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Special Report: ‘ये डाटा क्या कहलाता है’- गुमराह करती भारत सरकार की प्रेस कांफ्रेंस

कोरोना के बढ़ते संक्रमण के समय, सरकार केवल हमको गुमराह कर रही है। न केवल आईसीएमआर की गाइडलाइंस को बदल कर, रिकवरी रेट को लगभग कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा रहा है। ज़्यादा बुरा ये है कि सरकार की ओर से नौकरशाही को जनता को गुमराह करने के लिए आगे कर दिया गया है। सरकार की प्रेस कांफ्रेंस में, दूसरे देशों से रिकवरी रेट की तुलना की बात तो कह दी जाती है - लेकिन ये छिपा लिया जाता है कि दूसरे देश टेस्टिंग कितनी कर रहे हैं और वो आईसीएमआर की नहीं, WHO की गाइडलाइंस का पालन कर रहे हैं। पढ़िए सौम्या गुप्ता की स्पेशल रिपोर्ट

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जॉर्ज औरवेल की मशहूर किताब ऐनिमल फ़ार्म में एक अहम किरदार का नाम स्क्वीलर(चिल्लाने वाला) है। किताब की कहानी में स्क्वीलर का काम होता है, सरकार की तरफ़ से घोषणाएँ करना, फ़ार्म की जनता से बात करना और तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करना। स्क्वीलर इतनी निपुणता से सरकार की तरफ़ से भाषण देता है कि, जनता के लीडर नेपोलियन, को जनता के बीच में आने के ज़रूरत ही नहीं पड़ती। ऐसे ही, कभी-कभार जब आईसीएमआर (ICMR) और स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रतिनिधि प्रेस कॉन्फ़्रेन्स करते हैं तो स्क्वीलर बड़ा याद आने लगता है। फिर नेपोलियन की तरह ही हमारे लीडर भी कहाँ हमसे बात करते हैं, वे तो सिर्फ़ राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं। सरकार की ओर से 2 जून को जो प्रेस कॉन्फ़्रेन्स हुई, उसको सुनकर आपका मनोबल भी लॉक्डाउन तोड़ कर सातवें आसमान पर चला जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रतिनिधि लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान कोरोना वाइरस से सम्बंधित बहुत सारा डाटा दिया और ये तक कह दिया की कोरोना से होने वाले नुक़सान को देश ने बड़ी सफलता से नियंत्रण में कर लिया है। 

वो कैसे इस निष्कर्ष पर पहुँचे, उसके पीछे गार्ट्नर कम्पनी के पूर्व उपाध्यक्ष पाओलो मग्रस्सी की एक बात याद आती है “अगर कोई डाटा को शिद्दत से तड़पाए या कुरेदे, तो वो मन चाहा कुछ भी उगल सकता है।”

 

लव अग्रवाल ने कॉन्फ़्रेन्स में कहा कि भले ही भारत संक्रमण की संख्या में दुनिया में सातवें पायदान पर पहुँच गया है, लेकिन अब भी हमारे हालात दूसरे देशों से बहुत बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि हमारी रिकवरी रेट और देशों के मुक़ाबले बहुत बेहतर है और हमारी केस फ़टैलिटी रेट(CFR,केस की मृत्यु दर) भी काफ़ी कम हैं।उनके मुताबिक़ ये सब सरकार के लगातार टेस्टिंग और ट्रेसिंग के प्रयासों की वजह से सम्भव हुआ है।इसी कॉन्फ़्रेन्स में ICMR की प्रतिनिधि ने बताया कि देश अब बड़ी संख्या में टेस्टिंग करने के लिए तैयार है। देश में अब कई कम्पनी RNA किट्स और RTPCR किट्स का उत्पादन कर रही है।

सरकार टेस्टिंग कर रही है, तो सरकार की भी टेस्टिंग कर लेते हैं 

लव अग्रवाल ने कहा कि ये अच्छी रिकवरी रेट, टेस्टिंग और ट्रेसिंग का नतीजा है। उन्होंने ये भी कहा कि हमें आँकड़े अपनी जनसख्या के हिसाब से देखने चाहिए और यूँ ही नहीं दूसरे देशों से तुलना करनी चाहिए।डाटा के माध्यम से हम इन बातों को थोड़ा और समझना चाहते हैं। रिकवरी रेट को कैल्क्युलेट करने का तरीक़ा है कि प्रति 100 केस में कितने लोग ठीक हुए। 


