Home Corona आइसलैंड: बिना लॉकडाउन कोरोना को शिकस्त देने का उदाहरण

आइसलैंड: बिना लॉकडाउन कोरोना को शिकस्त देने का उदाहरण

दरअसल आइसलैंड का अनुभव यह सीख देता है कि जिन देशों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों को निजी पूंजी की चपेट से बाहर रखा है, वही महामारी को रोकने में सफल हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका से ज़्यादा संपन्न और शक्तिशाली भला कौन है? लेकिन वहां का स्वास्थ्य ढांचा निजी पूंजी के हवाले है काफी हद तक. आइसलैंड में हर नागरिक की प्राथमिक से लेकर उच्चतर शिक्षा और सम्पूर्ण स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी सरकार की है. यहां पर्यावरण और मानवाधिकार की चेतना भी लोगों में बहुत उच्च कोटि की है. जेंडर समानता और LGBT समुदाय के अधिकारों के मामले में यह देश समूची दुनिया में अव्वल है. निजता की सुरक्षा की चेतना इतनी बढ़ी  हुई है कि कोरोना संक्रमण की निगरानी के लिए 2 अप्रैल को सरकार ने जो ‘एप’ जारी किया वह निजता की सुरक्षा के सर्वोच्च मापदंडों से गुज़ारकर काफी बहस मुबाहसे के बाद ही किया. बावजूद इसके इसे डाउनलोड करना अनिवार्य नहीं बनाया गया.

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कुमार संभव

 

उत्तरी अटलांटिक सागर में मुख्य योरपीय भू-भाग से थोड़ा सा छिटका हुआ एक छोटा सा संपन्न, सुन्दर और सभ्य देश है आइसलैंड। योरप में इंग्लैंण्ड के बाद सबसे बड़ा द्वीप।  दुनिया के नक़्शे पर देखें तो क्षेत्रफल के लिहाज से यह इंग्लैंड से कुछ ही छोटा है यानी 103000 वर्ग किलोमीटर, जबकि इस देश की जनसँख्या कुल 365000 के लगभग है. बहरहाल हम इस देश की तमामतर ख़ुसूसियात को छोड़कर करोना महामारी से लड़ने में उसकी बेहतरीन सफलता पर ही यहां संक्षिप्त बातचीत रखेंगे. अभी तक करोना का सफलतापूर्वक सामना करनेवाले देशों में न्यूज़ीलैण्ड, दक्षिणी कोरिया, जापान, ताइवान, हॉन्ग कॉन्ग आदि देशों और खुद चीन की तारीफ़ होती रही है, जहां से यह महामारी शुरू हुई बताई जाती है. योरपीय देशों में जर्मनी ने किसी हद तक करोना को काबू में रखने में सफलता पाई है। 

लेकिन जहां तक आइसलैंड की सफलता की बात है तो उसने बगैर एक भी दिन सम्पूर्ण लॉकडाउन किए और बगैर एक दिन के लिए भी हवाई अड्डा और उड़ाने बंद किए यह सफलता प्राप्त की है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आइसलैंड योरप का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है और विदेशी पर्यटकों की आवाजाही यहाँ अच्छी तादाद में बारहों महीने रहती है. करोना से लड़ने में आइसलैंड की सफलता का स्तर यह है की पूरे मई महीने में हर दिन अच्छी तादाद में टेस्टिंग (परीक्षण) के बाद भी महज मरीज़ ही मिले. अबतक (3 जून तक) के आंकड़े बताते हैं कि आइसलैंड में अब तक करोना से संक्रमित पाए गए 1806 लोगों में से  कुल 1794 मरीज़ ठीक हो  चुके हैं. स्वस्थ होने की दर 99 फीसदी से ज़्यादा है जैसा दुनिया के किसी भी मुल्क में नहीं हुआ. अब तक सिर्फ 10 मरीज़ों की मौत हुई है यानी मृत्यु की दर महज 0.55 %. जिन की मौत हुई, उनमें से एक को छोड़ सभी 60 साल के ऊपर और अन्य बीमारियों से ग्रस्त लोग थे

