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महज 50 वेंटिलेटर के भरोसे 5 करोड़ आबादी के इलाज का दबाव झेल रहा बनारस

बीएचयू अस्पताल समेत वाराणसी के चिकित्सालयों पर पूर्वांचल के नौ जिलों समेत पश्चिमी बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश की करीब पांच करोड़ आबादी के इलाज का भार है। इनमें करीब तीन करोड़ लोग अकेले उत्तर प्रदेश से हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को वाराणसी के लोगों से विशेष संवाद के दौरान लॉकडॉउन और सोशल डिस्टेंसिंग पर ज्यादा जोर दिया लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाये जाने और सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता पर कोई ठोस बात नहीं की। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट कहा है कि कोरोना वायरस की चुनौती से निपटने के लिए लॉकडाउन काफी नहीं है, जरूरी है कि स्वास्थ्य सुविधाएं सुदृढ़ की जाएं। आसपास के दर्जन भर जिलों से वाराणसी में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या के अनुपात में यहां स्वास्थ्य सुविधाओं का बहुत बुरा हाल है, जबकि यह प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है। प्रधानमंत्री के संबोधन से इतर ज़मीनी हक़ीकत से रूबरू कराती रिपोर्ट। (संपादक)


बीते 16 मार्च को सोनभद्र के मधुपुर बाजार निवासी सुरेंद्र गुप्ता के 55 वर्षीय पिता कृष्णानंद गुप्ता के सीने में तेज़ दर्द हुआ। कुछ ही देर में उनकी सांसें तेज़ हो गयीं। परिवार के लोग घबरा गये। उन्होंने सुरेंद्र गुप्ता को इसकी जानकारी दी। वे तुरंत साधन की व्यवस्था कर अपने पिता को लेकर वाराणसी स्थित सर सुंदरलाल चिकित्सालय (बीएचयू हॉस्पिटल) पहुंचे। उन्होंने आपातकालीन चिकित्सा वार्ड में उन्हें भर्ती कराया। उसके बाद उनके साथ जो हुआ, उसने बीएचयू हॉस्पिटल के बारे में उनकी राय ही बदल दी।

सुरेंद्र गुप्ता बताते हैं, “सोमवार (16 मार्च) की शाम पिताजी को इमरजेंसी में भर्ती कराये। मंगलवार को सुबह से ही वे दौड़ा डाले। चिकित्सकों नें हार्ट की जांच कराने को कहा। एक घंटा लाइन में लगने के बाद उनके हार्ट की जांच हुई। जांच रिपोर्ट में हार्ट से संबंधित समस्या नहीं निकली। उनकी सांसें तेज़ हो रही थीं। फिर उन्होंने कहा कि फेफड़े की जांच कराइए। फेफड़े की जांच कराने के बाद कहे कि न्यूरो में ले जाइए। उनकी हालत सीरियस हो रही थी। उनकी सांस फूलने लगी थी। उन्हें दिक्कत होने लगी, लेकिन यहां कोई सुनवाई नहीं। चिकित्सकों ने ऑक्सीजन तक नहीं लगाया। उसके बाद हम उन्हें लेकर निजी अस्पताल चले गये”।

वे आगे बताते हैं, “मंगलवार को मैं बहुत दौड़ा… सुबह से लेकर दोपहर बाद तीन बजे तक मैं स्ट्रेचर पर उन्हें लेकर दौड़ता ही रह गया। बहुत दौड़ाते हैं सब। स्ट्रैचर लेकर मैं दौड़ता-दौड़ता परेशान हो गया”।

चिकित्सकों के व्यवहार पर वे कहते हैं, “किसी भी डॉक्टर ने पिताजी को देखा तक नहीं। वे केवल रिपोर्ट देखकर यह जांच, वह जांच कराओ, कहते थे। केवल वे कमरा नंबर बताते थे। उनकी सांस फूलने लगी थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं… बीएचयू में जिसका सोर्स नहीं है, वह दौड़ता-दौड़ता मर जाएगा। आदमी ऐसे ही मर जाएगा”।