ऊपर दिए ग्राफ़ के मुताबिक़ दुनिया में सबसे ज़्यादा संक्रमित दस देशों में हमारी टेस्टिंग सबसे कम है। हमारे 26 जनवरी के मेहमान बोलसेनारो का देश ब्राज़ील(4378/मिलियन) और हमारे प्रधानमंत्री के क़रीबी दोस्त ट्रम्प का देश(55,008/मिलियन) भी हमसे ज़्यादा टेस्टिंग कर रहे हैं। तो फिर जब लव अग्रवाल दावा करते हैं कि टेस्टिंग और ट्रेसिंग की वजह से हमारी रिकवरी रेट अच्छी है – तो वो कौन सी टेस्टिंग की बात कर रहे हैं? दूसरा, क्योंकि ये तुलना हम प्रति दस लाख या एक मिलियन पर कर रहे हैं तो शायद जनसंख्या वाले सवाल का भी हमने एक हद तक ध्यान रखा है। तीसरी बात इन दस देशों में भी जर्मनी(90%) और इटली(68%) की रिकवरी रेट हमारी 48% रेट से काफ़ी बेहतर है। ये दोनो देश हमसे ज़्यादा टेस्टिंग भी कर रहे हैं।

ICMR की प्रतिनिधि ने कहा कि अब हम टेस्ट करने में ज़्यादा सक्षम हैं। तो फिर क्यों अब भी  सिर्फ़ यमन, सूडान , म्यांमार, ईथीयोपिया, बांगलादेश और ईजिप्ट जैसे कुछ 40 देश ही हमसे कम टेस्टिंग कर रहे हैं? इसलिए शायद लव अग्रवाल की इस बात पर कि हम और देशों के मुक़ाबले बेहतर स्थिति में है, प्रशनचिन्ह लग जाता है।

टेस्टिंग को समझने के लिए हमने देश के कुछ राज्यों के टेस्टिंग के आँकड़ो पर भी कुछ विश्लेषण किया है। जैसे कि उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र का ये ग्राफ़ देखिए।

महाराष्ट्र के आँकड़ो को ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि महाराष्ट्र ने 11 मई को अपनी टेस्टिंग की संख्या को पिछले दिन के मुक़ाबले 6,500 से घटा कर 2,25,524 से 2,18,914 कर दिया था। ये अद्भुत बात है कि उन्हें एक दिन बाद एहसास हुआ कि उनने कम टेस्ट्स करें हैं। ट्विटर पर कई लोगों ने इस पर सवाल भी उठाए, कुछ का मानना है कि ICMR के निर्देशों कि वजह से ये अंतर आया था। पर दूसरे राज्यों में तो ये देखने को नहीं मिला।तो इस तरह के अंतर के चलते हमारी टेस्टिंग के आँकड़ो पर संदेह होना निश्चित है। 

अनगिनत रिकवरी और गिनती की टेस्टिंग? 

लव अग्रवाल ने कहा कि देश में रिकवरी रेट जो 15 अप्रैल को सिर्फ़ 11.42% था, वो तीन मई को बढ़कर 26.59% हुआ, फिर 18 मई को बढ़कर 38.29 और दो जून को वो 48.09% हो चुका है। परंतु इस डाटा को एक और संदर्भ में समझना चाहिए कि 8 मई को ICMR ने टेस्टिंग और डिस्चार्ज की नयी गाइड्लाइन जारी कर दी थी। नीचे दिए गए चित्र में उस गाइड्लाइन का ब्योरा है। नयी गाइड्लाइन के अनुसार कम लक्षण (सिम्प्टम्प्स) वाले लोगों को अगर लगातार 10 दिन तक कोई दिक्कत नहीं होती और 3 दिन तक कोई बुखार नहीं आता तो उन्हें बिना टेस्टिंग के भी डिस्चार्ज कर सकते हैं।

