने कई शीर्ष अख़बारों और पत्रिकाओं में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभाई थी। नवभारत टाइम्स से उनका लंबा जुड़ाव रहा। वे इस अख़बार के लखनऊ और जयपर संस्करणों के संपादक भी रहे। लेकिन समय के साथ पत्रकार से ज़्यादा उनकी पहचान हिंदी के एक अनोखे कवि और विचारक के रूप में हुई, जिसने कविता और विचार के तमाम पूर्व निर्धारित खाँचों को तोड़ा। 9 फ़रवरी 1940 को छिंदवाड़ा में जन्मे विष्णु खरे ने शुरुआत में इंदौर और दिल्ली के कॉलेजों में पढ़ाया भी था, लेकिन फिर शब्दों की दुनिया में रम गए।

1960 में आया टी.एस.इलियट की कविताओं का अनुवाद “मरु प्रदेश और अन्य कविताएँ” उनका पहला प्रकाशन था और 1970 में प्रकाशित ‘एक ग़ैर रूमानी समय में’ पहला काव्य संग्रह।  ‘खुद अपनी आँख से’,  ‘सबकी आवाज की परदे में’,  ‘पिछला बाकी’ और  ‘काल और अवधि के दरमियान’ उनके अन्य संग्रह हैं।

विष्णु खरे को फ़िनलैंड के राष्ट्रीय सम्मान ‘नाइट ऑफ़ दी आर्डर ऑफ़ दी वाइट रोज’ से भी सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त रघुवीर सहाय सम्मान, मैथिलि शरण गुप्त सम्मान, शिखर सम्मान, हिन्दी अकादमी दिल्ली का ‘साहित्यकार सम्मान’, मिले थे।

विष्णु जी को मीडिया विजिल की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

‘पाठांतर’ संग्रह में प्रकाशित उनकी यह कविता पढ़िए…लगेगा विष्ण खरे भविष्यदृष्टा कवि थे….जो कवि होता भी है-

 

नींद में

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कैसे मालूम कि जो नहीं रहा
उसकी मौत नींद में हुई ?

कह दिया जाता है
कि वह सोते हुए शांति से चला गया

क्या सबूत है ?
क्या कोई था उसके पास उस वक़्त
जो उसकी हर साँस पर नज़र रखे हुए था
कौन कह सकता है कि अपने जाने के उस क्षण
वह जगा हुआ नहीं था
फिर भी उसने
आँखें बंद रखना ही बेहतर समझा
अब वह और क्या देखना चाहता था ?
उसने सोचा होगा कि किसी को आवाज़ देकर
या कुछ कहकर भी अब क्या होगा ?

या उसके आसपास कोई नहीं था
शायद उसने उठने की फिर कोशिश की
या वह कुछ बोला
उसने कोई नाम लिया

मुझे कभी कभी ऐसा लगा है
कि जिन्हें नींद में गुज़र जाने वाला बताया जाता है
उसके बाद भी एक कोशिश करते होंगे
उठने की
एक बार और तैयार होने की
लेकिन उसे कोई देख नहीं पाता है

पता नहीं मुझे ऐसा शक क्यों है
कि कम से कम यदि मेरे साथ ऐसा हुआ
तो मैंने वैसे एक आख़िरी कोशिश ज़रूर की होगी
जब साँस रुक जाने के बाद भी
नाखून कुछ देर तक बढ़ते रहते हैं
तो वैसा भी क्यों मुमकिन नहीं होता होगा
क्या जो चीज़ें देखी नहीं जातीं
वे होती ही नहीं?
लिहाज़ा मैं सुझाव देना चाहता हूँ
कि अगली बार अगर ऐसा कुछ हो
कि कहना पड़े कोई सोते सोते नहीं रहा
तो यह कहा जाए
कि पता नहीं चला वह कैसे गुज़रा
जब वह नहीं रहा होगा
तब हम सब नींद में थे

क्या मालूम शायद वह ज़्यादा सही हो ?