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राजनीतिक हिंसा की कामुकता और “रूद्र रूपी” सीएम वाया ट्विटर

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‘मज़ा मज़ा आ गया, योगी जी…लाठी ऐसी पड़ी कि मज़ा ही आ गया…!’

यह ‘मज़ा’ एक ऐसा शब्द है, जिसे उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन क़ानून एवं एनआरसी-विरोधी आदोलनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप अक्सर ‘ट्वीट्स’ में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसके संस्कृतनिष्ठ पर्याय ‘आनंद’ की बनिस्पत, मज़ा शब्द में रोमांच निहित है.
निम्न प्रश्नों की तलाश में, मैं इन ट्वीट्स पर फिर से लौटूँगी.

क्या यह मुमकिन है कि राजनीतिक हिंसा के किसी कोने में कामुकता छिपी बैठी हो? क्या यह कामुक उत्तेजना, हिंसा करने वालों तक सीमित ना रहकर उन लाखों-लाख लोगों में भी उत्तेजना उत्पन्न करती है, जो उस हिंसा के बारे में सुनते, देखते या पढ़ते हैं?

‘कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता’ से परे, क्या यह संभव है कि लोग इस तरह घटित होती हिंसा के मज़े लें? क्या राजनीतिक हिंसा के पक्ष में अग्रिम सक्रियता और उत्साहवर्धक समर्थन को, चंद दुष्ट नेताओं द्वारा ‘साधारण जन’ को भ्रष्ट करने की क़वायद के रूप में समझा जा सकता है? क्या यह मुमकिन है कि इस तरह की ख़ौफ़नाक हिंसा से मिलने वाले मज़े की तरफ़ धकेलने के इस घृणित खेल को समझने में, हमें अपनी इस सामूहिक मानसिकता के भीतर झाँकने की दरकार होगी?

उपरोक्त सवालों से जूझते हुए मैं इस लेख में, ‘वरचुअल वर्ल्ड’ या आभासी दुनिया में छितरे इन ट्वीट्स का उद्धरण दूँगी. उदारवादी सोच रखने वालों के लिए यह मानना शायद दिलासा भरा साबित हो सकता है कि इन ट्वीट्स को चंद पेशेवर ट्रोल आर्मी द्वारा किया जाता है और इनका आम जन से कोई लेना देना नहीं है. सच्चाई जो भी हो, राजनीतिक हिंसा के समर्थन के विश्लेषण के लिए ये ट्वीट्स अत्यंत आवश्यक हैं. इस प्रक्रिया में, मनोविश्लेषण के चश्मे के ज़रिए इन ट्वीट्स पर ग़ौर किया जाएगा. इस लेख में मैं अपनी प्रकाशाधीन पुस्तक, ’फेंटेसी फ्रेम्स: लव, सेक्स एंड इंडियन पॉलिटिक्स’, से भी उद्धरण लूँगी.

जिन ट्वीट्स की मैं इस लेख की शुरुआत में बात कर रही हूँ वे 20 दिसंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में आंदोलनकारियों पर पुलिस लाठीचार्ज को लेकर एएनआइ के फुटेज की प्रतिक्रिया में किए गए थे. इन ट्वीट्स में ठहाके लगाने, आँख मारने वाले और रोते हुए इमोटीकॉन हैं, जिनमें हिंसा को लेकर होने वाली उत्तेजना लगातार नए आयाम छूती प्रतीत होती है. ट्वीट्स में पुलिस वालों के लिए ‘इन प्लास्टिक की लाठियों से क्या होगा, लकड़ी की लाठी दो इनको वापिस’ से लेकर, ‘वॉटर कैनन छोड़िए, बर्फ़ वाला (मारिये), सब भागते नज़र आएँगे’, और ‘फ़्लेम थ्रोअर देने’ तक सौंपने की माँग की गई हैं. तिरंगे के अपने प्रतीक चिन्ह के साथ, ‘वारहेड’ नामक जिस ट्विटर हैंडल ने अपने पिछले ट्वीट में अजीबो-ग़रीब हिंदी का इस्तेमाल कर अपना उल्लास व्यक्त किया था, ‘देखते ही गोली मारोssss’ की उसकी ललकार में पहले से कम उल्लास नहीं झलक रहा था!