ICMR की नई गाइडलाइन्स

परंतु ऐसा क्यों करना पड़ रहा है जबकि विशेषज्ञों में इस बात को लेकर काफ़ी विवाद और मतभेद है कि सिम्प्टम ना दिखने के बाद भी कितने दिन तक मरीज़ दूसरों को संक्रमित कर सकता है। तो अगर बिना टेस्टिंग के हम लोगों को डिस्चार्ज कर देंगे तो रिकवरी रेट में तो बढ़ोतरी होगी लेकिन संक्रमण फैलने के आसार भी बढ़ सकते हैं। और तो और इस मामले में WHO की गाइडलाइंस कुछ और ही कहती हैं। WHO के दिशानिर्देश स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि किसी भी हाल में कोरोना के मरीज़ के जब तक दो टेस्ट नेगेटिव न आ जाएं, उसे रोग मुक्त नहीं माना जा सकता है। 

क्या कहता है WHO?

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने नए निर्देश इसलिए दिए क्योंकि हमारे पास शायद पर्याप्त मात्रा में किट्स नहीं मौजूद हैं, पर कॉन्फ़्रेन्स में तो ICMR की प्रतिनिधि ने कहा था कि हमारे पास अब टेस्ट किट्स की कोई कमी नहीं है। सरकार की कथनी और करनी में कुछ तो अंतर है।

दूसरा सरकार ने निर्देश दिए हैं कि अब जिन लोगों को कम या ना के बराबर सिम्प्टम हैं उन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं किया जाएगा। उन्हें या तो घर में क्वॉरंटीन होना होगा या अर्बन हेल्थ सेंटर के वार्ड में। घर में अलग अलग कमरे और बाथरूम की सुविधा सबके पास नहीं होती है और अर्बन हेल्थ सेंटरो की व्यव्यस्था पर कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ डॉक्टरों ने कहा है कि ये काफ़ी अच्छा क़दम है क्योंकि इससे जो लोग ज़्यादा बीमार हैं उनके लिए अस्पतालों में पर्याप्त तौर पर बेड और साधन उपलब्ध हो पाएँगे। तो क्या साधनो की कमी है? पर ICMR और स्वास्थ्य मंत्रालय ने तो बताया था कि पिछले चार महीने से सरकार भरपूर तैयारी कर रही है हर परिस्थिति के लिए, तो फिर कम साधन की बात क्यों सामने आ रही है?

थोड़ा और डाटा समझें?

टेस्टिंग को और समझने के लिए हमने देश के उन राज्यों के टेस्टिंग के आँकड़े निकाले जिनका रिकवरी रेट देश की औसत दर(48%) से भी ज़्यादा थी। नीचे दिए गए ग्राफ़ की मदद से हम कुछ और सवाल उठाना चाहते हैं,


देश में पंजाब की रिकवरी रेट 86% से भी ज़्यादा है। ये रेट लगभग जर्मनी जितनी है और देश की औसत दर की लगभग दुगुनी भी है।जर्मनी की जनसख्या पंजाब के मुक़ाबले ढाई गुना है जबकि उनकी टेस्टिंग पंजाब के मुक़ाबले 40 गुना है। दूसरी बात पंजाब में 29 मई के बाद हर दिन कम टेस्ट्स हो रहे हैं। चलिए मान लेते हैं कि अब डिस्चार्ज करने से पहले टेस्ट्स नहीं करने हैं, पर इसका मतलब ये तो नहीं है कि हम अपनी ट्रेसिंग और टेस्टिंग में कमज़ोर पड़ जाएँ। क्योंकि ICMR की नयी गाइड्लाइन से पहले पंजाब में दिन के कभी 187, तो कभी 214 तो कभी 330 मामले सामने आ रहे थे, जो अब घट कर सिर्फ़ 30 या 40 हो गए हैं। इसका एक मतलब तो ये हो सकता है कि अब संक्रमण उतनी तेज़ी से नहीं फैल रहा और कर्व फ़्लैट हो गया है। परंतु कम टेस्ट्स करके कर्व फ़्लैट होने की कोई पक्की गारंटी नहीं है। और प्रशासन के हिसाब से अब किट्स की कमी भी नहीं है और फिर जो किट अब डिस्चार्ज होने वाले लोगों पर नहीं इस्तेमाल हो रहे उनको हमें ट्रेसिंग और टेस्टिंग के लिए तो प्रयोग में लाना ही चाहिए।

