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भेदभाव: कोरोना की दवा केवल पुरुषों को ध्यान में रखकर क्यों खोजी जा रही है?

“अक्सर ऐसा होता है कि सभी के लिए समान निर्धारित औषधि की स्थिति में महिलाओं में  प्रतिकूल प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।  इसलिए एक सटीक तस्वीर सुनिश्चित करने के लिए महिला परीक्षण-विषयों के डेटा का अलग से विश्लेषण करना आवश्यक है । उदाहरण के लिए, मान लें कि 40 महिलाओं और 60 पुरुषों ने एक नए ड्रग ट्रायल में भाग लिया। उस ट्रायल में 30 प्रतिशत महिलाओं और 5 प्रतिशत पुरुषों में दवा परीक्षण की प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं प्रदर्शित हुईं।   लिंग-विशिष्ट विश्लेषण के अभाव में शोधकर्ता यही निष्कर्ष निकालेंगे कि अमुक दवा में केवल 15 प्रतिशत लोगों में किसी प्रकार की जटिलता का जोखिम है क्योंकि कुल 100 में से मात्र 15 व्यक्तियों में ही ऐसे प्रभाव दिखे। नतीजे के तौर पर यह संख्या इस दवा को बाज़ार में उतारने के उद्देश्य से ‘फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ (FDA) को भी स्वीकार्य होगी।

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पूरा विश्व कोरोनावायरस और कोविड-19 के संकट से जूझ रहा है। अमरीका जैसी महाशक्ति को भी इस वायरस ने हिलाकर रख दिया है।  विश्व भर के वैज्ञानिक जब इस वायरस का तोड़ ढूँढने में दिन-रात लगे हैं तो  एलिसन जे.मेक्ग्रेगर विज्ञान-जगत का ध्यान एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर आकर्षित कर रही हैं। ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ में छपे अपने ताज़ा लेख में एलिसन कहती हैं कि कोविड-19 पर हमारी चिकित्सा-प्रणाली की प्रतिक्रिया पुरुष-केन्द्रित है।   

एलिसन जे. मेक्ग्रेगर, ब्राउन यूनिवर्सिटी के ‘आपातकाल मेडिसिन विभाग’ द्वारा स्थापित ‘डिविज़न ऑफ़ सेक्स एंड जेंडर इन इमरजेंसी’ की सह-संस्थापक और निदेशक हैं। वे अमरीका के एक राष्ट्रीय संगठन ‘हेल्थ, सेक्स एंड जेंडर-वीमंस कोलाबोरेटिव ‘ की सह-संस्थापक भी हैं।  उनके अध्ययन एवं शोध का मुख्य विषय  है- मेडिसिन के क्षेत्र में, विशेष रूप से आपातकालीन स्थिति में लिंग-अंतर को समझना।  अपने मरीजों का इलाज़ करने, मेडिसिन के छात्र रेजिडेंट डॉक्टरों को पढ़ाने के अतिरिक्त वे इस विषय पर लम्बे समय से शोधरत हैं कि कैसे महिलाएं, पुरुषों से जैविक रूप से भिन्न हैं?  और कैसे इन दोनों के बीच के अंतर, निदान से लेकर फार्मास्युटिकल जैव-उपलब्धता सहित कई क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं?

कोरोनावायरस के परिप्रेक्ष्य में वह अपनी चिंता साझा करते हुए आगाह करती हैं कि हमारी पुरुष-केन्द्रित चिकित्सा व्यवस्था कोविड-19 के मरीजों के बारे में गंभीर सूचनाएं एकत्र करने से चूक रही है।  ये सूचनाएं न केवल अनेकों जिंदगियां बचाने में सहायक हो सकती हैं अपितु भविष्य में किसी महामारी के खतरों को भी कम  कर सकती हैं। 

“कोविड  के सन्दर्भ में मेरी कई चिंताए हैं यह वायरस महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग तरीके से कैसे प्रभावित कर सकता है, इस बारे में हमारी समझ में कमी हैं और समझदारी की यह कमी हमें कोविड-19 के  रोगियों को सबसे उपयुक्त और व्यक्तिगत देखभाल प्रदान करने की दिशा में एक बड़ी बाधा है।”

“महिलाएं, डीएनए के स्तर से ही पुरुषों से जैविक रूप से भिन्न हैं। महिलायें केवल स्तन और अंडाशय वाले पुरुष नहीं हैं; अपितु वे अपने शरीर की हर कोशिका में विशिष्ट हैं।“ 

“हमारी आधुनिक चिकित्सा प्रणाली पुरुष-केंद्रित हैयह प्रणाली पुरुष-देह और उसकी बीमारी के पैटर्न के ज्ञान, शोध और अवलोकन पर आधारित है – महिलाएं उस पाठ्यपुस्तक-मॉडल में फिट नहीं बैठती जिसके आधार पर चिकित्सक रोगियों का निदान और उपचार करना सीखते हैं।“ 

“हमारी चिकित्सा प्रणाली के किसी भी पहलू पर गौर करें तो महिलायें पुरुषों से पीछे नज़र आती हैं। सामान्य बीमारी हो अथवा घातक, दोनों ही परिस्थियों में  उनके डायग्नोसिस यानि निदान में देरी होती है। बहुत सम्भावना होती है कि उनके शारीरिक लक्षणों का मनोचिकित्सीय डायग्नोसिस किया जाए। बहुत सी दवाओं का असर भी महिलाओं पर अलग तरीके से होता है और उनपर इसके परिणाम और साइड इफेक्ट्स पुरुषों से भिन्न होते हैं।  भिन्न जैविक तंत्र की वजह से महिलाओं को कई बार दर्द भी अनुभव होता है।“

“यह जानना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोविड-19 के रोगियों के उपचार के लिए हम जिन तरीकों का उपयोग कर रहे हैं, उनके बारे में ऐसा अभी तक कुछ भी ज्ञात नहीं है कि वे महिलाओं के जीव विज्ञान को कैसे प्रभावित करते है। न ही हम यह जानते हैं कि यह वायरस जैविक स्तर पर पुरुषों और महिलाओं को क्यों और कैसे अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर रहा है। ज्ञान की कमी का परिणाम सब के लिए, न केवल इस महामारी में बल्कि भविष्य के प्रकोपों ​​में भी,बुरा सिद्ध  हो सकता है।”

“विभिन्न समाचारों के अनुसार कोविड-19 महिलाओं की तुलना में पुरुषों पर ज्यादा वार कर रहा है। अभी तक की रिपोर्टों के अनुसार कोरोना से पीड़ित मृतकों में से 61 फीसदी पुरुष हैं। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि, पुरुषों द्वारा हाथ कम धोने अथवा अच्छे से न धोने की आदत और उनमें धूम्रपान की उच्च दर जैसे संदर्भों को छोड़ दें तो  इस दिशा में कोई विशेष जांच नहीं की जा रही है।“  

“हाल के दशकों के SARS और MERS  के प्रकोप के दौरान महामारी संबंधी आंकड़े संकेत करते हैं कि सामाजिक और जीवन शैली की आदतों के अतिरिक्त भी कई कारण हो सकते हैं जिनसे कोरोनो वायरस रोग के परिणामों में लिंगाधारित अंतर हों। अमेरिकन जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित एक शोध-पत्र के अनुसार  “पुरुषों में महिलाओं की तुलना में मृत्यु दर काफी अधिक (पी <0। 0001) थी, “पुरुषों में 21.9 प्रतिशत और स्त्रियों में 13.2 प्रतिशत। इस असमानता के लिए शोधकर्ताओं ने कोई विशेष कारण नहीं बताया लेकिन 2017 में किए गए एक अध्ययन से उनके निष्कर्षों का विशेष सम्बन्ध है।”

“इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने SARS-CoV  नाम के वायरस, जो SRS के प्रकोप का कारण बना था, को बराबर आयु वाले नर और मादा चूहों में इंजेक्ट किया। मादाओं की तुलना में नर चूहों में वायरस के प्रभाव ज्यादा पाए गये।” 

“हालांकि, जब मादा चूहों के अंडाशय को हटा दिया गया, तो वायरस के प्रति उनकी संवेदनशीलता पुरुषों के बराबर हो गई। ऐसी दवाइयां जो एस्ट्रोजन (स्त्री-हारमोन) को कोशिकाओं से बांधने से रोकती हैं, ने भी ठीक वैसा ही प्रभाव उत्पन्न किया।   इससे शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि महिलाओं में श्वसन-सम्बन्धी कोरोना वायरस  होने की दिशा में एस्ट्रोजन की उपस्थिति उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है।”

“महिलाओं में पुरुषों से अलग रोग-प्रतिरोधी प्रतिक्रिया पथ भी होते हैं। उनका  शरीर ‘हमलावरों’ से अलग तरह का व्यवहार करता है। हालाँकि, कोविड-19 के संदर्भ में उनके तंत्र के बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं हैं।”

“दुनिया के सभी हिस्सों से प्रतिदिन अविश्वसनीय मात्रा में डेटा इकट्ठा हो रहा है।  और सारी जानकारियां तुरंत ऑनलाइन उपलब्ध भी हो जाती हैं। तमाम मौजूदा तकनीकों के बावजूद,  अमरीका सहित किसी भी देश में वर्तमान रोगियों के संबंध में लिंग-विशिष्ट डेटा या तो उपलब्ध नहीं है या अपर्याप्त है। इस स्थिति को तुरंत बदलने की जरूरत है।”

“यदि हम कोविड-19 के संक्रमितों को ट्रैक करने और नए केसों को दैनिक रूप से अपडेट कर सकने में सक्षम हैं, तो इन सबके बारे में लिंग-विशिष्ट जानकारी भी एकत्र की जा सकती है।  इन आंकड़ों के उपलब्ध होने की स्थिति में अनेक  शोधकर्ता कहीं ज्यादा विशिष्ट तरीके से वायरस के प्रसार और परिणामों का मूल्यांकन कर सकते हैं।  संभवतः इससे हमें वायरस के प्रसार को कम करने और भविष्य की महामारियों के लिए अधिक प्रभावी निवारक उपाय सुझा सकने में मदद मिले। अगर वास्तव में महिलाओं को इस तरह के वायरसों के खिलाफ कुछ अतिरिक्त प्राकृतिक सुरक्षा है, तो इसे पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए बेहतर परिणाम बनाने की दिशा में काम हो सकता है।”

“कोविड-19 के रोगियों के इलाज के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को प्राथमिक दवा के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है– यह एक पुरानी दवा है जिसे प्लाक्वेनिल नाम के ब्रांड से बेचा जाता है और इसका इस्तेमाल ल्युपस, रुमेटीइड अर्थराइटिस और मलेरिया जैसी बीमारियों में किया जाता है।”

“इस दवा की वजन-आधारित खुराक दी जाती है, पर लिंग-विशिष्ट खुराक निर्धारित नहीं है- भले ही हम यह जानते हैं कि यह दवा अपना काम  प्रतिरोधक क्षमता को दबाकर करती है और यह भी कि पुरुषों और महिलाओं में इसकी अलग-अलग प्रतिरोधात्मक प्रतिक्रियाएं होती हैं। लिंग-भेद से तय खुराक से इसकी प्रभावकारिता दोनों लिंगों पर कैसी रहेगी  या क्या लिंग-विशिष्ट खुराक के कम दुष्प्रभाव और अधिक सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं; इस बारे में भी कोई जानकारी नहीं हैं।”

 

“लिंग-विशिष्ट ज्ञान की कमी इस वायरस से प्रभावी रूप से लड़ने की हमारी क्षमता को सीमित कर देती है। अनुसंधान के क्षेत्र में मेरे कई सहकर्मी इस वायरस को खत्म कर देने वाली दवा अथवा दवाओं का सम्मिश्रण खोजने की दिशा में अत्यंत तेज़ी से काम कर रहे हैं।  लेकिन अगर वे अनुसंधान प्रोटोकॉल के  स्थापित मानकों का पालन करते हैं  तो उनके मॉडल और अनुमान संभवतः पिछले पुरुष-केंद्रित शोध, पुरुष कोशिकाओं के व्यवहार और नर प्रयोग-विषय के परीक्षण के परिणामों पर आधारित होंगे।“

“चिकित्सा समुदाय की नज़र में, यह कोई  विफलता अथवा चूक नहीं है। हमेशा से यह ऐसा ही होता आया है।” 

“दरअसल नर-कोशिकाओं, नर-जानवरों और नर अध्ययन प्रतिभागियों पर शोध करने से समय और खर्च दोनों बचते हैं।  क्योंकि उनपर गर्भावस्था का परीक्षण नहीं करना पड़ता अथवा मासिक धर्म के प्रत्येक चरण में हार्मोनल अंतर का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं होती। महिला और पुरुष जैविक रूप से भिन्न हैं, पुरुषों के लिए जो युक्ति कार्य करे, आवश्यक नहीं कि वह महिलाओं के लिए भी उतनी ही मज़बूती से या सुरक्षित रूप से कारगर हो।”  

“1998 में स्थापित एफडीए के नियमों के अनुसार किसी भी नए ड्रग एप्लिकेशन में  लिंग, नस्ल और उम्र के आधार पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण शामिल हैं। हालांकि, एजेंसी नैदानिक ​​परीक्षणों के लिए विशिष्ट जनसांख्यिकी को अनिवार्य नहीं कर सकती पर दवा परीक्षणों में एकत्र किए गए डेटा का लिंग-विशिष्ट विश्लेषण तो किया ही जा सकता है।”

 ‘नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ’(NIH) के एक प्रभाग ‘द ऑफिस फॉर रिसर्च ऑन विमेंस हेल्थ’ ने  2016 से ही SABV अर्थात ‘सेक्स एज ए बायोलोजिकल वेरिएबल’ को न सिर्फ NIH द्वारा वित्तपोषित नैदानिक ​​अनुसंधानों में शामिल करने अपितु   “महिलाओं और अल्पसंख्यक समूहों के समावेश” को अनिवार्य कर दिया है। वैज्ञानिक रूप से यह उचित भी है। हालांकि, ये सिफारिशें केवल NIH- वित्त पोषित अनुसंधान पर ही लागू होती हैं, अन्य समूहों द्वारा किये जाने वाले अनुसंधानों पर नहीं।”

“मेरी चिंता यह नहीं है कि हमारे पास वायरल बीमारियों में सेक्स अंतर को समझने के लिए आवश्यक जानकारी एकत्र करने की क्षमता नहीं है। बल्कि, मुझे डर है कि अब हम जिन स्थितियों का सामना कर रहे हैं– जब समय सारतत्व को खोजने का है, जब हर कोई इलाज खोजने के लिए दौड़ रहा है– तो ऐसी स्थिति में  शोधकर्ता सबसे अधिक समझ आने वाले और सीधे-सपाट परीक्षण मार्गों का रुख करेंगे: जो निश्चित रूप से पुरुष-प्रमुख होंगे और अंतिम विश्लेषण में सभी परीक्षण-विषयों के परिणामों को जोड़ दिया जायेगा और व्यवहारिकता के तकाज़े सेSABV सम्बन्धी नए दिशा-निर्देशों को एक तरफ रख दिया जाएगा।“

“भले ही संकट के इस दौर में यह बात महत्वपूर्ण न लगे पर यह बेहद ज़रूरी है।“   

“अक्सर ऐसा होता है कि सभी के लिए समान निर्धारित औषधि की स्थिति में महिलाओं में  प्रतिकूल प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।  इसलिए एक सटीक तस्वीर सुनिश्चित करने के लिए महिला परीक्षण-विषयों के डेटा का अलग से विश्लेषण करना आवश्यक है । उदाहरण के लिए, मान लें कि 40 महिलाओं और 60 पुरुषों ने एक नए ड्रग ट्रायल में भाग लिया। उस ट्रायल में 30 प्रतिशत महिलाओं और 5 प्रतिशत पुरुषों में दवा परीक्षण की प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं प्रदर्शित हुईं।   लिंग-विशिष्ट विश्लेषण के अभाव में शोधकर्ता यही निष्कर्ष निकालेंगे कि अमुक दवा में केवल 15 प्रतिशत लोगों में किसी प्रकार की जटिलता का जोखिम है क्योंकि कुल 100 में से मात्र 15 व्यक्तियों में ही ऐसे प्रभाव दिखे। नतीजे के तौर पर यह संख्या इस दवा को बाज़ार में उतारने के उद्देश्य से ‘फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ (FDA) को भी स्वीकार्य होगी।”

“दूसरी ओर  एक लिंग-विशिष्ट विश्लेषण स्पष्ट रूप से दिखाएगा कि महिलाओं द्वारा इस दवा को लेने में जोखिम कहीं ज्यादा है।“ 

“कोविड-19 के रोगियों का इलाज करने वाले अस्पतालों में, प्रतिदिन नई  सूचनाओं के आधार पर प्रोटोकॉल बदल रहे हैं। पूर्व के कोई उदाहरण मौजूद नहीं है, इसलिए तुरत-फुरत दृष्टिकोण विकसित किये जा रहे हैं। हम चीन और इटली के डॉक्टरों से प्राप्त सूचनाओं और हमारे चिकित्सकों के एंटीवायरल और एसएआरएस और एमईआरएस जैसे कोरोना-वायरसों के व्यवहार के ज्ञान का घालमेल कर रहें हैं।   हालाँकि, लिंग-आधारित दवा की खुराक की बात ही छोड़ भी दें तब भी हमारे पास गंभीर रोगियों को दिए जाने वाले कई शक्तिशाली एंटीवायरल की खुराक के ऊंचाई/वजन-आधारित दिशानिर्देश तक नहीं हैं।“ 

“मुझे पता है कि बहुत से लोग कहेंगे कि इस समय  नई और जटिल अनुसंधानीय विधियों पर काम करने की बजाय कोविड-19 की दवाओं और टीकों को बाजार में लाने की जरूरत है। फिर भी मेरा यह मानना है कि यह समय, जितना संभव हो उतना ही डेटा इकट्ठा करने का भी है,  ताकि हम प्रत्येक रोगी के अद्वितीय जीवविज्ञान को केंद्र में रख उसकी व्यक्तिगत उपचार विधि सुनिश्चित कर सकें। इससे न केवल रोगी को अपेक्षाकृत कम जटिलताओं के साथ ज्यादा तेजी से ठीक होने में मदद मिलेगी अपितु इससे पहले से कहीं बेहतर रिपोर्टिंग, विश्लेषण और उपचार के रास्ते भी खुलेंगे।” 

“मेरा दृढ विश्वास है कि लिंग-विशिष्ट शोध को हमारी संवेदनशीलता, बीमारी की गंभीरता, उपचार, फार्मास्यूटिकल्स और वैक्सीनों के सूत्रीकरण की हमारी समझ के साथ एकीकृत किया जा सकता है। और यह किया भी जाना चाहिए। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक परिष्कृत निगरानी और रिपोर्टिंग की प्रणालियाँ मौजूद है।  इस डेटा का उपयोग कोरोनावायरस द्वारा जैविक सेक्स के आधार पर प्रभावित करने के कारणों को समझने में सहायक सिद्ध होगा।  साथ ही भविष्य के सभी स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों पर प्रतिक्रिया और उपचार के लिए हम अपनी क्षमताओं को विकसित कर सकते हैं।“

“जिंदगियां दांव पर हैं।  इन्हें बचाने के लिए हमें बेहतर रास्ते तलाशने ही होंगे।“   


प्रस्तुति एवं अनुवाद- कुमार मुकेश

3 COMMENTS

  1. कुमार जी ।
    अक्सर ऐसा ….पैरा देखने का कष्ट करें।
    उदाहरण मे 30+ 5 =35 है।
    आपने 15 लिखा है।
    संपादक !
    अक्सर उत्कृष्ट विषयों के शानदार लेख बेहद सरल अंकगणितीय गलती लिए होते है। जैसे बडे अंतर वाली प्रतिशत आदि गलत निकालने ।
    मीडिया विजिल ही की बात नहीं। सामान्य प्रेक्षण है।

    • कृपया दोबारा पढ़ें, ‘। उदाहरण के लिए, मान लें कि 40 महिलाओं और 60 पुरुषों ने एक नए ड्रग ट्रायल में भाग लिया। उस ट्रायल में 30 प्रतिशत महिलाओं और 5 प्रतिशत पुरुषों में दवा परीक्षण की प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं प्रदर्शित हुईं। लिंग-विशिष्ट विश्लेषण के अभाव में शोधकर्ता यही निष्कर्ष निकालेंगे कि अमुक दवा में केवल 15 प्रतिशत लोगों में किसी प्रकार की जटिलता का जोखिम है क्योंकि कुल 100 में से मात्र 15 व्यक्तियों में ही ऐसे प्रभाव दिखे।’
      अब इसे पढ़ें
      40 महिलाओं का 30% = 12
      60 पुरुषों का 5% =3
      12+3=15

  2. प्रकृति ने मादा को ज्यादा जूझने वाला बनाना ही था।
    आखिर, अगली पीढियों को तो मादा ने जन्म देना है।

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