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साई बालाजी को अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए “अशुद्ध रक्त” बताया ‘चितपावन अस्मितावादियों’ ने!

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” ये कैसा है रे तेरा मोदी जी……!”

13 सितंबर शाम जेएनयू छात्रसंघ में प्रशीडेंशियल डिबेट के दौरान वाम छात्र संगठनों की ओर से अध्यक्षीय प्रत्याशी एन.साई बाला जी गहरी पीड़ा में डूबी ये आवाज़ जैसे अपने युग पर एक आह भरी टिप्पणी जैसी थी जो देशद्रोही होने का कलंक झेल रहे जेएनयू के एक योद्धा छात्रनेता के दिल से निकली थी। साई बाला जी, ज़ाहिर हैं दक्षिण भारतीय होने के नाते हिंदी में उतने सहज नहीं थे, लेकिन उन्होंने अंग्रेज़ी नहीं हिंदी में भाषण देना चुना था और देशभर में दलितों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के दमन, सरकार की कारपोरेट परस्त नीतियों और संसाधानों की लूट के साथ-साथ जेएनयू से लेकर बीएचयू तक हो रहे छात्रों के दमन को अपनी तक़रीर में मुद्दा बनाया।

आइसा नेता एन.साई बाला जी अब जेएनयू के नए अध्यक्ष हैं। हालाँकि भाषण के मोर्चे पर छात्र राजद के जयंत जिज्ञासु जिस तरह सनसनी बनकर उभरे थे,उसके बाद बहुत लोग, एआईएसएफ़ के इस पूर्व नेता में  ‘कन्हैया परिघटना’ के दोहराव की संभावना देख रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछड़ों की दावेदारी को केंद्रीय मुद्दा बनाने वाले जयंत चौथे नंबर पर रहे और एन.साई बालाजी ने 2100 से ज़्यादा वोट पाकर एबीवीपी प्रत्याशी को दोगुने से ज़्यादा वोटों से हराया। तीसरे नंबर पर बाप्सा (बिरसा, आंबेडकर फुले छात्र संगठन) रहा।

वाक़ई वाम छात्रसंगठनों के मोर्चा की यह जीत बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे समय जब सत्ता अपने क्रूर रूप से ‘जेएनयू डाउन- डाउन’ अभियान चला रही है, ‘जेएनयू फाइट बैक’ की जिजीविषा का झंडा ऊंचा रखना आसान नहीं था। उन्हें जितना एबीवीपी से लड़ना पड़ा, उतना ही वाम विरोधी उन ‘अस्मितावादियों’ की तरफ़ से, जो संघर्ष के मोर्चे पर भी जाति का फीता लिए खड़े रहते हैं। साई बाला जी के ख़िलाफ़ इस खेमे की ओर से जैसा अभियान चला वह जेएनयू के लिए बिल्कुल नई बात थी। वे ‘सवर्ण जातियों के कथित वर्चस्व’ का सवाल उठाकरक वाम पर हमला बोलते रहे हैं, लेकिन परेशानी यह थी कि एक तो साई बाला जी दक्षिण भारतीय थे और दूसरे एक ऐसे पिता की संतान जो ख़ुद पिछड़ी जाति से आते हैं। ऐसे में उन्होंने जो किया वह हैरान ही नहीं, जेएनयू की परंपराओं को शर्मिंदा करने वाला था।

उन्होंने बाला जी के ‘शुद्ध रक्त’ का न होने का प्रचार किया क्योंकि उनके माँ-पिता का विवाह अंतरजातीय था।

पूरे चुनाव के दौरान बाला जी के ख़िलाफ़ ऐसा प्रचार चलता रहा,लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ‘ लेफ़्ट युनिटी’ अपने मुद्दों पर डटा रहा, लेकिन जब 14 सितंबर को वोटिंग ख़त्म हुई तो बालाजी का दर्द छड़क पड़ा। उन्होंने उसी शाम, अपने फ़ेसबुक पर एक मार्मिक पोस्ट लिखी। रोहित वेमुला को याद किया जिसे बीजेपी सरकार लगातार दलित न होने की मुनादी करती रही क्योंकि उसके पिता और माँ की जाति अलग थी। बाला जी ने यह भी बताया कि वाम राजनीति में उनके होने का मतलब क्या है–

N Sai Balaji is with Shashi Tripathy and 9 others.

Before the dust of elections set in, before winners and losers are declared. I want to share a story of disappointment and anguish!

Like Rohith Vemula who was born to parents in an intercaste marriage, I too had a similar experience – I too was born to parents who had an intercaste marriage. My parents defied the societal norms in 1990s and followed their heart at a time when society was burning with communal and brahmanical forces – the Mandir and anti Mandal violence. My parents believed in love and challenged the hate through hope.