आँकड़ो में हेरफेर की बात हो तो ना चाहते हुए भी गुजरात पर तो बात करनी ही पड़ती है। गुजरात में एक तरफ़ रिकवरी रेट 68% के क़रीब है, तो वहाँ मृत्यु दर 6.19% भी लगभग देश की दुगुनी है। मतलब अगर सरल शब्दों में कहें तो वहाँ लोग जल्दी ठीक भी हो रहे हैं और जल्दी मर भी रहे हैं। तो या तो वहाँ हालात बहुत अच्छे हैं या बहुत ख़राब। गुजरात में तो “चित्त” भी मेरी और ‘पट’ भी मेरी वाली स्थिति हो गयी है।

गुजरात के आंकड़े, जो बिल्कुल सरकारों के विज्ञापनों और हकीकत की तरह विरोधाभासी हैं

अगर नीचे दिए गए पश्चिम बंगाल के आँकड़ो को देखे तो 20 मई को वहाँ आए तूफ़ान के बावजूद भी उन्होंने टेस्ट कम नहीं किए हैं हालाँकि ज़्यादा भी नहीं किए हैं। शायद इसके पीछे मोदी जी का बंगाल का टूर रहा होगा, न्यूज़ चैनलों से आग्रह है की वो इस तरह की ख़बर चला सकते हैं। वैसे भी मोदी है तो मुमकिन है।

बंगाल के टेस्ट के आंकड़े, जो लगभग एक से ही हैं

प्रशासन और सरकार लगतार सिर्फ़ वाह वाही लूटने की कोशिश कर रही है। हमें बार बार बताया जाता है कि कैसे सरकार बहुत अच्छे काम कर रही हैं। आईसीएमआर अपनी गाइडलाइंस अचानक से बदल देता है और लोगों को बिना कोरोना नेगेटिव टेस्ट किए ही डिस्चार्ज किया जाने लगता है। गुजरात जैसे राज्य, हाईकोर्ट में कह देते हैं कि वे जानबूझ कर कम टेस्ट कर रहे हैं। और आंकड़ा नई गाइडलाइंस के बाद जादुई ढंग से बदल जाता है। नीचे दिया गया ग्राफ आपको दिखा देगा कि कैसे 9 मई के बाद से पहले धीरे-धीरे और फिर 16 मई के पहले से तेज़ी से रिकवरी रेट हैरतअंगेज़ तरीके से बदलता है। 

भारत का कोरोना रिकवरी ग्राफ

आप ने भी सारा डाटा पढ़ लिया होगा, इस डाटा से लगभग साफ है कि कोरोना के बढ़ते संक्रमण के समय, सरकार केवल हमको गुमराह कर रही है। न केवल आईसीएमआर की गाइडलाइंस को बदल कर, रिकवरी रेट को लगभग कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा रहा है। ज़्यादा बुरा ये है कि सरकार की ओर से नौकरशाही को जनता को गुमराह करने के लिए आगे कर दिया गया है। सरकार की प्रेस कांफ्रेंस में, दूसरे देशों से रिकवरी रेट की तुलना की बात तो कह दी जाती है – लेकिन ये छिपा लिया जाता है कि दूसरे देश टेस्टिंग कितनी कर रहे हैं और वो आईसीएमआर की नहीं, WHO की गाइडलाइंस का पालन कर रहे हैं। जो कि हम नहीं कर रहे…

हमें नागरिक नहीं दर्शक बनाया जा रहा है। कोई ना कोई आकर हमें सरकार की रिपोर्ट कार्ड थमा जाता है, जिसमें विषय कोई भी हो सरकार हमेशा अव्वल आती है। ऐसे में गोरख पाण्डेय की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं 

राजा बोला रात है,रानी बोली रात है,

मंत्री बोला रात है,संतरी बोला रात है,

यह सुबह सुबह की बात है।

पर आप अब भी दर्शक से नागरिक बन सकते हैं ताकि देश का तमाशा बनने से रोक सकें।


लेखिका सौम्या गुप्ता, डेटा विश्लेषण एक्सपर्ट हैं। उन्होंने भारत से इंजीनीयरिंग करने के बाद शिकागो यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी उच्च शिक्षा हासिल की है। यूएसए और यूके में डेटा एनालिस्ट के तौर पर काम करने के बाद, अब भारत में , इसके सामाजिक अनुप्रयोग पर काम कर रही हैं।

 

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