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जतिन दास के शहादत दिवस पर यरवदा जेल में बंद सुरेंद्र गाडलिंग सहित छह भूख हड़ताल पर बैठे

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पुणे की यरवदा जेल में बंद एडवोकेट सुरेंद्र गाडलिंग, दलित कार्यकर्ता सुधीर ढावले, सामाजिक कार्यकर्ता महेश राउत और रोना विल्‍सन सहित अन्य मामलों में यूएपीए में बंद अरुण भेलके और के. मुरलीधरन ने महान क्रांतिकारी जतिन्द्र नाथ दास के शहादत दिवस पर आज से भूख हड़ताल शुरू कर दी है।

पिछले दिनों कोरेगांव भीमा मामले में दर्ज एफआइआर की जांच के सिलसिले में गाडलिंग, विल्‍सन, राउत और ढावले को गिरफ्तार किया गया था और इनके ऊपर यूएपीए सहित राजद्रोह के मुकदमे कायम कर दिए गए। आज से जेल के भीतर भूख हड़ताल शुरू करते हुए इन्‍होंने मांग की है कि जतिन दास के शहादत दिवस के मौके पर 13 सितंबर को राजनैतिक बंदी अधिकार दिवस घोषित किया जाए।

इसके अलावा इनकी मांग है कि यूपएपीए एवं आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट जैसे काले कानून और मृत्युदंड का प्रावधान रद्द किया जाए तथा राजनीतिक बंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए।

सुरेंद्र गडलिंग पेशे से वकील हैं और निर्दोष दलितों के मुकदमे लड़ते रहे हैं। उनके लिए कानून संबंधी किताबें और उच्चतम न्यायालय द्वारा अलग-अलग मामलों पर दिए गए फैसलों को पढ़ना जरूरी है। ये किताबें मुहैया कराए जाने के आदेश सत्र न्यायालय द्वारा दिए जाने के बावजूद जेल प्रशासन इन किताबों को उन्‍हें देने से रोक रहा है। इसी तरह सुधीर ढावले लेखक और संपादक हैं। उन्‍होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और खासकर आंबेडकरवादी दलित आंदोलन से संबंधित किताबों की मांग की है। महेश राउत ने टाटा सामाजिक संस्था (टिस) से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है। उन्‍होंने भी वन संबंधित कानून, नीतियों और आंदोलन से जुड़े साहित्य की मांग की थी।

इसके बजाय पिछले तीन महीने के दौरान मानसिक यातना देने के इरादे से सुरेंद्र गाडलिंग का जेल प्रशासन ने पांच बार जेल के अंदर ही स्थानांतरण किया है। इतना ही नहीं, जेल प्रशासन ने गर्म कपड़े देने से भी साफ मना कर दिया है। प्रशासन ने साफ शब्दों में कहा कि मानवीय आधार पर इनको कुछ भी नहीं दिया जा सकता है। कमोबेश यही हाल देश की अन्य कई जेलों में बंद तमाम राजनैतिक बंदियों का है।

गौरतलब है कि महान क्रांतिकारी जतिन दास शुरुआत में कांग्रेस सेवादल में सुभाषचन्द्र बोस के सहायक रह चुके थे। बाद में वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े। बम बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। बहरे सत्ताधारियों को सुनाने के लिए भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेंबली में जो बम फेंका गया, उसे जतिन दास ने ही बनाया था। जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजनैतिक बंदियों जैसा व्यवहार हो, इस मांग को लेकर इन क्रांतिकारियों ने जेल में उस वक्‍त लंबी भूख हड़ताल की थी। जतिन दास भी उस भूख हड़ताल में शामिल हुए थे और 1929 में आज ही के दिन 25 वर्ष की आयु में भूख हड़ताल के 63वें दिन जेल में वे शहीद हुए थे।

आजादी के मतवाले क्रांतिकारी राजनैतिक बंदी अंग्रेजों के समय में भी राजनैतिक बंदियों को अधिकार दिए जाने की मांग करते थे लेकिन अंग्रेजों के यहां से चले जाने के 71 साल पूरे होने पर यह मांग ज्यो की त्यो बनी हुई है। इसी मांग को लेकर छह राजनैतिक बंदी यरवदा जेल में आज से भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं।