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आयुर्वेद-होम्योपैथी से कोरोना ठीक होने का दावा ग़लत, सरकार ने वापस लिया विज्ञापन

अगर सरकार सचमुच आयुर्वेद या तमाम पुरानी चिकित्सकीय पद्धतियों को लेकर गंभीर है तो उसे या उसके मंत्रियों को कोई भी दावा करने से पहले प्रामाणिकता की जांच करनी चाहिए. ऐसे दावे जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं या जो बाद में झूठे साबित हो जाते हैं, उनसे आयुर्वेद या अन्य प्राचीन पद्घतियों का केवल नुकसान ही होना है. 

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प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से बेहतर बताने की ज़िद कितनी भारी पड़ती है, उसकी मिसाल है आयुष मंत्रालय का वह बयान जिसके तहत आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथी दवाओं से कोरोना ठीक करने का दावा करने वाला सरकारी विज्ञापन वापस ले लिया गया है। आयुष मंत्रालय ने कोरोना से बचाव के लिए जिन दवाओं का नाम लिया था, उसके पीछे कोई भी चिकित्सकीय शोध नहीं था और न ही कोई अन्य प्रामाणिकता ही थी.

1 अप्रैल को आयुष मंत्रालय ने एक बयान जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि होम्योपैथी, आयुर्वेद व यूनानी दवाओं से कोरोना वायरस के इलाज से जुड़े सभी विज्ञापनों को वापस लिया जाए. 

इस ख़बर के पीछे की कहानी जानने से पहले यह जान लें कि कोरोना वायरस ने दुनिया के तकरीबन 183 देशों को अपनी चपेट में ले लिया है और 69 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है. इस वायरस से लड़ने के लिए दुनिया भर वैज्ञानिक दवा की खोज में लगे हुए हैं और सबको बताया जा रहा है कि फिलहाल घर में रहना, सामाजिक दूरी बनाये रखना ही सबसे बड़ा उपाय है. लोगों से अपील की जा रही है कि अफवाहों से भी दूर रहें. लेकिन अगर किसी देश की सरकार ही ऐसा करने लगे तो क्या कहेंगे!

आयुष मंत्रालय यानी, आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध एवं होम्योपैथी मंत्रालय ने 29 जनवरी को एक विज्ञापन निकाला. इस विज्ञापन में कहा गया था कि होम्योपैथी, आयुर्वेदिक और यूनानी दवाइयों से कोरोना वायरस का संक्रमण रोका जा सकता है. इस विज्ञापन में बाकायदा कुछ दवाओं का ज़िक्र भी किया गया और कहा गया कि कोरोना वायरस संक्रमण के लक्षणों के आधार पर उसे इन दवाओं के माध्यम से सीमित किया जा सकता है.

इसके बाद इन दावों को लेकर मंत्रालय की आलोचना भी हुई. डॉक्टरों सहित तमाम लोगों ने कहा था कि आयुष मंत्रालय के दावे गलत हैं और कोरोना वायरस के इलाज या उसके संक्रमण को रोकने में सक्षम नहीं हैं. उसके बाद वही हुआ जो पिछले कुछ सालों में रवायत के तौर पर होता आ रहा है. आयुष मंत्रालय के दावों को गलत बताने वाले लोगों का विरोध हुआ और जमकर ट्रोलिंग हुई. जबकि कुछ दिनों में ही ऐसे अध्ययन सामने आने लगे थे कि आयुष मंत्रालय ने कोरोना से बचाव के लिए जिन दवाओं का नाम लिया था, उसके पीछे कोई भी चिकित्सकीय शोध नहीं था और न ही कोई अन्य प्रामाणिकता ही थी. लेकिन, उस वक़्त किसी ने इन पर ध्यान नहीं दिया.

अगर 29 जनवरी को उनके पास कोरोना से लड़ाई में सक्षम दवाओं की प्रामाणिक जानकारी थी, तो 1 अप्रैल को आयुष मंत्रालय ने खुद ही अपने दावे को वापस क्यों लिया? और इन 62 दिनों के फेर में सरकार की हर बात पर भरोसा करने वाले बहुत से लोगों ने आयुष मंत्रालय के विज्ञापन पर भी भरोसा किया था. ज़ाहिर है कि जिन दवाइयों का ज़िक्र किया गया था उस विज्ञापन में, उसका सेवन भी बहुतों ने किया होगा. अब अगर इन दवाओं के सेवन से कोई साइड इफेक्ट होता है तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

हाल में आयुष मंत्रालय के केंद्रीय राज्यमंत्री और गोवा से भाजपा सांसद श्रीपद येसो नाइक ने यहां तक दावा कर दिया था कि कोरोना संक्रमित ब्रिटेन के युवराज प्रिंस चार्ल्स का इलाज आयुर्वेदिक पद्धति से किया गया है. इस दावे को प्रिंस चार्ल्स के प्रवक्ता ने त्वरित गति से खारिज़ कर दिया था. बाद में स्वयं श्रीपद नाइक ने सफाई दी कि मुझे बैंगलौर के डॉक्टर इज़ाक मथाई ने यह जानकारी दी थी. निरंकुश शासन के दौर में मंत्री जी से अब यह कौन पूछे कि उन्होंने ऐसा दावा करने से पहले पुष्टि करने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी?

सवाल तो यह भी है कि अगर 29 जनवरी तक कोई प्रामाणिकता उपलब्ध नहीं थी तो ऐसा विज्ञापन देने की क्या आवश्यकता थी आयुष मंत्रालय को, वह भी कोरोना जैसी अंतरराष्ट्रीय महामारी के समय में? और सरकार की तरफ से ऐसी सारी गलतियां जनता से सीधे जुड़ने वाले मामलों में ही क्यों होती हैं? क्या इसे सिर्फ़ संयोग माना जाए?

अगर सरकार सचमुच आयुर्वेद या तमाम पुरानी चिकित्सकीय पद्धतियों को लेकर गंभीर है तो उसे या उसके मंत्रियों को कोई भी दावा करने से पहले प्रामाणिकता की जांच करनी चाहिए. ऐसे दावे जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं या जो बाद में झूठे साबित हो जाते हैं, उनसे आयुर्वेद या अन्य प्राचीन पद्घतियों का केवल नुकसान ही होना है.