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झारखंड: सत्ता बदलने से नहीं बदली आदिवासियों पर पुलिसिया ज़ुल्म की दास्तान !

झारखंड में नयी सरकार बनने के बाद भी अर्द्ध-सैनिक बलों के काले कारनामे व आदिवासी-मूलवासी जनता पर जुल्म अत्याचार बदस्तूर जारी है। पूरे झारखंड के सैकड़ों विद्यालयों में अभी भी सीआरपीएफ के कैम्प स्थित हैं। रोज-ब-रोज सीआरपीएफ की दर्जनों टुकड़ियां झारखंड के जंगलों-पहाड़ों में भाकपा (माओवादी) के गुरिल्लों को खोजने निकलती हैं। गुरिल्ले तो मिलते नहीं है, लेकिन ये सीआरपीएफ वाले अपनी भड़ास निरीह आदिवासी-मूलवासी जनता पर निकालते हैं। कभी लाठी-डंडे व राईफल के बट से आदिवासियों की पिटाई कर हाथ-पैर तोड़ देते हैं, तो कभी गोली मारकर हत्या कर देते हैं।

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झारखंड में दिसंबर 2019 में सरकार बदल गयी। भाजपा नीत राजग (भाजपा-आजसू) की जगह पर झामुमो नीत महागठबंधन (झामुमो-कांग्रेस-राजद) सत्ता में आ गया। भाजपा के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री रघुवर दास की जगह पर झामुमो के आदिवासी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड की सत्ता संभाल ली। सत्ता बदली, मुख्यमंत्री के चेहरे बदले, लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वह था झारखंड की आदिवासी-मूलवासी जनता पर पुलिसिया जुल्म की दास्तान।

झारखंड में नयी सरकार बनने के बाद भी अर्द्ध-सैनिक बलों के काले कारनामे व आदिवासी-मूलवासी जनता पर जुल्म अत्याचार बदस्तूर जारी है। पूरे झारखंड के सैकड़ों विद्यालयों में अभी भी सीआरपीएफ के कैम्प स्थित हैं। रोज-ब-रोज सीआरपीएफ की दर्जनों टुकड़ियां झारखंड के जंगलों-पहाड़ों में भाकपा (माओवादी) के गुरिल्लों को खोजने निकलती हैं। गुरिल्ले तो मिलते नहीं है, लेकिन ये सीआरपीएफ वाले अपनी भड़ास निरीह आदिवासी-मूलवासी जनता पर निकालते हैं। कभी लाठी-डंडे व राईफल के बट से आदिवासियों की पिटाई कर हाथ-पैर तोड़ देते हैं, तो कभी गोली मारकर हत्या कर देते हैं।

अगर कभी गुरिल्लों से मुठभेड़ हुई और जवान मारे गए, तब तो मुठभेड़ स्थल के आसपास के गांव के ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी जनता की जान पर ही बन आती हैं। क्योंकि तब शुरू होता है भाकपा (माओवादी) के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी का सिलसिला। ऐसी स्थिति में गांव के पुरूष अपने गांव को छोड़कर भाग जाते हैं। अगर कोई बच गया, तो जब भी पुलिसकर्मी आते हैं, उनकी लाठी आदिवासी-मूलवासी जनता की पीठ पर बरस ही जाती है।

20 मार्च 2020 को खूंटी जिला के मूरहू थाना के कुम्हारडीह निवासी रोशन होरो अपनी मोटरसाईकिल से बगल के गांव सांडी के लिए निकलते हैं। उनके पास भैंस का चमड़ा रहता है। जिससे वे नगाड़ा बनवाने जा रहे थे। अपने गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर ही पहुंचे थे कि उत्क्रमित मध्य विद्यालय एदेलबेड़ा के पास उन्हें सीआरपीएफ की एक टुकड़ी मोटरसाईकिल पर आते हुए दिखती है, जो रोशन को रूकने का इशारा कर रही थी। रोशन होरो सीआरपीएफ द्वारा रूकने का इशारा करने से डर जाते हैं और मोटरसाईकिल छोड़कर भागने लगते हैं। सीआरपीएफ रोशन को दौड़ाकर पकड़ने के बजाय रोशन के उपर तीन गोलियां चलाती है। जिनमें से एक गोली सर व एक गोली रोशन के सीने में लगती है और घटनास्थल पर ही रोशन दम तोड़ देते हैं।

रोशन होरो

फिर भी दिखावे के लिए रोशन कोे सीआरपीएफ द्वारा अस्पताल ले जाया जाता है और बाद में उनके घर में भी खबर दी जाती है। मामला जब काफी गरम हो गया, तो पुलिस ने इसे ‘मानवीय भूल’ कहकर मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन जब ग्रामीण काफी आक्रोशित होकर तीन दिनों तक लाश को थाना से नहीं लाए, तो सीआरपीएफ के एक जवान जितेंद्र कुमार प्रधान पर मुकदमा दर्ज किया गया और ग्रामीणों को झांसे में रखकर लाश सुपुर्द कर दिया गया, लेकिन बाद में पता चला कि दर्ज मुकदमे में जवान पर आत्मरक्षा में गोली चलाने की बात लिखी हुई है। तब तक मामला शांत हो चुका था। लेकिन इस पूरे मामले में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व उनकी पार्टी ने अप्रत्याशित चुप्पी साधे रखी।

31 मई 2020 को पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिला के बंदगांव प्रखंड के ओटार पंचायत के जोनुवां गांव में सीआरपीएफ व भाकपा (माओवादी) के बीच मुठभेड़ हुई, जिसमें चक्रधरपुर डीएसपी के बाॅडीगार्ड लखिंदर मुंडा व एसपीओ (मुखबिर) सुंदर स्वरूप मारे गये। जोनुवां गांव कराईकेला थाना में स्थित है। इस घटना के बाद कराईकेला पुलिस ने जोनुवां गांव के आदिवासियों पर निर्मम दमन-अत्याचार करना शुरू कर दिया। अंततः परेशान ग्रामीणों ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, मंत्री जोबा मांझी, सांसद गीता कोड़ा, विद्यायक सुखराम उरांव, पूर्व सांसद लक्ष्मण गिलुवा तथा पूर्व विधायक शशिभूषण सामड को पत्र लिखकर पुलिसिया जुल्म से बचाने की गुहार लगाई।

पत्र में ग्रामीणों ने लिखा कि 31 मई की सुबह 10 बजे गुरिया बांडरा के भाई अंतु बांडरा और बुधु बांडरा तालाब में मछली मार रहे थे, तभी पुलिस ने माओवादी बताकर दोनों को पकड़ लिया और जेल भेज दिया। इन दोनों पर मारे गये पुलिस की हत्या का आरोप मढ़ दिया गया, साथ ही जोनुवां गांव के और 5 ग्रामीणों का नाम इसी एफआईआर में डाल दिया गया, जिसमें रामसिंह तियू रेगा तियू, लोदो अंगरिया, सुरसिंह अंगरिया, आदि शामिल है। ग्रामीणों ने लिखे पत्र में आरोप लगाया कि कराईकेला पुलिस जब-तब गांव आकर ग्रामीणों को पीटती रहती है, जिससे गांव के लोग भागते फिर रहे हैं और खेती-बाड़ी भी नहीं कर पा रहे हैं।

15 मई 2020 को पश्चिम सिंहभूम जिला के मुफस्सिल थानान्तर्गत अंजेड़बेड़ा गांव के चिरियाबेड़ा टोला में बोंज सुरीन के घर की खपरैल से छावनी चल रही थी, जिसमें अंजेड़बेड़ा गांव के कई लोग शामिल थे। दोपहर 12ः30 बजे अचानक सीआरपीएफ के दर्जनों जवान आते हैं और घर छावनी कर रहे सभी मजदूरों को नीचे उतरने बोलते हैं। मजदूर आदिवासी ‘हिन्दी’ नहीं समझ पाने के कारण उतरने में देरी करते हैं फिर इशारा समझने पर उतरते हैं। तब तक गांव के कई लोग जुट जाते हैं। सीआरपीएफ सबसे पहले वहां मौजूद लोगों से माओवादियों के ठिकाने के बारे में पूछते हैं, नहीं बताने पर ‘हिन्दी भाषा’ नहीं समझ पा रहे ग्रामीण आदिवासियों व छावनी कर रहे मजदूर आदिवासियों की पिटाई शुरू कर देते हैं।