अगर अब भी हमें दीवार पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखे संकेत नहीं मिल रहे हैं तो इस ट्वीट पर ग़ौर फ़रमाएँ, जिसमें एक जनाब बंदूक़ का इस्तेमाल करने तक की माँग कर रहे हैं: ‘नो लाठी चार्ज प्लीज़, ओन्ली गोलीबारी, ये मदर (इंडिया) फक*स हैं.’

शायद उपरोक्त ट्वीट का विश्लेषण करने में सिगमंड फ़्रायड को बड़ा लुत्फ़ आता, लेकिन फ़िलहाल मैं यहाँ हिंसा की बढ़ती लालसाओं की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ. मुझे लगता है यह हमारे इर्दगिर्द घटने वाली एक व्यापक परिघटना की अभिव्यक्ति है: जिसे हम टैबू मानते हैं, उसकी सीमा बढ़ती चली जा ही है!

ख़ैर, इस विचार पर मैं बाद में लौटूँगी.

राजनीतिक हिंसा से मज़े लेने के संदर्भ में, मैंने कामुकता शब्द का इस्तेमाल क्यों किया? मनोविश्लेषक ब्रूस फ़िंक के अनुसार, “निषेध, कामुकता जगाने वाला होता है.” “कामुकता” इस संदर्भ में सिर्फ़ यौनिकता तक ही सीमित ना रहकर, उसके साथ तीव्रता की संभावना को भी साझा करती है, यानि, तीव्रता का चरम तलाशती है- एक उन्माद, मदहोश कर देने वाला नशा, अतिरेकता का चरम.

हर वो ख़याल इरोटिक या कामुक है, जो ‘एक्सटेसी’ को छूना चाहता है. एक्सटेसी शब्द अपने ग्रीक पूर्वज, ‘एक्स-टेसिस’ से निकला है, यानी एक ऐसी अनुभूति, जो अपने क्षितिज के पार ले जाने का अनुभव करवाए.

हम जानते हैं कि निषिद्धता, उत्तेजना प्रदान करने वाली होती है, जैसे शायद हमारी अपनी काम वासनाएँ. यह बहुत साधारण बात है कि जो फंतासियाँ हममें उत्तेजना संचारित करती हैं, उनके प्रति हम आमूमन घृणा का भाव भी रखते हैं. क्या यह हो सकता है कि निषिद्धता और कामुकता के बीच गुपचुप चलने वाला यह खेल, व्यक्तिगत दायरे तक सीमित ना रहकर, राजनीतिक परिधि को भी छूता हो? “व्यक्तिगत ही राजनीतिक है” का नारीवादी मंत्र हमें यह देखने में मदद कर सकता है कि राजनीति में भी हम ‘टेबू’ की तरफ़ आकर्षित होते हैं.

उदाहरण के लिए, ट्वीट्स में चार्ज या जोश है. रक्त-पिपासा जैसे अनैतिक भाव को व्यक्त करने में परम आनंद का आभास होता है. निषेध मानी जाने वाली बातें अक्सर बदलती और बढ़ती चली जाती हैं. जैसे हिंदू राष्ट्रवाद के संदर्भ में, निषेध के मुत्तालिक़ सोचते हुए, अब हमें देश के क़ानून की हदों में रहना पर्याप्त नहीं लगता. मिसाल के तौर पर, हालिया नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के संबंध में हुई हिंसा में या तो पुलिस लिप्त पाई जा रही है या उकसाऊ की भूमिका निभा रही है: जेएनयू, जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और पूरे उत्तर प्रदेश और दिल्ली में अब तक यही सब देखने में आ रहा है. जब मैं निषेध की बात करती हूँ तो मेरा मतलब इंसानियत के मानदंडों और मानव अधिकारों से है.

हम जैसे लोगों को, ख़ासकर, ऑनलाइन स्पेस (इसमें मैं सभी विचारधाराओं को सम्मिलित करने का भी ख़तरा उठा रही हूँ) में निषेध से संलग्नता भाती है. यही वह जगह है जहाँ जो ‘ज़ायक़ेदार’ बात हम दूसरे संदर्भ में नहीं कह सकते, उसे यहाँ बिना जाँचे-परखे या बिना किसी सेंसर के बेधड़क कह डालते हैं.