यहां यह भी उल्लेख कर देना ज़रूरी है कि आइसलैंड में इंटेंसिव केयर यूनिट (सघन चिकित्सा कक्ष) में कोरोना के जितने मरीज़ दाखिल हुए उनमें से सिर्फ 15 % की ही मृत्यु हुई जबकि 85% स्वस्थ होकर निकले. दुनिया में ICU से स्वस्थ होकर आने वालों की दर कहीं भी इतनी नहीं है. ज़्यादातर देशों में ICU में भर्ती होनेवाले कोरोना मरीज़ों में 50% से लेकर 90 % तक की मौत हो जाती है. फिलहाल आइसलैंड में न तो कोई मरीज़ अस्पताल में है और ही कोई आई सी यू (सघन चिकित्सा कक्ष ) में है.   बचे हुए दो मरीज़ जो अभी भी संक्रमित हैं, वे आइसोलेशन में रखे गए हैं. आइसलैंड ने 1 फरवरी से ही कोरोना के लिए टेस्टिंग शुरू कर दी थी, लेकिन शुरू में उसकी दर भी कम थी और मरीज़ भी नहीं मिले. 27 फरवरी तक सिर्फ 41 नमूने टेस्ट किए गए थे. लेकिन 28 फरवरी, जिस दिन आइसलैंड में पहले करोना मरीज़ की पुष्टि हुई,  से टेस्टिंग की दर बढ़ाई गयी. 27 फरवरी से हर दिन सरकार प्रेस कांफ्रेंस करके कोरोना के विषय में नागरिकों को जागरूक बनाए रही , आंकड़ों से लेकर 2 मीटर की शारीरिक दूरी और दूसरे तमाम एहतियात बताए जाते रहे. अब तक आइसलैंड 61680 नमूने टेस्ट कर चूका है जो उसकी जनसंख्या का 17% बैठता है. अगर यह मान भी लिया जाए कि एक ही मरीज़ के टेस्ट एक से अधिक बार किए गए होंगे तो भी आइसलैंड में टेस्टिंग का आंकड़ा जनसंख्या के 10 फीसदी के आस पास ठहरेगा. टेस्टिंग हर दिन जारी है और देश के स्वास्थ्य मंत्रालय  का मानना है कि वह देश की पूरी जनसंख्या की टेस्टिंग करने में सक्षम है. दिलचस्प बात यह भी है कि आइसलैंड में रह रहा कोई भी व्यक्ति चाहे उसमें लक्षण हों या हों , चाहे तो सरकारी वेबसाइट पर रजिस्टर करके अपना टेस्ट करा सकता है. इस बीच देश में बाहर से आने वाले लोगों (जिन्हें 14 दिन quarantine में रखा जाना अनिवार्य है) में से 21064 लोग सफलतापूर्वक quarantine समाप्त कर उससे बाहर चुके हैं और 986 लोग अभी इसे पूरा करने के क्रम में हैं.

सबसे पहले 16 मार्च से सरकार ने 100 से अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर प्रतिबन्ध लगाया. इसी तारीख से विश्वविद्यालय और माध्यमिक विद्यालय 4 हफ्ते के लिए बंद किए गए, जबकि प्राथमिक विद्यालय कुछ शर्तों के साथ खुले रखे गए. घोषणा हुई कि हवाई अड्डे और हार्बर खुले रहेंगे.  24 मार्च से 20 लोगों से अधिक के एक जगह इकट्ठा होने को 12 अप्रैल तक के लिए  प्रतिबंधित किया गया. इसे अमल  में लाने के लिए स्विमिंग पूल, जिम, म्यूजियम और मदिरालय बंद किए गए. इस पूरे समय प्राथमिक विद्यालय, दवा की दुकानें और ग्रोसरी स्टोर खुले रहे. बसें चलती रहीं. हवाई और समुद्री यातायात जारी रहा. घर से निकलने पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगाई गयी.

इन्हीं पाबंदियों को 13 अप्रैल से बढ़ाकर 4 मई तक कर दिया गया. 4 मई से पाबंदियों में ढील देना शुरू किया गया. अब 20 की जगह 50 की संख्या तक लोग कहीं भी शारीरिक दूरी का पालन करते हुए इकट्ठा हो सकते थे. एथलेटिक और युवाओं की गतिविधियों  पर कोई पाबंदी नहीं रहने दी गयी और हायर सेकेंडरी तथा विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षण संस्थानों को खोलने की अनुमति दी गयी. 18 मई से स्विमिंग पूल भी खोल दिए गए. 25 मई से आधी क्षमता के साथ जिम भी खोल दिए गए. सभी बार और रेस्त्रां 2 मीटर की शारीरिक दूरी के पालन और अधिकतम रात 11 बजे तक बंद कर देने की शर्त के साथ खोल दिए गए. इसी दिन से एक जगह इकट्ठा होने की सीमा 200 तक बढ़ा दी गयी. 15 जून के आस पास तक आइसलैंड  पूरी दुनिया से  आनेवाले यात्रियों के लिए  हवाई अड्डे और बंदरगाह खोल देगा. कोरोना के मद्देनज़र यह सुविधा  योरोपीय यूनियन और शेंगेन क्षेत्र के निवासियों तक महदूद थी. इस प्रकार आज की तारीख में आइसलैंड में नाममात्र की ही पाबंदी ( 200 से ज़्यादा लोगों के एक साथ इकट्ठा होने पर ) रह गयी है.

