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‘आरक्षण बचाओ’ मंच से हूट हुए उदित राज, अम्बेडकर पर टिप्पणी से नाराज़ शिक्षकों ने छीना माइक

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अहमर खान 

यूजीसी द्वारा जारी रोस्टर संबंधी एक आदेश के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्‍टी ऑफ आर्ट्स के गेट के आगे बीते 19 मार्च से धरने पर बैठे SC/ST/OBC शिक्षकों के मंच जाइंट एक्शन कमिटी फॉर सेव रिज़र्वेशन की भूख हड़ताल समाप्त होने के ऐन वक़्त 25 मार्च की शाम जब बीजेपी सांसद उदित राज यहां पहुंचे, तो अच्‍छा -खास बवाल कट गया। उदित राज के बयानों पर शिक्षकों ने आपत्ति जतायी और माहौल अराजकता की हद तक पहुंच गया।

हाल ही में एक रोस्टर संबंधी आदेश केंद्रीय विश्वविद्यालयों को जारी किया गया है जिसके मुताबिक अब विश्वविद्यालयों में विभाग को एक यूनिट मानकर उसमें खाली पड़े पदों को भरा जाएगा। गौरतलब है कि इस आदेश को सरकार ने 24 घंटे के अंदर यूजीसी को दिशानिर्देश जारी कर लागू करवा दिया। इस आदेश के बाद अब यूनिवर्सिटी में आरक्षित पदों पर होने वाली नियुक्तियाँ लगभग न के बराबर हो जाएंगी। मसलन जानकारों के मुताबिक यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में विभागों का आकार बहुत छोटा है, कुछ विभागों में तो 3 से 4 पद ही हैं। यानि रोस्टर के मुताबिक विभाग को एक इकाई मान लेने के बाद अब आरक्षित पद कहीं बचते ही नहीं है।

इस आदेश के खिलाफ DUTA ने 12 मार्च से 16 मार्च तक काला दिवस और हड़ताल मनाने की घोषणा की। इसी क्रम में दलितों और पिछड़ों की नुमाइंदगी का दावा करने वाली एक कमेटी JACSR (जाइंट एक्शन कमिटी फॉर सेव रिज़र्वेशन) गठित हुई जिसमे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ SC/ST/OBC शिक्षक शामिल है। इस कमेटी ने 19 मार्च से 23 मार्च तक क्रमिक भूख हड़ताल की घोषणा की और दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी  ऑफ आर्ट्स के गेट के आगे धरने पर बैठ गए।

इस मंच पर काँग्रेस और भाजपा के कई सांसद आए और अपनी बात रख कर गए लेकिन 25 मार्च की शाम मंच पर मामला अराजकता की हद तक पहुँच गया जब भाजपा सांसद उदित राज भूख हड़ताल स्थल पर हड़ताल समाप्त होने के ऐन वक़्त अपनी बात कहने इस मंच पर पहुंचे। मनुवाद की मुखालफत करने वाले इस मंच पर उदित राज के पहुँचते ही उनके साथ कुछ कुछ तिलकधारी भी मंच पर आसीन हो गए थे। कुछ उदित राज के कथन और कुछ मंच पर बिगड़े गए संतुलन ने महफिल का रंग बदल दिया। काफी मशक्कत के बात उदित राज दोबारा बोल पाये लेकिन मजमा हाथ से बाहर जा चुका था।

अपनी बात कहने के क्रम में उदित राज ने सबसे पहले अपने संघर्षों को गिनवाया जिसमे FYUP सबसे प्रमुख था। उदित ने दावा किया कि बिना किसी दलित संगठन की मदद लिए बिना उन्होने ये लड़ाई लड़ी और नन्दिता नारायण से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के हर तबके को जोड़ कर उन्होने इस लड़ाई को जीता। इसके साथ ही आरक्षण विरोधी नीतियों के लिए उन्होने जातिवादी न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराया। उदित राज ने खुद को पहला सांसद बताया जिसने 70 साल में सबसे पहले निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने संबंधी बिल को संसद में पेश किया।

