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नहीं रहे कुलदीप नैयर, अंत्‍येष्टि से पहले इमरजेंसी-विरोध के नाम पर संघी राजनीति चालू

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वरिष्‍ठ पत्रकार कुलदीप नैयर नहीं रहे। कल रात दिल्‍ली के एक अस्‍पताल में उनका निधन हो गया। वे 95 साल के थे।

उनकी अंत्‍येष्टि दिन में एक बजे लोदी रोड स्थित विद्युत शवदाह गृह में होगी।

सुबह उनकी मौत की ख़बर आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्‍यक्ष अमित शाह ने श्रद्धांजलि स्‍वरूप ट्वीट किए लेकिन उसमें अपनी संघी राजनीति को चुपके से घुसा दिया।

नैयर के इमरजेंसी विरोधी होने के बहाने कांग्रेस विरोधी राजनीति को साधने का काम उनके निधन के तुरंत बाद सत्‍ताशीर्ष से ही शुरू हो गया। इमरजेंसी विरोध के अलावा लाल बहादुर शास्‍त्री की ताशकंद में मौत के राज़ को लेकर भी नैयर पर फब्तियां कसी जा रही हैं।

ऐसा तब है जब जबकि इंडियन एक्‍सप्रेस के पूर्व संपादक और पूर्व राज्‍यसभा सांसद रहे कुलदीप नैयर ताजिंदगी सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ़ लड़ते रहे, भारत और पाकिस्‍तान के बीच ट्रैक-2 कूटनीति के लिए कोशिश करते रहे और जब तक घुटनों में बल रहा तब तक मानवाधिकारों के पक्ष में लगातार जूझते रहे। वे किसी के भी बुलाने पर अगर स्‍वस्‍थ होते तो एक बार में कार्यक्रमों में चले आते थे। यहां तक कि पिछले दिनों जब वे चलने-फिरने में असमर्थ थे तब भी उन्‍हें दिल्‍ली के एकाध सामाजिक कार्यक्रमों में देखा गया।

इतनी यशस्‍वी सार्वजनिक जिंदगी ‍बिताकर गए इस शख्‍स के लिए जिस किस्‍म की नफ़रत सुबह से देखने को मिल रही है, वह निंदनीय है।

कुछ बड़े नेताओं और शख्सियतों ने उन्हें निम्‍न शब्‍दों में श्रद्धांजलि दी है:

 

 

 

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