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ढाई साल की कोशिशों के बाद परवान चढ़ी मोहन भागवत और अरशद मदनी की मुलाकात

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लखनऊ: आरएसएस चीफ मोहन भागवत और मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी के बीच RSS के दिल्ली मुख्यालय में हुई मुलाक़ात उनके लिए गलत है जो साम्प्रदायिकता का चोला पहन माहौल ख़राब करने का प्रयास करते रहते हैं। जो इस मुल्क में अमन चाहते हैं उनके लिए ये मुलाक़ात अच्छी पहल मानी जा रही है।

यह मुलाक़ात तक़रीबन एक घंटा तीस मिनट चली। हमारे सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक मुलाक़ात का समय मात्र तीस मिनट का था लेकिन मुलाक़ात आरएसएस के बदल रहे नज़रिये के मुताबिक और जमीअत के हमेशा के नज़रिये हिन्दू-मुस्लिम एकता के मुताबिक ख़ुशगवार माहौल में चलती रही जिसके बाद यह मुलाक़ात लंबी हो गई।

इस महत्वपूर्ण चर्चा में मात्र तीन लोग शामिल रहे- मोहन भागवत, हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी और भाजपा के ट्रेनिंग कैंप के प्रभारी सुनील पाण्डेय। भागवत से मुलाक़ात कर बाहर निकल रहे मौलाना से रामलाल की मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात में रामलाल का कोई वास्ता नहीं रहा।

इस मुलाक़ात के बाद हलके में बहुत हलचल देखी जा रही है क्योंकि जमीअत उलेमा-ए-हिन्द मुसलमानों का आजादी से पहले ही नेतृत्व करता चला आ रहा है। जमीअत की स्थापना से लेकर आज तक जमीअत मुल्क की एकता के लिए काम करती चली आ रही है। बँटवारे के टाइम भारत में रहे मुसलमान जमीअत की वजह से ही भारत में रहे थे। आज के हालात की वजह से जमीअत पर इस बात का भी दबाव देखा व समझा जा रहा है कि हम आपकी वजह से यहाँ रहे और देखो हमारे साथ क्या हो रहा है। ये प्रेशर भी जमीअत पर देखा जा रहा है।

इस मुलाक़ात को कराने में भाजपा के पूरे भारत के ट्रेनिंग कैंपों के प्रभारी और पहले आरएसएस में बड़े जिम्मेदार पदों पर आसीन रहे आरएसएस के सुनील पाण्डेय ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। सुनील पाण्डेय ने हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी तक पहुँचने के लिए देवबन्द के पंडित अश्वनी मुदगल एडवोकेट का इस्तेमाल किया जिसने जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी तक आरएसएस का संदेश पहुँचाने में सुनील पाण्डेय की मदद की कि आरएसएस के चीफ मोहन भागवत आपसे मिलना चाहते हैं।

यह सिलसिला तक़रीबन ढाई साल से चल रहा था जो अब जाकर संभव हो सका है। ढाई साल पहले देवबन्द में सुनील पाण्डेय की मुलाक़ात हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी से हुई ।थी इस मुलाक़ात की रूपरेखा तभी से तैयार हो गई थी।

मौलाना अरशद मदनी की मोहन भागवत से मुलाक़ात को सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है क्योंकि मुल्क के हालात ठीक नहीं हैं। इसलिए सुलह की कोशिश आख़री उम्मीद तक करनी चाहिए और मौलाना अरशद मदनी की नीयत पर कम से कम शक बिलकुल नहीं किया जा सकता है। हाँ, अगर ये मुलाक़ात अन्य कोई और मौलाना करते तो उनपर हज़ार बार शक होता, हर किसी पर एक हिसाब से यक़ीन नही किया जा सकता है। जहाँ तक हज़रत मौलाना की बात है जबसे हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी ने जमीअत की कमान सँभाली है तब से जमीअत की कारगुज़ारी में ज़मीन आसमान का फ़र्क महसूस किया जा सकता है, ऐसा लोगों का मानना है।

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