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मोदी को हराने के लिए चार चरण के बाद अरुंधति सहित 600 से ज्‍यादा बुद्धिजीवियों ने की अपील

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यह तस्‍वीर लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान वाराणसी के कबीर मठ में आयोजित सांस्‍कृतिक प्रतिरोध की है जिसमें नरेंद्र मोदी को हराने की अपील की गई थी

लोाकसभा चुनाव में मतदान के चार चरण समाप्‍त हो जाने के बाद छह सौ से ज्‍यादा लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों और नागरिक समाज के सदस्‍यों की ओर से एक अपील जारी की गई है। हस्‍ताक्षर करने वालों की कुल तीन सूचियां हैं। इस अपील के पहले लेखक संगठनों ने समवेत रूप से चुनाव शुरू होने से ठीक पहले 9 अप्रैल को ऐसी ही एक अपील जारी की थी। इस अपील को अरुंधति राय और कांचा इलैया ने भी समर्थन दिया है।

हम मतदाताओं से अपील करते हैं कि लोकसभा चुनाव-2019 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हराने के लिए वोट दें। मतदाताओं से अपील है कि वे युद्धोन्माद फ़ैलाने वाली और झूठे राष्ट्रवाद के नाम पर देश को विभाजित करने वाली शक्तियों के विरुद्ध वोट करें। नफरत व हिंसा की ताकतों को पराजित करें। लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत के लिए वोट करें। मतदाताओं से अपील है कि कारपोरेटपरस्त, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तापरस्त, साम्प्रदायिक फासीवादी पार्टी भाजपा को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए वोट दें। नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री न बनें, इसके लिए वोट दें।

भारत की विविधता व बहुलता और चयन व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिए वोट दें। अपनी मर्जी से रहने, खाने, पीने और पहनने की आज़ादी को बचाने के लिए वोट करें।  एकजुट हों। समर्थन देने के लिए आगे आएं।

हस्‍ताक्षरकर्ताओं की चार सूचियां नीचे प्रस्‍तुत हैं:

APPEAL final draft

1 COMMENT

  1. मालूम चला है कि भारत के 600 बुद्धिजीवियों कलाकारों आदि ने मोदी सरकार को वोट न देने की अपील करी है हालांकि अपील का मजमून आंखों के सामने नहीं है परंतु ऐसी आशंका है कि इसमें अर्थशास्त्री पहलू को
    की अनदेखी की गई होगी जैसे कि 2014 में भारत के 75 सबसे बड़े पूंजीपतियों ने 30 ,000 करोड रुपया भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में बिठाने हेतु चुनाव अभियान में दिया था इस समय भारत के पूजीपती वर्ग को दुनिया के अन्य पूंजीपति वर्ग की तरह ही घोर प्रतिक्रियावादी पार्टियों की आवश्यकता है जो जनता का ध्यान रोजी-रोटी के आर्थिक मुद्दों से भटका सक।े ऐसे में भला भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों पीछे रहें ।भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अन्य राजनीतिक संघर्ष तो छोड़िए जनता की अठन्नी चवन्नी की लड़ाई यानी आर्थिक संघर्ष से भी किनाराकसी कर चुकी है ।जैसे कि साल में एक दो दिन की अनुष्ठान हड़ताल करना उसे भी एक 2 घंटे की हड़ताल में ही बदल देना । मई दिवस को बेहद घबराते हुए मनाना और इन दोनों ही कार्यक्रमों में बिल्कुल प्रचार ना करना । न कहीं पर पर्चे छापना न कहीं पोस्टर अभियान चलाना । ठेका मजदूरों के मुद्दे हो या छोटे किसानों के मुद्दे ये बड़े किसानों के मुद्दों से या अभिजात्य मजदूरों के मुद्दों से बेहद अलग है । यही सबसे क्रांतिकारी वर्ग है इसको साथ लेने में हमारे संशोधन वादी पार्टियों को पेंट गीली होती है।भारत के तथाकथित बहुत माने जाने वाले न्यूज़ मीडिया पोर्टल तक मे संशोधन वादी सीपीआई ,सीपीएम मार्ले की आलोचना करने की परंपरा नहीं रही है यह सब इसके बावजूद कि मजदूरों के पहले अंतरराष्ट्रीय संगठन कम्युनिस्ट लीग , प्रथम इंटरनेशनल व दूसरे इंटरनेशनल में मार्क्स एंगेल्स और लेनिन ने अपने देशों और दूसरे देशों ,अंतर राष्ट्रीय आंदोलन में मौजूद संशोधन वादी अवसरवादी तत्वों का पर्दाफाश किया और संशोधन वादियों को वामपंथी कतारों में पूजीपतियों के एजेंट करार दिया देश में पहले सांप्रदायिक दंगे जबलपुर में हुए जो कि नेहरू के काल में हुए । राम लला की अयोध्या में मूर्ति स्थापना भी आजादी के तुरंत बाद नेहरू के काल में ही हुई ।यानी कि तमाम जाति और धार्मिक विभाजनों को नेहरू इंदिरा और राजीव गांधी सरकार द्वारा पाला पोसा ही नहीं बढ़ाया गया ताकि जनता के आर्थिक संघर्षों को बांटा जा सक।े आज वही जमीन है जिस पर भाजपाrss जैसे विषैले खरपतवार उगा हुआ है

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