हाई रिस्क एरिया (ज़्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों) को बहुत जल्दी ही परिभाषित कर देने, बाहर से आनेवाले सभी लोगों के लिए अनिवार्य quarantine का शीघ्रता से निर्णय, बड़ी तादाद में टेस्टिंग, संक्रमण  का पता लगाने की ऊंची दर (95%), संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए हरेक व्यक्ति के लिए quarantine की व्यवस्था, लोगों के एक जगह ज़्यादा संख्या में इकट्ठा होने पर  पाबंदी, प्रतिदिन पूरी पारदर्शिता के साथ सरकार का नागरिकों के साथ नियमित संवाद आदि अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं आइसलैंड की सफलता के पीछे।  ज्ञातव्य है कि आइसलैंड की वामपंथी  प्रधानमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री, दोनों महिलाएं हैंयहां 2017 के चुनाव के बाद इंडिपेंडेंस पार्टी ( मध्यदक्षिणपंथी रुझान वाली) , लेफ्ट ग्रीन पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी की मिली जुली सरकार है जिसका नेतृत्व वामपंथी प्रधानमंत्री कैटरीन जैकब्सदोत्तीर (मुख्य तस्वीर में ऊपर बायें) करती हैं

कोई कह सकता है कि आइसलैंड संपन्न देश है, इसलिए वह कोरोना की रोकथाम में सफल रहा. लेकिन योरोप के ज़्यादातर देश संपन्न हैं. उनके पास इस छोटे से देश से कहीं ज़्यादा भौतिक, प्राकृतिक और मानवीय संसाधन हैं. लेकिन वे इस महामारी से निपटने में बहुत पीछे छूट गए. जिस तरह जनसंख्या की संरचना, समाजार्थिक और जलवायविक समानता के कारण कोरोना की रोकथाम की दृष्टि से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका की आपस में तुलना ही उचित होगी, उसी तरह आइसलैंड की तुलना भी यूरोपीय देशों से ही उचित है.  

दरअसल आइसलैंड का अनुभव यह सीख देता है कि जिन देशों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों को निजी पूंजी की चपेट से बाहर रखा है, वही महामारी को रोकने में सफल हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका से ज़्यादा संपन्न और शक्तिशाली भला कौन है? लेकिन वहां का स्वास्थ्य ढांचा निजी पूंजी के हवाले है काफी हद तक. आइसलैंड में हर नागरिक की प्राथमिक से लेकर उच्चतर शिक्षा और सम्पूर्ण स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी सरकार की है. यहां पर्यावरण और मानवाधिकार की चेतना भी लोगों में बहुत उच्च कोटि की है. जेंडर समानता और LGBT समुदाय के अधिकारों के मामले में यह देश समूची दुनिया में अव्वल है. निजता की सुरक्षा की चेतना इतनी बढ़ी  हुई है कि कोरोना संक्रमण की निगरानी के लिए 2 अप्रैल को सरकार ने जो ‘एप’ जारी किया वह निजता की सुरक्षा के सर्वोच्च मापदंडों से गुज़ारकर काफी बहस मुबाहसे के बाद ही किया. बावजूद इसके इसे डाउनलोड करना अनिवार्य नहीं बनाया गया.

जो भी देश शिक्षा, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के दायरे को  निजी मुनाफे की गिरफ्त से बाहर रखेंगे, वही भविष्य में महामारियों से जूझने और नागरिकों को बेहतर जीवन देने में सफल होंगे.

 

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।



 

1 COMMENT

  1. बारीकी से अध्ययन के आधार पर लिखा गया है।
    चाहे 100 साल पहले करोड़ टन भोजन और अन्य उत्पादन को जानबूझकर पूंजी पतियों द्वारा नष्ट करना हो या दूसरे विश्वयुद्ध में बाजार कच्चे माल की हवस में 5 करोड़ लोगों को बलिदान चढ़ा देना हो पूंजीवाद में यह बेहद स्वाभाविक है ।
    यही कारण है कि, कम से कम भारत में आज व्यापक संख्या में जहां प्रशिक्षित नर्स फार्मेसिस्ट तैयार हैं कोई सरकारी रोजगार आंदोलन या कम से कम बात तक( वैकल्पिक मीडिया तक में )नहीं दिख रही है

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