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SC के AOR असोसिएशन ने जारी किया संकल्‍प पत्र, CJI के खिलाफ जांच कमेटी की उठायी मांग

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सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड असोसिएशन (एससीएओआरए) ने आज एक संकल्‍प पारित करते हुए भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा यौन उत्‍पीड़न के आरोपों से खुद को बरी कर लिए जाने की कार्रवाई पर कठोर आपत्ति जतायी है।

रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने यौन उत्‍पीड़न का आरोप लगाया था। इसके बाद उन्‍होंने 20 अप्रैल को इस मामले की जांच के लिए एक बेंच बैठाकर खुद को उन आरोपों से बरी कर लिया।

असोसिएशन ने एक पन्‍ने के जारी संकल्‍प में कहा है, ‘’जिस तरीके से शिकायत से निपटा गया, सुप्रीम कोर्ट का एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड असोसिएशन उससे कड़ी आपत्ति जताता है और उपर्युक्‍त मामले में जांच व कार्रवाई की मांग करता है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों की अगुवाई में तत्‍काल एक कमेटी बनाई जाए जो निष्‍पक्ष रूप से माननीय जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करे और इस मामले में अपना स्‍वतंत्र निष्‍कर्ष दे।‘’

 

 

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  1. हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश गोगोई साहब पर सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मचारी ने छेड़छाड़ के गंभीर आरोप लगाए हैं । इस पर जस्टिस गोगोई का कहना है कि यह न्यायपालिका पर हमला है ।इस विचित्र तर्क पर मात्र हंसा जा सकता है ।भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख है जिसमें अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता के अधिकार से संबंधित है। अन्य सारे मौलिक अधिकार जहां भारत के नागरिकों हेतु उपलब्ध हैं यह मौलिक अधिकार विश्व के किसी भी नागरिक के लिए उपलब्ध है। यानी भारत के मुख्य न्यायाधीश हो या राष्ट्रपति या पाकिस्तान का एक साधारण आतंकवादी भारत का कानून समता की दृष्टि से ही व्यवहार करेगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद पवित्र गाय नहीं है यह बात तो 2010 में ही प्रमाणित हो गई थी ।उस समय भारत के भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण द्वारा आरोप लगाया गया था कि भारत क 16 में से 8 पूर्व मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट रहे है । भ्रष्टाचार अधिनियम की परिभाषा के अनुसार केवल पैसे का लेनदेन ही भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि इसमें “ग्रेटिफिकेशन “शब्द का प्रयोग हुआ है यानी पैसे के अलावा स्त्री या नाम आदि का लालच भी भ्रष्टाचार है।
    इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के कदाचारों के किस्से गलियारों में वरिष्ठ वकीलों के बीच आम चर्चा का विषय रहे हैं। बेहद विवादास्पद और विश्व प्रसिद्ध किस्से के रूप में चंडीगढ़ हाई कोर्ट के एक जज को उद्धृत किया जा सकता है जिसने कहा था कि अगर मारुति मानेसर के मजदूरों को जमानत दे दी तो विदेशी पूंजी निवेश प्रभावित होगा ।इसी प्रकार हजारों लाखों निर्दोष आदिवासी मुसलमान दलित गरीब लोग अदालतों में केवल पैसे की कमी के कारण जेल में सड रहे हैं। भारत के कानून के मुताबिक 3 माह के अंदर चार्जशीट ना पेश होने पर स्वयं जमानत हो जाती है लेकिन मारुति के मजदूरों को 2 साल तक बिना चार्जशीट के जेल में रखा गया । कसूर इतना है कि अपनी यूनियन बनाना चाहते थे। क्या तब न्यायपालिका की साख खतरे में नहीं हुई ?स्वयं भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी एन खरे ने कहा था कि मैं मोदी पर गुजरात नरसंहार के लिए एफ आई आर दायर करता । तो क्या आज उस व्यक्ति का प्रधानमंत्री पद पर रहना ही संविधान एवं न्यायपालिका की विश्वसनीयता को खतरे में नहीं डालता ? जज लोया के मामले में इतने साफ सबूतों के होते हुए भी उसकी जांच तक न करवाना क्या यह न्यायपालिका की साख को खतरे में नहीं डालता ? आखिर जज हो या पीएम हैं तो हाड़ मांस का एक पुतला ही । अगर सरकार मारुती के गरीब मजदूरों के खिलाफ सरकारी वकील केटीएस तुलसी को 11 लाख रुपए प्रति पेशी के दे सकती है तो क्यों ना एक ऐसा ही वकील उस कथित रूप से पीड़ित महिला को भी उपलब्ध कराया जाये जिससे न्यायपालिका की साख दुनिया भर में पुनः रोशन हो। याद रहे योर आनर ! इस साख को बचाने के लिए ही एक ऐतिहासिक प्रेस काफ्रेंस हुई थी। आखिर आप न्याय पालिका नहीं जैसे मोदी या भाजपा देश नहीं।

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