सुरेंद्र गुप्ता ने बताया कि बीएचयू से निकालकर पिताजी को वे डाफी स्थित मैक्सवेल अस्पताल ले गये जहां चिकित्सकों ने उन्हें वेंटिलेटर पर रखा। वहां एक दिन का खर्च तीस हजार रुपये से ज्यादा आ जाता था। पंद्रह हजार रुपये केवल अस्पताल का खर्च था। शेष दवाइयों पर खर्च होता था। वे बताते हैं कि 22 मार्च तक उन्होंने पिताजी को मैक्सवेल अस्पताल में रखा।

“पैसा खत्म हो गया था, तो एक परिचित से बातचीत कर के पैसे बाद में देने की बात पर रामनगर स्थित श्री साईंनाथ अस्पताल में भर्ती कराया हूं। अब वे ठीक हैं। उन्हें वेंटिलेटर से बाहर निकालकर ऑक्सीजन पर रखा गया है।”

सुरेंद्र गुप्ता आर्थिक रूप से कुछ ठीकठाक थे तो कृष्णानंद गुप्ता का इलाज निजी अस्पताल में हो रहा है और वे जिंदा हैं, लेकिन चंदौली के 70 वर्षीय लक्खू प्रजापति और 60 वर्षीय राजा राम ऐसे खुशनसीब नहीं थे। चंदौली के जयप्रकाश नगर निवासी लक्खू प्रजापति को बीते 22 जनवरी को ब्रेन हैमरेज हुआ तो उनके बेटे राम नारायण प्रजापति अपने पिता को लेकर बीएचयू आये। उन्हें आपातकालीन चिकित्सा वार्ड में भर्ती कराया। सीटी स्कैन और रक्त जांच के बाद चिकित्सकों ने पाया कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखे जाने की आवश्यकता है, लेकिन अगले दिन तक वेंटिलेटर की व्यवस्था नहीं हो सकी।

लक्खू प्रजापति का पंजीकरण स्लिप

खेती-बाड़ी कर परिवार जीवनयापन करने वाले लक्खू प्रजापति के बेटे राम नारायण प्रजापति बताते हैं, “बीते 22 जनवरी को पिताजी का ब्रैन हैमरेज हो गया तो हम पहले उन्हें स्थानीय पं. कमलापति त्रिपाठी संयुक्त जिला चिकित्सालय ले गये। वहां चिकित्सकों ने उन्हें वाराणसी रेफर कर दिया तो हम उन्हें लेकर बीएचयू अस्पताल ले गये। इमरजेंसी में भर्ती कराया। अगले दिन न्यूरो सर्जन को भी दिखाया तो उन्हें कहा कि अगर चार दिनों तक यह जिंदा रह जाते हैं तो ऑपरेशन के बारे में सोचा जा सकता है। फिलहाल इन्हें अभी वेंटीलेटर पर रखने की जरूरत है लेकिन हमारे यहां वेंटीलेटर खाली नहीं है।”

वे बताते हैं कि आपातकालीन वार्ड में चिकित्सक 23 जनवरी की सुबह बेड खाली कराने लगे। उनका कहना था कि कोई वेंटिलेटर खाली नहीं है। हारकर हम पिताजी को लेकर घर आ गये और वे दो दिनों तक जिंदा रहे लेकिन बीती 24 जनवरी की उनकी मौत हो गयी। राम नारायण प्रजापति कहते हैं कि अगर बीएचयू में वेंटिलेटर मिल गया होता तो पिताजी जिंदा होते।

कुछ ऐसा ही वाकया चंदौली के सवैयां गांव निवासी राजा राम के साथ हुआ था। उनके बेटे अश्वनी कुमार बताते हैं कि 2015 में 16 सितंबर को पिताजी को ब्रेन हैमरेज हुआ था। उन्हें बीएचयू अस्पताल लेकर गये। हालत गंभीर होने के बाद भी चिकित्सकों ने उन्हें आईसीयू में वेंटिलेटर पर नहीं रखा। अगले दिन शाम को उनकी मौत हो गयी।

ये तीनों घटनाएं बीते चार साल के दौरान सामान्य दिनों में घटी हैं और तीनों ही पूर्वांचल के सबसे बड़े चिकित्सालय ‘सर सुन्दरलाल चिकित्सालय (बीएचयू अस्पताल) से जुड़ी हैं।

