Home ओप-एड सरकारी भोंपू: अंग्रेज़ी का जागरण बनता इंडियन एक्सप्रेस !

सरकारी भोंपू: अंग्रेज़ी का जागरण बनता इंडियन एक्सप्रेस !

पत्रकारिता यह नहीं है कि सरकार का भोंपू बन जाया जाए। खासकर इंडियन एक्सप्रेस के लिए जब उसकी टैगलाइन है- ‘जर्नलिज्म ऑफ करेज।’ निश्चित रूप से इंडियन एक्सप्रेस इस शीर्षक के बचाव में कुछ तर्क दे सकता है। मैं नहीं ले रहा हूं या उसकी चर्चा नहीं करना चाहता हूं पर सूचना यह है कि टेलीग्राफ में यह खबर मुझे नहीं दिखी। द टेलीग्राफ में आज बंगाल और कोलकाता की खबर लीड है और यह खबर अंदर भी प्रमुखता से छपी नजर नहीं आई। छोटी मोटी हो तो मैं नहीं कह सकता। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर एक खबर है, बिहार में डॉक्टर की मौत का कारण खराब पीपीई को बताया गया। मतलब हम पीपीई किट तो बढ़िया नहीं बना पा रहे। आयात विकल्प बना लेंगे और वो खराब हुए थो? ऐसे में यह आराम से कहा जा सकता है कि ये खबर इतनी बड़ी नहीं है कि इसे इतनी प्रमुखता दी जाए। ठीक है कि और भी अखबारों में है। पर इंडियन एक्सप्रेस अलग होता था। वह भाजपा या सरकार का भोंपू नहीं है। वह सरकार से नहीं डरता  था। जब तक हमलोग यह मान नहीं लेते हैं कि इंडियन एक्सप्रेस भी वही है तब तक ऐसी खबरों से दुख होगा और इस तरह की तुलना होती रहेगी। हालांकि, सरकार का समर्थन या प्रचार ही करना हो तो दैनिक जागरण इंडियन एक्सप्रेस के मुकाबले बेहतर लग रहा है। 

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आज ज्यादातर अखबारों में सरकारी विज्ञप्ति लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में भी। बोफर्स के जमाने में इसे सत्ता विरोधी या प्रतिष्ठान विरोधी कहा जाता था। कांग्रेस के शासन में या इमरजेंसी में इसका रुख सब लोग जानते हैं। इसमें इस बात का कोई मतलब नहीं रहा है कि संपादक कौन है। यह अलग बात है कि बोफर्स के जमाने में अरुण शौरी संपादक थे और रिलायंस के खिलाफ एस गुरुमूर्ति के लेख छपा करते थे। अब इंडियन एक्सप्रेस में जो हो रहा है वह वाकई पत्रकारिता के लिए चिन्ताजनक है। खासकर इसलिए भी यह रामनाथ गोयनका के नाम पर पत्रकारिता का पुरस्कार देता है। लीड के चुनाव और शीर्षक में बदलाव के साथ सत्ता के खिलाफ धार में जो कमी अब मैं देख रहा हूं वह चिन्ताजनक है। आज की इस खबर से संबंधित अंग्रेजी में जारी सरकारी विज्ञप्ति का हिन्दी अनुवाद अगर मैं करता तो कुछ इस प्रकार होता- आत्म निर्भर भारत की पहल को रक्षा मंत्रालय का बड़ा समर्थन या सहयोग; रक्षा उत्पादन के देसी-करण को बढ़ावा देने के लिए दी गई समय सीमा के बाद आयात पर प्रतिबंध। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है- सरकार ने रक्षा उपकरणों से संबंधित 101 आयटम का आयात प्रतिबंधित किया। फ्लैग शीर्षक है – आत्म निर्भर होने की पहल पर जोर : राजनाथ। 

शीर्षक पढ़कर कोई भी चौंकेगा। चीन से युद्ध जैसी स्थिति चल रही और सरकार रक्षा उपकरणों के आयात पर प्रतिबंध लगा रही है। ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन आप मानकर चल रहे हों कि चीन भारत की सीमा में आया ही नहीं और पीछे चला गया तो बात अलग है। पर वास्तविकता यह नहीं है। भले ही कोशिश हो कि जनता को ऐसा ही समझाया जाए। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक सामान्य नहीं है। इसीलिए मैंने सरकारी विज्ञप्ति की चर्चा की। दूसरे अखबार देखे और यह सब आपको बता रहा हूं। यह बहुत असामान्य है कि विकल्प की व्यवस्था किए बगैर आयात पर रोक लगा दी जाए। वह भी सैन्य उपकरणों के मामले में। कायदे से तो विकल्प के बिना चीनी ऐप्प पर रोक का भी विरोध किया जाना चाहिए पर सेना का मामला तो बहुत ही संवेदनशील है। बेशक, ऐसे शीर्षक चौंकाते हैं, खबर पढ़ने के लिए उकसाते हैं। हो सकता है मकसद यही हो पर यह खबर पढ़वाने का यह फूहड़ तरीका है और ऐसा किया भी क्यों जाए। सरकार के पास प्रचार के अपने तरीके हैं। इस सूचना से जनता का कोई भला नहीं होना है और राजनीति के लिए जरूरत होगी तो पार्टी अपने ढंग से काम करेगी। 