अपने भाषण के दौरान उदित राज ने एक सांस में कुछ ऐसे सार्वजनिक उद्यमों के बारे में बताया जिनको हाल ही में सरकार निजी क्षेत्र को बेच चुकी है और बेचने की तैयारी में है। अब चूंकि सब कुछ निजी हाथों में जाने वाला है इसलिए डांट भरे लहजे में उदित राज ने चेताया कि “आपके लिए सारे रास्ते बंद होने जा रहे है, इसलिए पहले अपने अधिकार को किसी तरह से सत्ता से हासिल कर लो विचारधारा की लड़ाई बाद में देखी जाएगी।” दूसरे शब्दों में ये सरकार निजीकरण कर के रहेगी, ज़ाहिर है आरक्षण समाप्त होके रहेगा, इसलिए जो बचा है उसको किसी भी तरह हासिल किया जाए चाहे इसमे वैचारिक समझौता क्यूँ न करना पड़े।

इसके अलावा उदित राज ने कुल तीन संस्थानो को आरक्षण खत्म करने का दोषी ठहराया जिसमे न्यायपालिका, कॉर्पोरेट और मीडिया शामिल है। बक़ौल उदित राज मीडिया बाहर से ट्रायल करती है जिसके चलते जनता आरक्षण विरोधी हो चली है, न्यायपालिका पहले से ही जातिवादी फैसले देती आई है और बाकी बची कसर कॉर्पोरेट पूरी कर देता है जो निजीकरण के जरिये आरक्षण को ठिकाने लगा रहा है। अगर उदित राज की मानें तो इस समय कार्यपालिका के वश में कुछ खास नहीं है। अपने कथन को पुष्ट करने के क्रम में उदित राज न्यायपालिका की स्वायत्ता पर सवाल उठाने की हद तक चले गए और न्यायधीशों की नियुक्ति के अधिकार को कार्यपालिका के हाथों में सौपें जाने की वकालत करने लगे।

अपनी पॉलिटिकल लोकेशन को जस्टिफ़ाई करने और अपनी बात को पुष्ट करने के मकसद से उदितराज ने अंबेडकर का उदाहरण दिया और पूछा कि क्या अंबेडकर काँग्रेस में शामिल नहीं हुए थे? इस बात पर मंच पर बैठे हड़ताली शिक्षक भड़क उठे, चारों तरफ बहस का माहौल गरम हो गया, शिक्षकों ने उदित राज को अपनी बात वापस लेने के लिए कहने कहा। लेकिन उदित राज अपनी बात वापस लेने के बजाए विरोध कर रहे शिक्षकों को डांट कर मंच से भगाने की बात कही। अफरातफरी के माहौल में उदित राज से माइक ले लिया गया। मंच दो फाड़ हो गया – एक जिसने उदित राज को आमंत्रित किया था और जो सत्ता के साथ बराबर करीबी बनाए हुए है, दूसरे वो लोग थे जो उदित राज के कथन और राजनीतिक स्टैंड से खफा हैं।

आनन-फानन में उदित राज को धन्यवाद ज्ञापन दिया गया लेकिन एक समझदार ने जाते-जाते आखिरी सवाल दाग ही दिया कि क्या आप संसद में इस आदेश के खिलाफ धरना देंगे। माननीय सांसद का जवाब फिर से असंतुलित और नाराजगी भरा था कि “मुझे जो करना होगा वो मैं करूंगा, आप से ज़्यादा मैं करता हूँ”।

 

धरना मंच पर बैठे एक शिक्षक ने अपना नाम न छापने कि शर्त पर बताया कि असल मामला कुछ यूं है कि इस मामले को DUTA (दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स असोशिएशन) की मौजूदा वामपंथी यूनियन काफी मज़बूत तरीके से उठा रही है और उसने एक बार JACSR (जाइंट एक्शन कमिटी फॉर सेव रिज़र्वेशन) के साथ मिल के प्रदर्शन भी किया लेकिन अपनी खुद की राजनीतिक ज़मीन बनाने के मकसद से सत्ता के करीबी कुछ दलित पिछड़े शिक्षकों ने DUTA का बहिष्कार कर दिया और JACSR के बैनर तले आंदोलन चलाने की घोषणा की। इसके चलते JACSR का संख्याबल बहुत कम हो रह गया है।

एक अन्य शिक्षक ने बताया कि भाजपा एवं अन्य राजनीतिक दलों के करीबी दलित पिछड़े शिक्षक अपने अपने दल के नेताओं को इस मंच का लाभ देने और अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता चमकने के चलते इस मंच पर आमंत्रित करते है इसलिए ऐसा होता है कि मंच से सांसद हूट होते हैं और अराजकता का माहौल पैदा हो जाता है।