मनोचिकित्सक और लेखक जेरी गुडमैन अपने लेख, ‘ईगो, सुपरईगो और ट्विटर’, में पूछते हैं- क्या हम उन “तेज़ तर्रार, तीखी, लाजवाब हाज़िरजवाबी,”, के दिनों को याद करते हैं? वे वक़्त में थोड़ा और पीछे जाकर उस उद्दंड बच्चे के शैशवकाल को याद करते हैं जब वह जब चाहे “खा, चिल्ला, हग, सो सकता था.” फिर ऐसा भी वक़्त आता है, जब हम वयस्क होते हैं और अपने व्यवहार में हर समय आपत्तिजनक और विरोधात्मक होने की बजाय, अपनी मनमर्ज़ी की प्रतिक्रियाओं में संतुलन बनाना सीखते हैं.

डॉक्टर गुडमैन उन क्षणों के बारे में लिखते हैं, जब हम एक बार फिर से शैशवकाल की भाँति बर्ताव करने लगते हैं. “ट्वीट करते समय हम पल के लिए भी नहीं सोचते-समझते, ना लेशमात्र भी अच्छे-बुरे का ख़याल करते, और ना अपने ऊपर कोई अंकुश लगाते हैं.” हालाँकि, यहाँ वे आम संदर्भों में बात कर रहे हैं, लेकिन यह राजनीतिक संदर्भ में भी उतनी ही लागू होती है. सोशल मीडिया, ख़ासकर, ट्विटर, हमें समाज में इंसानियत और मानव अधिकारों के स्वीकृत मानदंडों की अवधारणा में निषेध माने जाने वाले कर्मों और विचारों को, तुरंत और संक्षिप्त में सार्वजनिक रूप से कहने का खुला मंच प्रदान करता है.

निषिद्ध को व्यक्त करने की अनुमति उस आस्था या विचारधारा से भी आती है, जिसमें हम विश्वास करते हैं. उत्तर प्रदेश में, नागरिकता संशोधन क़ानून-एनआरसी का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों के खिलाफ की जा रही उग्र कार्यवाही और विचार के समर्थन की अनुमति, ना केवल हिंदू राष्ट्रवादी सोच बल्कि ख़ुद मुख्यमंत्री से भी प्रस्फुटित होती प्रतीत होती है. अनुमति से इतर, ट्विटर पर ये तमाम प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं कि आम लोग मुख्यमंत्री द्वारा बेबाक़ी से इंसानियत और मानव अधिकारों की अवधारणाओं की धज्जियाँ उड़ाने और निषिद्ध या वर्जित को व्यक्त करने के उनके इस ‘साहस’ से प्रेरणा पाते हैं.

यहाँ 27 दिसंबर 2019 को योगी आदित्यनाथ के दो आधिकारिक ट्विटर हैंडल्स में से एक द्वारा किए गए ट्वीट का उदाहरण देना नावाजिब ना होगा. ट्वीट कहता है:

“हर दंगाई हतप्रभ है.
हर उपद्रवी हैरान है.
देख कर योगी सरकार की सख़्ती
मंसूबे सभी के शांत हैं.
कुछ भी कर लो अब,
क्षतिपूर्ति
तो क्षति करने वाले से ही होगी,
ये योगी जी का
ऐलान है.
हर हिंसक गतिविधि अब रोएगी
क्योंकि
यूपी में योगी सरकार है.
#द ग्रेट_सीएमयोगी”

ट्वीट में लगभग कवित्व झलकता है, हालाँकि कुछ हलकों द्वारा अहंकार में डूबे योगी आदित्यनाथ के ऊपर बनाए गए इस ट्वीट पर, फ़िकरे कसते हुए कुछ तीखी प्रतिक्रियाएँ ज़रूर आईं. ट्वीट्स में उनसे उनकी हिंदू युवा वाहिनी द्वारा तोड़ी गई सार्वजनिक संपत्ति का ख़ामियाज़ा वसूलने जैसे तीखे सवाल भी पूछे गए, लेकिन अधिकतर प्रतिक्रियाएँ अपने नेता की प्रशंसा में थीं. इन प्रतिक्रियाओं में वे ट्वीटस भी शामिल थे, जिनमें उनकी तारीफ़ “स्पष्ट भाषी नेता” के रूप में की गई थी; “जो कहा वो किया”; “नामुमकिन को मुमकिन कर दे”; #योगी है तो मुमकिन है.”

एक ट्वीट में उन्हें “कड़े फ़ैसले लेने वाला” मुख्यमंत्री बताया गया; एक ऐसा आदमी, जो कभी “खेद व्यक्त नहीं करता और साहसी है.” एक अन्य ट्वीट कहता है कि उनकी कार्यवाही की कड़ाई ऐसी है कि यह आपको तुरंत उत्तर प्रदेश जाकर ‘बसेरा’ बनाने के लिए प्रेरित करती है. यानि उनके राज में इस क़दर महफ़ूज़ महसूस किया जा रहा है कि आपके अंदर वहाँ जाकर बसने का भाव उत्पन्न होता है.

आदित्यनाथ को योगी और राजनेता के प्रबल अवतार के रूप में अभिव्यक्त करते हुए एक ट्वीट ने उनके ‘रूद्र रूप’ की बात की. ज़ाहिर है इसका इशारा, शिव के विनाशकारी, विध्वंसक अवतार की तरफ़ था. एक मीम में तो, पार्श्व में मोदी की धुँधली छवि के सम्मुख, आदित्यनाथ को ठेठ रूप से हवा में बाँह और उंगली उठाए दिखाया गया है. नीचे लिखा है:

“इफ़ यू आर बैड, आइ एम योर डैड.”
(“तुम अगर पाप हो तो मैं तुम्हारा बाप हूँ)

तो हमारे पास अब एक ऐसा नेता है जो निश्चित्ता और सुरक्षा का बोध करवाता है, ख़ासकर एक ऐसे संदर्भ में जब हमारे अंदर और बाहर, चारों तरफ़ धुँधलके और डर का माहौल बना हुआ है; जबकि उस ‘अन्य’ को एक हर समय मौजूद ख़तरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है; और, जब मनोविश्लेषण की भाषा में, प्रभुत्व रखने या ‘बिग अदर’ के रूप में देखे जाने वाला वही शख़्स नेतृत्व प्रदान कर रहा हो, तो जीवन में कुछ भी कहने और करने की छूट हमें आख़िर प्राप्त हो ही जाती है. कुछ ऐसा करने की, जिसे आमतौर पर निषेध माना गया है.

शैशवकाल और बचपने से ही, इन प्रभुत्वकारी बिग अदर, जिनमे हमारे अभिभावक, शिक्षक, बॉस, क़ानून, आदि शामिल हैं, द्वारा हमारी इच्छाओं के पर क़तरे जाते हैं. इससे मेरी और बिग अदर की आकांशाओं में टकराव की स्थिति पैदा होती है. लेकिन अगर मेरी इन निषिद्ध/ वर्जित इच्छाओं को मेरे बिग अदर ही करने की अनुमति दे रहे हों तो? अनुमति और निषिद्धता के दोराहे पर जो जगह है, उसे मनोविश्लेषण की ज़ुबान में ‘ज़ुईसेंस’ अर्थात उन्माद की स्थिति कहते हैं. ज़ुईसेंस की व्याख्या भयानक क़िस्म के विकृत आनंद के रूप में की गई है. ‘भयानक’ और ‘आनंद’ एक ही वाक्य में इस्तेमाल हो सकते हैं, यह बात हमें शायद तब उतना नहीं चौंकाएगी जब हम उन फंतासियों के बारे में सोचेंगे, जो हममें एक ही समय में उत्तेजना और घृणा का भाव उत्पन्न करती हैं.