पत्रकारिता यह नहीं है कि सरकार का भोंपू बन जाया जाए। खासकर इंडियन एक्सप्रेस के लिए जब उसकी टैगलाइन है- ‘जर्नलिज्म ऑफ करेज।’ निश्चित रूप से इंडियन एक्सप्रेस इस शीर्षक के बचाव में कुछ तर्क दे सकता है। मैं नहीं ले रहा हूं या उसकी चर्चा नहीं करना चाहता हूं पर सूचना यह है कि टेलीग्राफ में यह खबर मुझे नहीं दिखी। द टेलीग्राफ में आज बंगाल और कोलकाता की खबर लीड है और यह खबर अंदर भी प्रमुखता से छपी नजर नहीं आई। छोटी मोटी हो तो मैं नहीं कह सकता। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर एक खबर है, बिहार में डॉक्टर की मौत का कारण खराब पीपीई को बताया गया। मतलब हम पीपीई किट तो बढ़िया नहीं बना पा रहे। आयात विकल्प बना लेंगे और वो खराब हुए थो? ऐसे में यह आराम से कहा जा सकता है कि ये खबर इतनी बड़ी नहीं है कि इसे इतनी प्रमुखता दी जाए। ठीक है कि और भी अखबारों में है। पर इंडियन एक्सप्रेस अलग होता था। वह भाजपा या सरकार का भोंपू नहीं है। वह सरकार से नहीं डरता  था। जब तक हमलोग यह मान नहीं लेते हैं कि इंडियन एक्सप्रेस भी वही है तब तक ऐसी खबरों से दुख होगा और इस तरह की तुलना होती रहेगी। हालांकि, सरकार का समर्थन या प्रचार ही करना हो तो दैनिक जागरण इंडियन एक्सप्रेस के मुकाबले बेहतर लग रहा है। 

 

मैं अब दैनिक जागरण नहीं देखता पर एक मित्र ने बताया कि उसमें शीर्षक है, देश में ही होगा मिसाइल से लेकर रडार तक का निर्माण। उपशीर्षक है : बड़ा एलान – 101 हथियारों और सैन्य उपकरणों के आयात पर लगेगी रोक, रक्षा क्षेत्र में आत्म निर्भरता की ओर बढ़ेंगे कदम। बेशक, अगर सरकार का प्रचार करना है तो यह बेहतर और विश्वनीय लगने की कोशिश तो है। मुझे लगता है यथार्थ के करीब भी है। आपकी सुविधा के लिए मैं सरकारी विज्ञप्ति के सरकारी हिन्दी अनुवाद का भी शीर्षक बता देता हूं। यह इंटरनेट पर आराम से उपलब्ध है। आत्म-निर्भर भारत पहल के लिए रक्षा मंत्रालय की बड़ी कोशिश; रक्षा उत्पादन के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिए दी गई समय सीमा के बाद101 वस्तुओं पर आयात प्रतिबंध। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों शीर्षक के मुकाबले सरकारी विज्ञप्ति का शीर्षक ज्यादा संतुलित और कम प्रचारात्मक है। सूचना ही देती है। पर अखबार तो हद कर दे रहे हैं।   

आज मैं जो अखबार देख पाया उनके शीर्षक इस प्रकार हैं  

  1. इंडियन एक्सप्रेस 

सरकार ने रक्षा उपकरणों से संबंधित 101 आयटम का आयात प्रतिबंधित किया 

फ्लैग शीर्षक है – आत्म निर्भर होने की पहल पर जोर : राजनाथ  

दिसंबर से निगेटिव लिस्ट, देसी फर्मों को चार लाख करोड़ रुपए मूल्य के ऑर्डर मिल सकते हैं   

 

  1. हिन्दुस्तान टाइम्स

भारत सेना के 101 प्रमुख आयटम का आयात बंद कर देगा

आत्मनिर्भरता : मिसाइल, विमान, यूएवी समेत प्रमुख खरीदारी पर पांच साल का एम्बार्गो 

 

  1. द हिन्दू 

रक्षा मंत्रालय 101 आयटम के आयात पर एम्बार्गो लगाएगा 

राजनाथ सिंह ने कहा कि मकसद देसी उत्पादन को बढ़ावा देना है

 

  1. टाइम्स ऑफ इंडिया 

    रक्षा से संबंधित 101 आयटम का आयात धीरे-धीरे प्रतिबंधित किया जाएगा  

  1. दैनिक जागरण 

देश में ही होगा मिसाइल से लेकर रडार तक का निर्माण  

उपशीर्षक है : बड़ा एलान – 101 हथियारों और सैन्य उपकरणों के आयात पर लगेगी रोक, रक्षा क्षेत्र में आत्म निर्भरता की ओर बढ़ेंगे कदम।  

गौर कीजिए कि सबके शीर्षक भविष्यकाल में हैं। सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक से ऐसा लगता है जैसे किसी सरकार विरोधी से कहा गया हो कि नौकरी करनी है तो सरकार का विरोध नहीं कर सकते हैं। और मजबूरी में वह मन से काम नहीं कर पा रहा हो। सच चाहे जो हो – इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता चिन्ता में डालती है।  



लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



 

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