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सुपवा में पाठ्यक्रम बदलने के ख़िलाफ़ अनिश्चितकालीन हड़ताल ! पुलिस कैंपस के अंदर, छात्र बाहर !

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देवेश

कहा जाता है कि असली विपक्ष युनिवर्सिटी कैंपस में पैदा होता है। शायद इसीलिए लगभग एक अभियान चलाकर सभी सरकारी संस्थानों को नष्ट किया जा रहा है। रोहतक की सुपवा युनिवर्सिटी (स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स) के छात्र बीते 28 अगस्त से कक्षाओं का बहिष्कार करके अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठ गये हैं। शनिवार को युनिवर्सिटी में पुलिस बुलाकर प्रोटेस्ट कर रहे छात्रों को कैंपस के बाहर कर दिया गया। यानी पुलिस कैंपस के अंदर और छात्र बाहर।
युनिवर्सिटी ने पिछले साल पाठ्यक्रम में बड़ी तब्दीलियाँ की थी, जिसके बाद से ही इसे छात्रों ने इसे अस्वीकार किया है। युनिवर्सिटी के फिल्म एवं टेलीविजन विभाग के छात्रों के अनुसार कोर्स के सबसे ज़रूरी हिस्सों को फंड की कमी का हवाला देकर सिलेबस से बाहर कर दिया गया है। पहले के सिलेबस में छात्रों को दस शॉट लेने होते थे। इसके माध्यम से अपनी कोई एक कहानी प्रस्तुत करनी होती थी लेकिन अब केवल तस्वीरें खींच के दिखानी हैं। इसके अलावा दस मिनट की फिक्शन फिल्म बनानी होती थी और एक गीत भी फिल्माना होता था जिसे हटा दिया गया है और 25 मिनट की फाइनल प्रोजेक्ट डिग्री फिल्म को घटाकर 15 मिनट का कर दिया गया है। इन बदलावों की जगह वर्कशॉप नाम का कोई प्रोजेक्ट कराया जायेगा जिसकी विस्तृत जानकारी किसी को नहीं दी गयी है. यूनिवर्सिटी के अन्य तीन विभाग विजुअल आर्ट्स, अर्बन प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और फैशन डिज़ाइन में भी इसी तरह के बड़े बदलाव किये गए हैं।
साउंड ऑडियोग्राफी के फर्स्ट इयर के छात्र हिमांशु गैरा ने बताया कि यह उत्तर भारत में मौजूद अकेली सरकारी यूनिवर्सिटी या इंस्टिट्यूट है जहाँ पर फिल्म और टेलीविजन की पढ़ाई करायी जाती है और छात्र विभिन्न प्रोजेक्ट्स के माध्यम से ही फिल्म-निर्माण की रचनात्मकता से रूबरू होते हैं। साथ-ही-साथ,ये प्रोजेक्ट्स ही आधार होते हैं जिनके दम पर छात्रों को फिल्म इंडस्ट्री सहित बाहरी दुनिया में अपना काम दिखाने का मौका मिलता है और काम करने के अवसर भी प्राप्त होते हैं। तीन साल या चार साल के कोर्स के लिए प्रत्येक छात्र से लगभग 2.5 लाख या ज्यादा की फीस ली जाती है। वहीं इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए चार छात्रों का समूह बनाया जाता है, और उन पर लाख से डेढ़ लाख का खर्च आता है। गैरा कहते हैं कि ‘अगर हमसे इतनी फीस वसूलने के बाद भी युनिवर्सिटी के पास फंड्स नहीं हैं तो इसमें गलती छात्रों की कहाँ हैं। इस देश में अब पढ़ना-लिखना भी गुनाह हो गया है।’
थोड़ा पीछे चलें तो पता चलता है कि सुपवा यूनिवर्सिटी में गड़बड़ियाँ नयी नहीं हैं। वहाँ पर 2011 से ही अलग-अलग कारणों से प्रोटेस्ट होते रहे हैं। कभी वहाँ उच्चस्तरीय साधन नहीं होते हैं और छात्रों की छः साल लंबी लड़ाई के बाद उपलब्ध कराये जाते हैं। साल 2016 के फ़रवरी महीने में छात्रों को रोहतक की सड़कों पर प्रोटेस्ट के तौर पर भीख मांगते देखा गया था। उस वक़्त युनिवर्सिटी छात्रों की डिग्री और रिजल्ट नहीं जारी कर रही थी। इसके बाद 2016-17 को ‘जीरो इयर’ घोषित कर दिया गया था। साफ़ है कि हर बार मामला युनिवर्सिटी द्वारा की जा रही कोताही से जाकर जुड़ता है। देश भर में जिस तरह से सरकारें निजीकरण का अंधाधुंध नंगा-नाच चलाये हुए हैं, और लगातार जानबूझकर सरकारी संस्थानों को कभी फंड्स की कमी बताकर तो कभी अन्य कारणों से कमजोर किया जा रहा है; सुपवा यूनिवर्सिटी में भी यही खेल चलता दिखायी दे रहा है।
भारत जैसे देश में सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा है कभी। यहाँ सब सिनेमा में जीते हैं, सब अपनी पिक्चर के फैज़ल खान हैं। सुपवा यूनिवर्सिटी के वर्तमान वी.सी साहब की कहानी भी फ़िल्मी है। बताया जाता है कि वी.सी राजबीर सिंह इस पद पाने की योग्यता नहीं रखते हैं। राजबीर सिंह एक जमाने में जनसंपर्क विभाग में नौकरी करते थे, जिसके बाद उन्हें 2007 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बतौर नियुक्त किया गया था।  2012 में उन्हें यूजीसी के शैक्षणिक संचार संघ का डायरेक्टर बना दिया गया और वहाँ से अब सीधा अब वीसी बना दिया गया है। वीसी साहब की इन अप्रत्याशित सफलताओं के  पीछे उनकी विचारधारा का हाथ होने का कारण दिया जाता है, जिसका रंग राज्य सरकार और केंद्र सरकार के रंग से बहुत मिलता है। अब यह रंग छात्रों के जीवन का ढंग बिगाड़ रहा है।