“योगी, मोदी, शाह जी रॉक…भारत के ग़द्दारों को सबक़ सिखाने के लिए ऐसे ही दमदार नेताओं की दरकार है,” (अंग्रेज़ी से अनूदित) इस ट्वीट; और एक मीम, जिसमें बाईं तरफ़ उत्तर प्रदेश और दाईं तरफ़ दिल्ली का मीम है. बाईं तरफ़ वाले मीम में, क्रोधित योगी के हाथ में हरे रंग का कुर्ता, नमाज़ी टोपी पहने, एक दाढ़ी वाला ‘दंगाई’ आदमी उल्टा लटक रहा है. उसके फटे सफ़ेद पाजामे में से गुलाबी नितंब झाँक रहे हैं. उसके कपड़ों की तहों से नोट झरते और एक ख़ंजर को गिरते भी दिखाया गया है. दाईं तरफ़ टोपी पहने केजरीवाल जैसा दिखने वाला एक आदमी घोड़ा बना जीभ लपलपा रहा है. हवा में उठे उसके एक हाथ में गुलाबी रिबन में लिपटा एक तोहफ़ा है, जिस पर ‘सरकारी नौकरी’ और ‘पाँच लाख रुपए’ लिखा है. पीठ पर एक मुसलमान जैसा दिखने वाला ‘दंगाई’ बैठा है, जो उस तोहफ़े की तरफ़ लपकता दीखता है, उसके हाथ से एक पत्थर भी गिरता हुआ दिखाई दे रहा है. उसके पीछे बैठे एक और आदमी की क़मीज़ पर लिखा ‘बलात्कारी’ भी देखा जा सकता है, जिसके हाथ में एक ‘सिलाई मशीन’ और ‘दस हज़ार’ का तोहफ़ा है. ‘केजरीवाल’ के नितम्बों से ‘अधोवायु’ छोड़ने जैसी ड्रॉइंग बनी है, जिसके ‘बादल’ के बीच में ‘फ़्री फ़्री फ़्री’ लिखा है.

तो यह है मुसलमानों (या जो भी अन्य है) के ख़िलाफ़, हिंसा की कामुक ऊर्जा, जिसे चुराए गए मज़े की फंतासी के रूप में समझने की ज़रूरत है. इस विचारधारा के मुताबिक़, मुसलमानों ने हमारे मस्ती के पलों को चुराकर अब तक ख़ूब मज़े लूटे हैं.

2017 में, उत्तर प्रदेश की चुनावी रैलियों के दौरान योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी को मुसलमानों द्वारा हमारी ज़मीने हथियाने का ज़िक्र करते हुए सुना जा सकता है (यहाँ तक कि उनके क़ब्रिस्तानों को भी यह कर कोसा गया कि उनके मुर्दे भी ‘हमारी ज़मीने’ घेरे बैठे हैं). इन नेताओं द्वारा कसे गए अन्य कटाक्षों में कहा गया कि मुसलमानों को तो ईद के मौक़े पर बिजली मुहैय्या करवा दी जाती है, जबकि हिंदुओं को अपनी दिवाली अंधेरे में मनानी पड़ती है; और कि उनकी लड़कियाँ को वजीफ़ों से नवाज़ा जाता है, आदि. जिस एक बात का ज़िक्र सबसे ज़्यादा बार आता है वह है: उनके पास गुलछर्रे उड़ाने के लिए, एक नहीं बल्कि चार-चार बीवियाँ होती हैं. उन पर लव जिहाद के नाम पर औरतें चुराने का इल्ज़ाम भी लगाया जाता है. अत: जिन्होंने उनसे उनका सुख छीना है वे सज़ा के हक़दार हैं और उन्हें सज़ा देकर ही अब चैन की साँस ली जाएगी.

राजनीतिक हिंसा को समझने के लिए इस ‘चुराए गए मज़े’ के विचार को समझना ज़रूरी है. हिंदू राष्ट्रवाद पर गहन अध्ययन करने वाले टॉमस ब्लौम हैन्सेन ने अपनी किताब, ‘द सैफ़्रन वेव’ में लिखा है: “हिंदू के रूप में पूर्णता की तलाश एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है,” जिसे “अंतिम रूप से हासिल कर पाना नामुमकिन है.” हैन्सेन राजनीतिशास्त्र के दार्शनिक स्लावोक ज़िज़ेक के सिद्धांत को आधार बनाकर अपना विचार रख रहे हैं. ज़िज़ेक के अनुसार, एक राष्ट्र या समुदाय की ख़ुशी को “अंतत: खोने और असंभव के गल्प के ज़रिए ही अभिव्यक्त किया जा सकता है. इसमें उस ‘अन्य’ या ‘अदर’ को (जो एक राष्ट्र, समूह या समुदाय हो सकता है) ख़ूब मौजमस्ती करते हुए चित्रित किया जाता है; “जो हमारी ख़ुशियों को चुराने और उनके रास्ते में रोड़ा अटकाने वाला है.”

