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लाल क़िले से ‘निश्चिंतता’ का छद्म रचते मोदी और ‘घेटो’ बनता देश !

असल में जो इस देश के संप्रभु चरित्र के विरूद्ध खड़े थे ,वे ही मोदी के प्रेरणा स्रोत हैं। यही वह चीज है जो उनको प्रतिगामी बना रही है। प्रतिगामी ताकतों के सामने वे समर्पण कर चुके हैं। इस क्रम में आम जनता में व्याप्त प्रतिगामी चेतना और सामाजिक समूहों को अपने पीछे गोलबंद करने में सफल हो गए हैं। मोदी पहले पीएम हैं जो प्रतिगामी विचारों की खुली हिमायत करते हैं,उनके मंत्रीमंडल के लोग भी यही काम कर रहे हैं।असल समस्या यह है कि प्रतिगामिता को कैसे रोकें ?

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लाल क़िला और मोदी की भाषण शैली

 

लालक़िले की प्राचीर से आज मोदीजी का भाषण सुनकर यही लगा चलो देश निश्चिंत हुआ देश में मोदी शासन में बहुत तरक्की हुई है।देश बुलंदियों को छू रहा है। कोरोना से कोई तबाह नहीं हुआ,कोई बीमार नहीं पडा,कोई मरा नहीं। कोई संकट नहीं ,मौतें नहीं, किसानों की आत्महत्या नहीं, दहेज हत्या और स्त्री उत्पीडन नहीं , आईटी और औद्योगिक जगत में कोई संकट नहीं, बेकारी नहीं, साम्प्रदायिक हिंसाचार नहीं!सब कुछ अमन-चैन में बदल चुका है।देश को बस संकल्पों की जरूरत थी! संकल्पों का अभाव था , मोदीजी ने देश को संकल्पों से भर दिया।

लालकिले की प्राचीर पीएम का रोजनामचा बताने की जगह हो गई है। उनको कम से कम दिन और मंच का तो ख्याल रखना चाहिए।कोई नीतिगत नई घोषणा नहीं,कोई नए कार्यक्रम का एलान नहीं।सिर्फ समय खाना ।यह तो टीवी दर्शकों के ऊपर जुल्म है।

१५अगस्त का मतलब उन्माद नहीं लोकतंत्र है।राष्ट्रवाद नहीं लोकतंत्र है।उन्माद और राष्ट्रवाद तो १५अगस्त के शत्रु हैं।शत्रुओं को परास्त करो,लोकतंत्र का विस्तार करो। सवाल उठता है पीएम नरेन्द्र मोदी उदात्त भाव से क्यों नहीं बोलते, वे हमेशा अहंकार और प्रतिस्पर्धा के भाव में बोलते हैं!यह लोकतंत्र विरोधी भाव है।

 

राजनैतिक अंधविश्वास हैं नरेन्द्र मोदी !

 

नरेन्द्र मोदी के भाषणों की धुरी है ” मेरा कर्म”,” मेरा पुरूषार्थ!” इन दोनों के परिप्रेक्ष्य में वे जब बोलते हैं तो सीधे संविधान के परे चले जाते हैं। पुरूषार्थ के आवरण में छिपते हैं। आज भी वे मर्दानगी की भाषा में बोले।

“पुरूषार्थ =” मर्दानगी की विचारधारा का महत्वपूर्ण विचारसूत्र है। मर्दानगी जनता को प्रिय है। इसलिए वे सबसे अधिक जनप्रिय भी हैं। मर्दानगी निहित स्वार्थ से परे देख ही नहीं पाती और इसमें सबसे ज्यादा मुश्किलें हाशिए के लोगों को झेलनी पड़ती हैं क्योंकि मर्दानगी का हाशिए के लोगों से बैर है । मुसलमान, औरतें, आदिवासी,मजदूर ,किसान आदि हाशिए के वर्ग और समुदाय हैं।

विगत छह सालों में मनमानी करके मोदी सरकार के हौसले बुलंदी पर हैं! पहले नोटबंदी और आधार कार्ड की अनिवार्यता ने बड़े पैमाने पर सताया, रही सही कसर जीएसटी ने पूरी कर दी, इन सब मनमाने फैसलों से भाजपा का मन बढ़ा हुआ है अब वो बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को लेकर चल रही है, वे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने का संकल्प लेकर आ चुके हैं, 370 को समाप्त कर चुके हैं,भारत के नक्शे से जम्मू कश्मीर राज्य खत्म कर चुके हैं।
मौजूदा दौर नोटबंदी और आधार कार्ड की अनिवार्यता से भी ज्यादा बड़े गहरे उत्पीड़न और सामाजिक टकराव का है। इससे तनावों की सृष्टि होगी।