 

पिटाई के डर से जब लोग भागने लगते हैं, तो दौड़ा-दौड़ाकर उन्हें पीटा जाता है। सभी की पिटाई लाठी-डंडे व बंदूक के बट से होती है। जिस कारण कई के नाक व मुंह से खून बहने लगता है। इस पिटाई से बायें हाथ से विकलांग गुना गोप का दायां पैर टूट जाता है, माधो कायम के सिर पर गंभीर अंदरूनी जख्म हो जाता है। बोमिया सुरिन के छाती में गंभीर जख्म हो जाता है, तो वहीं गुरूचरण पूरती, सिंगा पूरती, सिनु सुंडी, सिदिउ जोजो आदि गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। लगभग 11 ग्रामीणों की बुरी तरह से पिटाई होती है, जिसमें 7 घायल हुए और 3 गंभीर रूप से घायल हुए।

सीआरपीएफ का अत्याचार यहीं नहीं रूकता है, बल्कि अब वे राम सुरीन के घर में घुसते हैं और घर में रखे चावल, धान आदि को पूरी तरह से बिखेर देते हैं। बक्सा का ताला तोड़कर जमीन का खतियान, मालगुजारी रसीद, आधार कार्ड सहित सभी अन्य कागजातों के साथ-साथ 35 हजार रूपये भी लूट लेते हैं।

 

ग्रामीण दूसरे दिन यानि 16 जून को किसी तरह से घायलों को सदर अस्पताल, चाईबासा में लेकर पहुंचते हैं और सीआरपीएफ पर एफआईआर करने के लिए मुफस्सिल थाना भी जाते हैं, लेकिन मुफस्सिल थाने की पुलिस घटनास्थल गोइलकेरा थाना क्षेत्र में होने की बात कहकर मुकदमा दर्ज करने से इंकार कर देती है। 17 जून को इस जघन्य व क्रूरतम घटना को स्थानीय अखबार दूसरी तरफ मोड़ना चाहते हैं और दैनिक हिन्दुस्तान और प्रभात खबर में खबर छपती है कि इस घटना को माओवादियों ने अंजाम दिया है, लेकिन दैनिक भास्कर व दैनिक जागरण ग्रामीणों की बात को ही छापते हैं और सीआरपीएफ को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।

इस घटना पर जब ट्वीटर पर काफी लोग अपनी प्रतिक्रिया देना शुरू करते हैं, तो चाईबासा पुलिस के ट्वीटर हैंडल से ट्वीट होता है कि इस मामले में गोईलकेरा थाना में मुकदमा दर्ज हो गया है, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन एफआईआर की काॅपी ग्रामीणों को नहीं मिलती है, फलस्वरूप 150 ग्रामीण ‘ग्राम सभा (हातू दुनुब) अंजेड़बेड़ा-776’ के लेटर पैड पर पूरे घटनाक्रम को लिखित रूप में चाईबासा एसपी को देते हैं। अब तक इस मामले पर भी झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व महागठबंधन की तमाम पार्टियां चुप्पी साधे हुए है।

झारखंड में पिछली सरकार के कार्यकाल में भी आदिवासी-मूलवासी जनता पर पुलिसिया जुल्म की कई घटनाएं घटी थी, जिसपर तत्कालीन विपक्षी पार्टी झामुमो व तत्कालीन विपक्षी नेता हेमंत सोरेन आंदोलन भी कभी-कभार करते थे। पुलिसिया जुल्म से झारखंड को मुक्त करने के वादे के साथ सत्ता में आए हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के बाद पुलिसिया जुल्म पर चुप्पी साध ली है।

साथ ही सरकार में आने से पहले फर्जी मुठभेड़ में मारे गए आदिवासी डोली मजदूर मोतीलाल बास्के की हत्या की सीबीआई जांच की मांग को लेकर आंदोलन करने वाले हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक इस मामले में सीबीआई जांच का आदेश देना तक मुनासिब नहीं समझा है।झारखंड में पुलिसिया जुल्म की तमाम घटनाओं से यही परिलक्षित होता है कि सिर्फ सरकार बदलने से जनता के हालात नहीं बदलने वाले हैं।


 

रूपेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार हैं।

 


 

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