देश इस समय कोरोना वायरस (कोविड-19) की चपेट में है और पूर्वांचल में बीएचयू अस्पताल इसकी जांच और इलाज का मुख्य केंद्र है लेकिन आम आदमी के लिए यहां की स्वास्थ्य सुविधाएं हवा-हवाई ही साबित हो रही हैं। यहां आने वाले आम नागरिक को गंभीर से गंभीर स्थिति में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो पाता है जिसकी वजह से उसकी जान चली जाती है। सर सुन्दरलाल चिकित्साल के आपातकालीन चिकित्सा कक्ष के अधीन एनआइसीयू में कुल 16 वेंटिलेटर (जीवन रक्षक प्रणाली) हैं लेकिन यह सामान्य दिनों में आम नागरिक को मुहैया नहीं हो पाता है जिसका प्रमाण उपरोक्त घटनाएं हैं। जब भी वहां के प्रभारियों से बात की जाती है तो वे कहते हैं कि वेंटिलेटर खाली नहीं है। आखिरकार वेंटीलेटर पर कौन भर्ती रहता है? यह जांच का विषय है। हो सकता है, इसकी एक वजह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों, छात्रों और उनके रिश्तेदारों की भारी संख्या का होना हो जो 50 हजार के करीब है जिनमें 30 हजार तो केवल छात्र-छात्राएं ही हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. ओम शंकर का कहना है कि कोविड-19 से पीड़ित व्यक्ति के लक्षणों पर गौर करें तो इसके मरीजों के लिए बड़े पैमाने पर वेंटिलेटर की ज़रूरत होगी। अगर कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ी तो वाराणसी में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो पाएंगे। बीएचयू में तो सामान्य दिनों में आने वाले मरीजों को ही वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं।

वाराणसी में कोरोना वायरस से पीड़ित मरीज़ मिलने के बाद से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, चिकित्सकों और कर्मचारियों में दहशत का माहौल है। वे मरीजों को अटेंड तक नहीं कर रहे हैं। ऐसा ही एक मामला बीते 21 मार्च को सामने आया। हुकुलगंज क्षेत्र के बघवानाला के पास स्थित बस्ती निवासी एक महिला अपने बच्चे के बीमार होने पर उसका इलाज कराने जिला चिकित्सालय और बीएचयू ले गयी। वहां मना होने पर वह बच्चे को कबीरचौरा स्थित शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय लेकर पहुंची। वहां एक कर्मचारी के सामने उसका रोता हुआ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है।

वायरल वीडियो में बीमार बच्चे के परिजनों यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे पहले पांडेयपुर स्थित दीनदयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय और बीएचयू अस्पताल गये थे जहां चिकित्सकों ने बच्चे का इलाज करने से मना कर दिया। इसके बाद वे कबीरचौरा स्थित मंडलीय अस्पताल आये हैं। स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सकों और कर्मचारियों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया वीडियो में साफ दिख रहा है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी स्थित चिकित्सालयों का हाल है। बता दें कि कबीरचौरा अस्पताल में एक भी वेंटिलेटर नहीं है।

बीएचयू अस्पताल समेत वाराणसी के चिकित्सालयों पर पूर्वांचल के नौ जिलों समेत पश्चिमी बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश की करीब पांच करोड़ आबादी के इलाज का भार है। इनमें करीब तीन करोड़ लोग अकेले उत्तर प्रदेश से हैं। भारत सरकार के आंकड़ों की मानें तो 2011 में वाराणसी (36,76,841), चंदौली (19,52,756), जौनपुर (44,94,204), मिर्जापुर (24,96,970), सोनभद्र (18,62,559), भदोही (15,78,213), गाजीपुर (36,20,000), बलिया (32,39,774) और आजमगढ़ (46,12,000) की कुल आबादी दो करोड़ 75 लाख 33 हजार 317 थी। बीएचयू अस्पताल इन सभी जिलों के बाशिंदों के इलाज का प्रमुख केंद्र है।

अगर कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्तियों के लिए जरूरी वेंटिलेटर (जीवन रक्षक प्रणाली) की बात करें तो उपरोक्त नौ जिलों के सरकारी चिकित्सालयों में 50 वेंटिलेटर भी नहीं हैं। जिला प्रशासन निजी चिकित्सालयों की सुविधाओं के भरोसे कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति को राहत देने का दावा कर रहा है जहां गरीब एवं मध्यम परिवार के लिए इलाज कराना संभव नहीं है। सरकार ने कोरोना वायरस की जांच के लिए 4,500 रुपये की दर निर्धारित कर दी है जो दिहाड़ी मजदूरों के लिए बहुत ही ज्यादा है।

वाराणसी जिला प्रशासन ने कोरोना वायरस के प्रभाव से लड़ने के लिए जिला स्तर पर एक कमेटी बनायी है जो स्वास्थ्य सुविधाओं की समीक्षा करेगी। मंगलवार को कमेटी की बैठक हुई। मीडिया को बैठक की जानकारी देते हुए जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने बताया कि कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों के लिए विभिन्न अस्पतालों में 400 बिस्तरों के आइसोलेशन वार्ड की व्यवस्था की गयी है। दीनदयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय और ईएसआइसी सुपर स्पेशलियटी हॉस्पिटल पूरी तरह से कोरोना वायरस पीड़ित मरीजों के लिए सुरक्षित किये गये हैं। जिलाधिकारी का दावा है कि शहर के 47 सरकारी और निजी चिकित्सालयों में कुल 160 वेंटिलेटर को चिह्नित किया गया जहां कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति का इलाज कराया जाएगा।

वेंटिलेटर की व्यवस्था के बारे में मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. वीबी सिंह ने बताया कि वाराणसी के सरकारी चिकित्सालयों में कुल 51 वेंटिलेटर कार्य कर रहे हैं। इनमें 37 वेंटिलेटर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान द्वारा संचालित सर सुन्दरलाल चिकित्सालय, ट्रामा सेंटर और सुपर स्पेशलियटी सेंटर में हैं। ईएसआइसी सुपर स्पेशलियटी हॉस्पिटल में कुल चार वेंटिलेटर हैं लेकिन दो ही कार्य कर रहे हैं। दीनदयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय में 10 वेंटिलेटर की व्यवस्था की गयी है जो कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कबीरचौरा स्थित शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय में दो वेंटिलेटर होने की बात भी कही, हालांकि इस बारे में वे सुनिश्चित नहीं हो पाए।

अस्पताल के वरिष्ठ सर्जन ने नाम नहीं छापने पर बताया कि मंडलीय चिकित्सालय में एक भी वेंटिलेटर नहीं है। इसके अलावा वाराणसी के किसी भी सरकारी चिकित्सालय में वेंटिलेटर नहीं है। अगर पूर्वांचल के सोनभद्र, चंदौली, मिर्जापुर, जौनपुर, गाज़ीपुर, आज़मगढ़, बलिया और भदोही जनपदों में स्थित सरकारी चिकित्सालयों की बात करें तो मिर्जापुर को छोड़कर किसी भी जनपद में वेंटिलेटर नहीं है। मिर्जापुर के मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक जनपद के मंडलीय चिकित्सालय में दो वेंटिलेटर हैं।

पूर्वांचल के नौ जिलों की करीब तीन करोड़ आबादी के लिए अभी तक कुल 51 वेंटिलेटर ही उपलब्ध हैं जबकि स्वास्थ्य सुविधाओं पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की गाइडलाइन्स कहती हैं कि अस्पतालों में उपलब्ध बेड का कम से कम 20 प्रतिशत बेड वेंटिलेटर होना चाहिए। डब्ल्यूएचओ का मानक अस्पतालों में उपलब्ध बेड के 40 प्रतिशत तक वेंटिलेटर बेड की व्यवस्था करने का निर्देश देता है। इन परिस्थितियों में सरकारी अमला कोरोना वायरस से लड़ने का जो दावा कर रहा है, वह विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता है। विदेशों में कोरोना वायरस के प्रभाव को देखते हुए जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें ज्यादा से ज्यादा वेंटिलेटर की व्यवस्था करें। तभी कोरोना के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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