हमसे अलग समझे जाने वाले ये लोग हमेशा ही हमारी ख़ुशियों पर डाका डालते रहते हैं, भले ही उनके आर्थिक-सामाजिक हालात कितने भी बदतर क्यों ना हों (ध्यान रहे कि इस सोच के पीछे तथ्यों की बनिस्पत, फँतासी का पुट ज़्यादा रहता है), इसलिए उन्हें लगातार दंडित करते रहना ज़रूरी हो जाता है. इस दिए जाने वाले दंड को सदैव नया और पहले के अनुपात में अधिक कठोर होना चाहिए, ताकि उससे मिलने वाली संतुष्टि की तृप्ति होती रहे. इसलिए इसमें अचरज नहीं होना चाहिए कि हिंदू राष्ट्रवाद के संदर्भ में हाल में उन्हें मिलने वाले दंड के रूप में उनसे कश्मीर छीन लिया गया; राम जन्मभूमि की विवादित ज़मीन हथिया ली गई; उत्तर प्रदेश में उनसे नागरिकता संशोधन कानून-एनआरसी विरोध के दौरान होने वाले नुक़सान की भरपाई करवाई गई; और अब नागरिकता से वंचित किए जाने की धमकियाँ दी जा रही हैं.

कामुकता का पुट लाने के लिए दंड में अतिरेकता लाना भी आवश्यक होता है. इसमें सामूहिक अंतरात्मा की संतुष्टि के लिए, निषिद्ध की सीमाओं को लगातार लाँघते जाते रहना ज़रूरी हो जाता है.

लगातार असंतुष्ट रहने वाले इस कामुक राष्ट्रवाद के बीच हालांकि उम्मीद भी झलकती नज़र आ ही जाती है. जैसे 20 दिसंबर 2019 को दिल्ली की जामा मस्जिद पर आयोजित विरोध सभा में चंद्रशेखर आज़ाद का प्रकट हो जाना. मानवविज्ञानी अक्षय खन्ना, इसे ‘कामुक नागरिकता’ का नाम देते हैं. हिंदू राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ देश भर में चल रहे छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए ऐसी कामुक ऊर्जा से लबरेज़ उम्मीदें पालना लाजिम बन जाता है, जिनमें हम ख़ुद को अपने से कहीं बड़े का हिस्सा पाते हैं. यह भाव ही हमें नए-नए तरीक़ों से एकजुट करता है.


जया शर्मा एक नारीवादी और राजनीतिक टीकाकार हैं। काफिला पर छपे मूल अंगेज़ी लेख का अनुवाद राजेंद्र सिंह नेगी ने किया है।

वे ट्वीट जिनका संदर्भ लेख में हैः

[i]https://twitter.com/aninewsup/status/1207980501639802880?s=21
[ii]https://sites.google.com/site/philosophicalecstasy/Home/etymology
[iii]https://scroll.in/video/948908/jnu-attacks-four-questions-for-the-delhi-police-about-its-actions-on-sunday-night
[iv]https://thewire.in/government/jamia-police-attack-report
[v]https://www.telegraphindia.com/india/bared-police-brutality-on-amu-students/cid/1728324
[vi]https://scroll.in/article/947980/in-uttar-pradesh-reports-of-violence-and-police-brutality-from-15-districts
[vii]https://twitter.com/myogioffice/status/1210579722918232067?s=21
[viii]https://twitter.com/sandeeparya4u/status/1210584103164076035/photo/1
[ix]https://twitter.com/PankajS73987967/status/1210763930680717312?s=20
[x]https://www.outlookindia.com/website/story/dont-quote-data-what-matters-is-public-opinion-says-bjp-mp-yogi-adityanath/298031
[xi]https://caravandaily.com/massive-anti-caa-protest-led-by-chandrashekhar-azad-held-at-jama-masjid-delhi/


https://twitter.com/myogioffice/status/1210579722918232067?s=21  https://twitter.com/sandeeparya4u/status/1210584103164076035/photo/1  https://twitter.com/PankajS73987967/status/1210763930680717312?s=20  https://caravandaily.com/massive-anti-caa-protest-led-by-chandrashekhar-azad-held-at-jama-masjid-delhi/

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