मोदीजी जब भाषण देते हैं तो उनके बोलने का ढ़ंग कुछ ऐसा होता है कि उनकी बात सुनकर उन्हें केवल छोड़ दिया जाय। उनके भाषण क्रियाहीन भाषण के आदर्श नमूना हैं।भाषण उनके कार्य का वाहक नहीं है,लेकिन कार्य के ढोंग के प्रदर्शन के आदर्श नमूने हैं।

अरस्तू ने कहा था नाटक का निर्णायक नियम है क्रिया। राजनीतिक भाषण-कला का भी यही नियम है। मोदी के 15अगस्त के अब तक के भाषण देख लें।ये सभी भाषण विलक्षण क्रियाहीनता, निर्वैयक्तिकता और झूठ के सहमेल से तैयार किए गए हैं।ये भाषण न तो देश के उपयुक्त हैं,न काल के और न ही अवसर के।मोदी अपने भाषण में शब्दों को पीस-पीसकर बोलते हैं। यह संवेदनाहीन भाषा है।

अटलबिहारी बाजपेयी और नरेन्द्र मोदी में बुनियादी अंतर यह है कि अटल के लिए लोकतंत्र और संविधान प्रमुख था,मोदी के लिए मैं,हिंदुत्व और संघ का आदेश प्रमुख है। यही वजह है केन्द्र से लेकर राज्यों तक हिंदुत्व और संघ के एजेण्डे पर भाजपा सरकारें सरपट दौड़ रही हैं। इससे आरएसएस बनाम जनता का अंतर्विरोध पैदा हुआ है, यह अंतर्विरोध पहले नहीं था।

हम तो मित्रों से यही कहेंगे कि 15 अगस्त पर भारतीय फासिज्म से लड़ने की प्रतिज्ञा करो,फासिज्म को समझो और समझाओ,विभ्रमों से बाहर निकलो।

आरएसएस के सत्तारुढ होने के बाद हम सबकी चुनौतियां और राजनीतिक लक्ष्य बदल गए हैं, बदले समय को मोदीमोह से बाहर निकलकर देखो, रौरव नरक नजर आएगा। आतंक और भय का वातावरण दिखाई देगा। मीडिया का चूरन बनता नजर आएगा। मीडिया का मालिक गुलाम नजर आएगा, मीडिया कर्मी गुलाम का गुलाम नजर आएगा।कोरोना काल में मोदी ने जनता को असहाय छोड़ दिया है। उसकी रोजी-रोटी छीन ली है।अर्थव्यवस्था अराजक हाथों में फेस गई है।

हम सबके अंदर राष्ट्रप्रेम है, हम सब राष्ट्र को खुशहाल और संप्रभु राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं लेकिन वे सारे देश को फासिज्म के जाल में फंसाकर बंधक बनाकर रखना चाहते हैं।

आरएसएस और उसके बमबटुक सारी जिंदगी तिरंगे झंड़े, संविधान,कांग्रेस नेताओं, संविधान के मूल लक्ष्यों और उद्देश्यों का विरोध करते रहे हैं, आज ये लोग केन्द्र और राज्यों में सत्ता में हैं, केन्द्र का समूचा तंत्र उनके हाथ में है, वे हर स्तर पर सरकारी मशीनरी को प्रदूषित कर रहे हैं। पेशेवर गुणवत्ता, अकादमिक-प्रशासनिक क्षमता आदि को उन्होंने आरएसएस के तमगे के नीचे दफन कर दिया है, ऐसा देश में पहले कभी नहीं हुआ।

