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RBI की सालाना रिपोर्ट कह रही है कि नोटबंदी इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला है!

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रिजर्व बैंक की 2018-19 की सालाना रिपोर्ट कल आ गयी और इस बात पर पक्की मुहर लग गयी कि नोटबंदी से बड़ा आर्थिक घोटाला भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। यह वाकई एक संगठित लूट और लीगलाइज्ड प्लंडर (क़ानूनी डाका) बनकर सामने आया है।

मीडिया इस रिपोर्ट की असली बात को छुपा रहा है। इस रिपोर्ट की हेडलाइन मीडिया द्वारा यह बनायी जा रही है कि इस वर्ष बैंकों में हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के 6 हजार से अधिक मामले सामने आये हैं लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि देश में चलन में मौजूद मुद्रा पिछले साल से 17 फीसदी बढ़कर 21.10 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गयी है। जबकि नोटबंदी से पहले 15.44 लाख करोड़ रुपये के नोट चलन में थे और साल भर बाद पता चला था कि 15.28 लाख करोड़ के नोट वापस आ गये हैं यानी लगभग 99 प्रतिशत नोट वापस आ गये थे।

तो कहां गया काला धन?

तब सरकार के पिट्ठू बने अर्थशास्त्री यह बता रहे थे कि नोटबन्दी के पहले बड़ी संख्या में करंसी सर्कुलेशन में आ गयी थी जिसे रोका जाना जरूरी था। 8 नवंबर, 2016 को की गयी नोटबंदी का बड़ा उद्देश्य डिजिटल भुगतानों को बढ़ावा देना और नकदी के इस्तेमाल में कमी लाना बताया गया था। अगर यह सच था तो आज नोटबन्दी के 2 साल 9 महीने के बाद साढ़े पंद्रह लाख करोड़ की नकदी 21 लाख करोड़ से अधिक कैसे पहुंच गयी?

नोटबंदी की घोषणा करने के बाद अपने पहली मन की बात में 27 नवंबर, 2016 को नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी को ‘कैशलेस इकॉनमी’ के लिए ज़रूरी क़दम बताया था। आज अगर कैश इतना अधिक बढ़ा है तो कहा गयी आपकी कैशलेस इकनॉमी?

नकली नोटों पर भी बहुत हल्ला मचाया गया था। आज पता चला है कि रिजर्व बैंक के मुताबिक 2017-18 और 2018-19 में नयी करंसी छापे जाने के बाद भी जाली नोटों को पकड़े जाने का सिलसिला जारी है। इस साल भी 3.17 लाख नकली नोट पकड़े गये हैं। 2000 रुपये के नकली नोट 2018-19 में 22% बढ़़ गये। 500 रुपये के नोट में यह बढ़ोतरी रिकॉर्ड 121% की है। अब कोई नकली नोट कैसे बढ़ गए, यह बात क्यों नहीं पूछता?

नोटबन्दी ने देश की आर्थिक विकास की गति को अवरुद्ध कर दिया। 2015-2016 के दौरान जीडीपी की ग्रोथ रेट 8.01 फ़ीसदी के आसपास थी, जो 2016-2017 के दौरान 7.11 फ़ीसदी रह गयी और इसके बाद जीडीपी की ग्रोथ रेट 6.1 फ़ीसदी पर आ गयी। 2018-19 की आखिरी तिमाही में तो यह दर 5.8 पर आ गयी। पिछले साल ही रिजर्व बैंक की एक समिति ने माना था कि नोटबंदी के चलते देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ एक फ़ीसदी कम हुई है यानी आज के दिन तक मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था को तीन लाख करोड़ का नुकसान हो चुका है।

जीडीपी ग्रोथ के गिरने से दोहरा नुकसान हुआ है। रिज़र्व बैंक की बैठक में बताया गया था कि नोटबन्दी के पहले मंत्रालय के मुताबिक 500 और 1000 रुपये के नोट 76% और 109% की दर से बढ़ रहे थे, जबकि अर्थव्यवस्था इससे ज्यादा तेजी से बढ रही थी लेकिन अब अर्थव्यवस्था के बढ़ने की गति धीमी हो गयी है ओर बाजार में मुद्रा की अधिकता हो गयी है। तब भी अर्थव्यवस्था कैश क्रंच को झेल रही है। 21 लाख करोड़ की मुद्रा होने के बाद भी लोगो की जेब मे पैसा नहीं है लेकिन तब साढ़े 15 लाख करोड़ रुपये होने पर भी सबकी जेब मे पैसा था।

RBI के निदेशकों ने उस वक्त ही कह दिया था कि था कि काला धन कैश में नहीं, सोने या प्रॉपर्टी की शक्ल में ज़्यादा है और नोटबंदी का काले धन के कारोबार पर बहुत कम असर पड़ेगा। इतना ही नहीं, निदेशकों का यह भी कहना था कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

आज वही हो रहा है। रिजर्व बैंक की इस वार्षिक रिपोर्ट में साफ साफ लिखा है कि पिछले 10 साल में रिजर्व बैंक की बैलेंसशीट की औसत वार्षिक विकास दर 9.5% रही है जबकि 2013-14 से 2017-18 के पांच साल के दौरान इसकी औसत विकास दर 8.6% रही। समिति ने कहा है कि बैलेंसशीट की विकास दर में गिरावट का कारण 2016-17 में की गयी नोटबंदी थी।

15 अगस्त, 2017 को अपने भाषण में पीएम मोदी ने कहा था कि ‘तीन लाख करोड़ रुपये जो कभी बैंकिंग सिस्टम में नहीं आता था, वह आया है।’ अगर वह पैसा वापस आ ही गया है तो मोदी जी, आपको रिजर्व बैंक के 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये हड़पने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

नोटबन्दी के बाद देश के टैक्स कलेक्शन पर भी विपरीत असर पड़ा। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने अपने आंकड़ों में बताया था कि कुल कर-संग्रह में प्रत्यक्ष कर पिछले पांच साल में सबसे कम वित्त वर्ष 2016-17 में रहा है। इस साल पेश कैग की रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि पिछले दो साल में भारत मे टैक्स कलेक्शन की गति अवरुद्ध हो गयी है।

अर्थव्यवस्था तेजी से बर्बाद हो रही है लेकिन मुख्यधारा के मीडिया की औकात नही है कि इस बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था के असली कारण नोटबन्दी पर बहस कर ले।

अब अंत मे आप मोदी जी के उस भाषण को याद कर लीजिए जो उन्होंने नोटबन्दी के तुरंत बाद किये गये जापान दौरे से लौटने पर दिया था: ”भाइयों बहनों, मैंने सिर्फ़ देश से 50 दिन मांगे हैं. 50 दिन. 30 दिसंबर तक मुझे मौक़ा दीजिए मेरे भाइयों बहनों. अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाये, कोई मेरी ग़लती निकल जाये, कोई मेरा ग़लत इरादा निकल जाये. आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर… देश जो सज़ा करेगा वो सज़ा भुगतने को तैयार हूं।”

 

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