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कांचा इलैया की किताबें और ‘दलित’ शब्द हटाने का विरोध, दिल्ली वि.वि. में कल प्रतिरोध मार्च

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दिल्ली विश्वविद्यालय से मशहूर दलित चिंतक कांचा इलैया की तीन किताबें हटाने की सिफारिश का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इसके अलावा दलित शब्द को हटाने की सिफारिश की गई है। इस मुद्दे पर कल विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में प्रतिरोध मार्च निकाला जाएगा।

मीडिया विजिल ने आपको सूचत किया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक मामलों की स्थायी समिति ने राजनीति विज्ञान की एम.ए.कक्षा में पढ़ाई जाने वाली, मशहूर दलित चिंतक कांचा इलैया की तीन किताबें ‘हिंदू विरोधी’ बताते हुए हटाने की सिफ़ारिश की है। कांचा इलैया की  किताबें हैं-‘व्हाई आई एम नाट अ हिंदू’, ’बफेलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट हिंदू इंडिया।’ इसके अलावा कमेटी को ‘दलित’ शब्द पर भी आपत्ति है और वह नहीं चाहती कि विश्वविद्यालय के अकादमिक विमर्श में इस शब्द का इस्तेमाल हो।

लेकिन यह सिफ़ारिश आरएसएस की सुचिंतित योजना मानी जा रही है। खदु कांचा इलैया ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि उन्होंने हाल में एक लेख के ज़रिए साबित किया है कि मोदी ने बनिया होने के बावजूद खुद को 2014 के चुनाव के पहले ओबीसी बताकार वोट हासिल किया। इसी से नाराज़ होकर उनकी किताबें हटाई जा रही हैं। दरअसल, मोदी की जाति मोड घांची 1994 से पहले सवर्ण बनिया श्रेणी में थी। 1994 में इसे गुजरात में पिछड़ी जाति की लिस्ट में शामिल किया गया। जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, तब 1999 में ये जाति पहली बार ओबीसी की लिस्ट में शामिल की जाती है। मोदी गुजरात के विधानसभा चुनावों में खुद को बनिया ही बताते रहे। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी वोटों की बड़ी संख्या देखते हुए खुद को ओबीसी बना लिया। उनके मुताबिक गुजरात, यूपी और बिहार में  कई बनिया जातियों को ओबीसी सर्टिफिकेट हासिल कर लिया है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी बनिया उद्योगपतियों के भरपूर समर्थन से दिल्ली पर राज कर रही है। पूरे शूद्र समाज को एकजुट होकर इस बनिया-ब्राह्मण सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहिए।

नेशनल हेराल्ड में छपे इस लेख के मुताबिक कांचा इलैया का दावा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की जिस कमेटी ने उनकी किताबें हटाने की सिफारिश की है, उसके सदस्यों ने उनकी किताब पढ़ी ही नहीं। वास्तव में ‘गॉड ऐज़ पोलिटिकल फिलास्फर: बुद्धाज़ चैलेंज टू  ब्राह्मनिज्म’, जो वास्तव में उनकी पीएचडी थीसिस है, पूरी तरह राष्ट्रवादी किताब है। ‘व्हाई एम आई नॉट अ हिंदू’ को क्लासिक माना जाता है और दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में यह पढ़ाई जाती है। हिंदुत्ववादियों ने 2012 में कोलंबिया युनिवर्सिटी में इसे पढ़ाने से रोकने का असफल प्रयास किया था, वही अब दिल्ली में कर रहे हैं।

कांचा इलैया के मुताबिक उनकी किताब ‘पोस्ट हिंदू इंडिया’ दस साल के रिसर्च का नतीजा है। उनकी किताबें सावरकर और गोलवलकर या उन लोगों की तरह नहीं हैं जो कल्पना के सहारे लिखते थे। कुछ समय पहले जेएनयू में ‘व्हाई आई एम नॉट अ हिंदू’ को महात्मा गाँधी की ‘हिंद स्वराज’ और डॉ.आंबेडकर की ‘जाति का उच्छेद’ के साथ तुलनात्मक पाठ की तरह पढ़ाया जाता था। क्या आरएसएस और बीजेपी के लोग इन किताबों को भी भारत से हटाना चाहते हैं। दरअसल वे भारतीय विश्वविद्यालयों में विचारों की विविधता को नष्ट करना चाहते हैं। उनकी मंशा उत्पादक जातियों को शक्तिशाली होने से रोकना है।

ज़ाहिर है, कांचा इलैया की इन खरी बातों का असर हुआ है और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों का एक वर्ग इसके ख़िलाफ़ मुखर हुआ है। 30 अक्टूबर को इसके ख़िलाफ़ प्रतिरोध मार्च निकालने का ऐलान किया गया है।

 



 

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