My father is from a backward caste, he lost his father when very young, and struggled and studied as a scholarship student all his life, facing a lot of discrimination. He always wanted to spare me those experiences.

However when I was in Class 9th I was asked to fill out a form which asked for my caste. When I asked my parents, they initially said don’t fill anything. Upon insisting I was told my identity of being born out of intercaste marriage. They were worried about how society would react to this truth. The traumatic consequences my father feared immediately kicked in and continued ever since. From remarks by teachers expressing ‘surprise’, to being rejected in love to being seen as someone impure deserving looks of disgust – I went through all. I suffered in silence and humiliated at large publicly.

It was these very experiences and society’s reaction towards my identity that brought me closer to left politics. The questions surrounding my identity made me realise how self-respect is important. It was not until JNU I realised that I can be proud of what I am. JNU gave me the liberty to express and celebrate my identity without fear of discrimination.

But today in JNU there are questions being raised about the authenticity of my identity and accusations being hurled on my organisation of practising a kind of politics which doesn’t fit into the philosophy and principles of our politics. The accusation and the politics of certificates of ‘purity’ have made me realise how vulnerable people like me are in this world.

BJP/RSS/ABVP collectively went all out to prove that Rohith Vemula was not a Dalit after his institutional murder. They tried to erase and tarnish his story and his mother’s story. Today, I am disappointed to find that the so called champions of social justice who are distributing certificates of “purity” are jeering at and trying to tarnish my parents’ story.

Today after facing numerous challenges, after nearly three attempts to make it to JNU, I have reached where I am. But the questions about my purity and identity remain and continue to haunt me even in JNU! It’s such Brahmanical notions of ‘purity’ masquerading as progressiveness that fails people like me and my parents.

What even more disappoints me and the reason for my anguish is that this humiliation of casting me as impure through ‘certificates’ is coming none other that so called self proclaimed champions of Social Justice. This is the very reason I can relate to Rohith Vemula and his anguish that a person has been “reduced to his immediate identity and nearest possibility. To a vote. To a number. To a thing.”

Not only that I was also told that I am South Indian and have no idea about politics of North India. But I would like to state one thing. The politics that happened surrounding my identity is nothing but Brahmanism masquerading as social justice. This can’t be limited to any region as caste system and the privilege it gives to oppress people comes from the Brahmanical roots.

This attack and certification of impurity from champions of social justice has only reinforced my faith and trust in left. Because if there is any identity I carry it’s of an oppressed. Those who thrive on Laal-Bhagwa ek hai will never reconcile with this truth as they are more anti left than anti right!

ज़ाहिर है, बालाजी की पोस्ट ने लोगों को हिला दिया। एक फ़ेसबुक प्रतिक्रिया यहाँ पढ़ सकते हैं–

आशू अद्वैत shared a post.

लेकिन एक प्रतिबद्ध समर्पित कॉमरेड और स्कॉलर की यही पहचान है कि जब महज एक चुनाव जीतने के लिए अपने संस्थान की गरिमा और प्रतिष्ठा को धूसरित किया जा रहा हो और बहस का स्तर छिछला किया जा रहा हो तब वक़्त देख कर उसको आईना दिखाना जरूरी होता है।जरूरी होता है यह बताना कि साथी ये हार जीत की लड़ाई चलती रहेगी लेकिन एक बार जेएनयू की प्रतिष्ठा धूमिल हुई तो उसे बचाना मुश्किल होगा।एन साईं बालाजी ने अपने जाति का कार्ड कही नही खेला लेकिन कथित सामाजिक न्याय पसन्द लोगो ने उनके गोत्र,जाति और उनके माँ-बाप के अंतरजातीय ब्याह और उनसे उत्पन्न बाला जी की ‘रक्त शुद्धता/जातीय शुद्धता’ पर सवाल खड़े किए गए।निश्चित रूप से इन मुद्दों पर चुनाव जीतने की कुत्सा कोशिश जेएनयू जैसे संस्थान के लिए लज्जाजनक कही जा सकती है।कॉमरेड एन साई बालाजी को सलाम कि उन्होंने ऐसे ओछे और उलजुलूल बातो को चुनावी मुद्दा बनाने के बजाय विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय मसलो पर गम्भीरता और गहराई से बात रखी।

भाषाई वाकपटुता और धाराप्रवाह के संदर्भ में एक बात ध्यातव्य है कि एक दक्षिण भारतीय के लिए हिन्दी बोलना और हिन्दी मे भाषण देना उतना ही दुष्कर और दुर्बोध होता है जितना एक हिंदी भाषी के लिए मलयालम बोलना और ‘फर्राटेदार’ भाषण देना।लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अंग्रेजी में अपने ‘पांडित्य’ का प्रदर्शन करने के बजाय हिंदी में ही बात रखी और उन तमाम मसलो को अपने भाषण की परिधि में रखा जो बेहद प्रासंगिक और ज़रूरी थे।