आरएसएस के डफर लोगों को सत्ता के सभी महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया गया है।चुन-चुनकर योग्य लोगों को अपमानित किया जा रहा है, सरेआम उत्पीड़न किया जा रहा है।यह प्रक्रिया सारे देश में चल रही है।लोकतंत्र तो अब दूर की कौड़ी है, हम सबको अस्तित्व बचाने के संघर्ष में झोंक दिया गया है। मुश्किल यहां पर है कि शिक्षितों का बहुत बड़ा तबका मोदीमोह में डूबा हुआ है। मोदीमोह यानी फासिज्म का मोह। 15अगस्त आ रहा है तो खुद लिखो कि आपके शहर में 74 साल में क्या नया बना है और बिगड़ा है। शेयर करने की आदत से बाहर निकलो, स्वयं बोलना सीखो, लिखना सीखो, फेसबुक की शक्ति को अपनी ताकत बनाओ, गूंगे रहकर फेसबुक पर शेयर करने की मनोदशा से बाहर निकलो।

हम सबके शहर या गांव में आज क्या हालात हैं,लोग कैसे हैं,राजनीति किस तरह करवट बदल रही है,बच्चों,औरतों, मजदूरों, किसानों के क्या हालात हैं,इन सब विषयों पर लिखो,कुछ न सही आपने बाजार पर ही लिखो।अनुकरण करना छोड़ो। स्वाधीनता का अर्थ अनुकरण नहीं आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता है।

15 अगस्त महज एक तारीख या जश्न का दिन या इवेंट नहीं है बल्कि इतिहास है।यह इतिहास उन लोगों का जिन्होंने इसको रचा है।जिन लोगों ने रचा है उनमें नेता भी हैं जनता भी है,इसमें अनेक रंगत के क्रांतिकारी और उदार विचारक-नेता-लेखक भी हैं। यह आम्बेडकर -गांधी-नेहरू का देश है। मोदी नमूने के तौर पर इनमें से दो तीन के कभी कभार नाम लेते हैं। मोदी को स्वाधीनता संग्राम की चेतना,भावना और विचारधारा एकदम नापसंद है।असल में जो इस देश के संप्रभु चरित्र के विरूद्ध खड़े थे ,वे ही मोदी के प्रेरणा स्रोत हैं। यही वह चीज है जो उनको प्रतिगामी बना रही है। प्रतिगामी ताकतों के सामने वे समर्पण कर चुके हैं। इस क्रम में आम जनता में व्याप्त प्रतिगामी चेतना और सामाजिक समूहों को अपने पीछे गोलबंद करने में सफल हो गए हैं। मोदी पहले पीएम हैं जो प्रतिगामी विचारों की खुली हिमायत करते हैं,उनके मंत्रीमंडल के लोग भी यही काम कर रहे हैं।असल समस्या यह है कि प्रतिगामिता को कैसे रोकें ?

15अगस्त का इतिहास जब भी पढा जाएगा,या इस दिन को याद किया जाएगा तो उन लोगों और उन विचारधाराओं पर नजर रखने की जरूरत है जिनके कारण देश टूटा,सामाजिक सद्भाव नष्ट हुआ,जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी की और स्वतंत्रता के मार्ग में बाधाएं खड़ी कीं।

पहले कुछ घेटो मुहल्ले या गलियां थीं, मोदी सरकार को श्रेय जाता है कि उसने घेटो कल्चर को टीवी और ह्वाट्सएप विश्वविद्यालय के जरिए घरों में पहुंचा दिया। आजकल हिंदू समाज का एक अच्छा खासा हिस्सा घेटो कल्चर में कैद कर दिया गया है। उनके लिए मोदी महान है,दूध का धुला है,सब कुछ अच्छा कर रहा है।यदि पलटकर पूछो कि क्या अच्छा कर रहा है तो मुंह से उत्तर नहीं निकलता।घेटो कल्चर यही है,वे जिसमें जीते हैं उसके अंधविश्वासों से घिरे रहते हैं।मीडिया और आरएसएस की सबसे बड़ी सफलता है कि उसने नरेंद्र मोदी को राजनीतिक अंधविश्वास बनाकर जनता के मन में उतार दिया है।

आरएसएस को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने मोदी के जरिए भारत- पाक के बीच कूटनीतिक तनाव पैदा करने में सफलता हासिल कर ली है।समाज के विभिन्न पेशेवर लोगों में भय पैदा करने में सफलता हासिल कर ली है।टीवी से कश्मीर की खबरें गायब कर दी हैं। कश्मीर की जनता कैद है,अधिकारहीन है।



प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी राजनीतिक-सामाजि और मीडिया विश्लेषक  हैं। जेएनयू छात्रसंघ और हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।



 

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