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अगली जनगणना में अलग धर्म कोड के लिए आंदोलित हो रहे हैं आदिवासी

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जहां एक तरफ पूरे देश में एनपीआर-एनआरसी-सीएए को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं आगामी 2021-22 की जनगणना को लेकर देश के ट्राईबल (आदिवासी समुदाय) अलग धर्म कोड के लिए आंदोलनरत हैं, तो झारखंड में संघ व भाजपा के लोग आदिवासियों के बीच इस प्रचार में लगे हैं कि 2021 की जनगणना प्रपत्र में वे (आदिवासी समुदाय) हिन्दू धर्म लिखवाएं। जबकि अंग्रेजी शासन काल में भारत के आदिवासियों के लिए ‘ट्राईबल रिलिजन’ कोड था, जिसे ट्राईबल के लोग आदिवासी धर्म भी लिखवाते थे। आजादी के बाद 1951-52 की जनगणना में यह शामिल रहा, मगर 1961-62 की जनगणना में इसे समाप्त कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि भारत की जनगणना अंग्रेजों के शासन काल 1871-72 में शुरू हुई, तब से हर दस वर्ष में जनगणना की जाती है। बताते चलें कि भारत में आदिवासियों की जनगणना के लिए 1871-72 से 1951-52 तक अलग विकल्प था, जिसमें वे ट्राईबल रिलिजन (आदिवासी धर्म) अंकित करवाते थे मगर वर्ष 1961-62 के जनगणना प्रपत्र से इसे हटा दिया गया और ‘अन्य’ का विकल्प दिया गया, जिसका कोई कारण नहीं दिया गया।

अस्सी के दशक में तत्कालीन कांग्रेसी सांसद कार्तिक उरांव ने सदन में आदिवासियों के लिए अलग धर्म ‘आदि धर्म’ की वकालत की, मगर तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। बाद में उक्त मांग को लेकर भाषाविद्, समाजशास्त्री, आदिवासी बुद्धिजीवी, समाजसेवी व साहित्यकार रामदयाल मुण्डा ने आगे बढ़ाया। केंद्र की तत्कालीन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

2001-02 में खुद को आदिवासियों का धर्म गुरू घोषित करते हुए बंधन तिग्गा ने आदिवासी धर्म को सरना धर्म का नाम दिया और उसने एक नारा विकसित किया- ‘सरना नहीं तो जनगणना नहीं’। बाद में तत्कालीन कांग्रेसी विधायक देवकुमार धान ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। बाद में देवकुमार धान ने भाजपा का दामन थाम लिया और इस आंदोलन से किनारा कर लिया। मजे की बात तो यह रही कि 2011-12 की जनगणना में जो 1961-62 की जनगणना प्रपत्र में अन्य का विकल्प था, उसे भी हटा दिया गया। तर्क यह दिया गया कि सभी धर्मों की अपनी पहचान के तौर पर उसके देवालय हैं। जैसे हिन्दुओं के मंदिर, मुसलमानों के मस्जिद, सिखों के गुरूद्वारा आदि आदि, जबकि आदिवासियों का कोई देवालय नहीं हैं, वे पेड़-पौधों की पूजा करते हैं जिस कारण उनका कोई धर्म नहीं माना जा सकता। ये सारे बदलाव कांग्रेस के शासन काल में हुए हैं। यह किसके इशारे पर या किस कारण हुआ? अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

दूसरी तरफ आरएसएस का घटक संगठन सेवा भारती द्वारा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में वनवासी कल्याण केन्द्र और वनबंधु परिषद के बैनर तले आदिवासियों में हिन्दुत्व के संस्कार स्थापित करने की कोशिश होती रही है। संघ का मानना है कि जनगणना में आदिवासियों द्वारा अपना धर्म ‘अन्य’ बताये जाने से देश की कुल आबादी में हिन्दुओं का प्रतिशत घट गया है। अत: संघ अब एक अभियान चलाकर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि आगामी जनगणना में धर्म के कॉलम में आदिवासी ‘हिन्दू’ पर ही निशान लगाए, ताकि हिन्दुओं का प्रतिशत बढ़ जाए।

विदित हो कि भारत का संविधान एवं सरकारी रिपोर्ट के अनुसार आदिवासियों की परंपरा एवं संस्कृति अन्य धर्म से भिन्न व अलग है। भारत की जनगणना रिपोर्ट सन् 2011-12 के अनुसार आदिवासियों की संख्या लगभग 12 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 9.92 प्रतिशत है। इसके बावजूद जनगणना प्रपत्र में अलग से गणना नहीं करना इनको चिंतित करता है। झारखण्ड की 3.5 करोड़ की जनसंख्या में आदिवासियों की संख्या 90 लाख के करीब है।

वर्तमान में देश में 781 प्रकार के आदिवासी समुदाय निवास करते हैं जिसमें 83 अलग-अलग धार्मिक परंपराएं हैं।

1951 की जनगणना में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध और मूल निवासी / आदिवासी के अलावा ‘अन्य’ का विकल्प भी था। सन् 2011 में यह कालम भी हटा दिया गया।

इनमें कुछ प्रमुख हैं जो सरना, गौंड, पुनेम, आदि और कोया कहे जाते हैं। इनकी सभी धार्मिक परंपराओं में समानता यह है कि सभी प्रकृतिपूजक और पूर्वजों के आराधक हैं। आदिवासियों में न तो कोई पुरोहित वर्ग होता है, न जाति प्रथा, न पवित्र ग्रन्थ, न मंदिर और ना ही देवी-देवता। जहां संथाल समुदाय अपने पूजास्थल को ‘जेहराथान’ कहते हैं वहीं ‘हो’ समुदाय के लोग ‘देशाउलि’ को अपना सर्वेसर्वा मानते हैं। सभी आदिवासी प्रकृति पूजा के तौर पर पेड़ों की पूजा करते हैं, जो पर्यावरण के दृष्टिकोण से काफी साकारात्मक है।

टोनी जोसफ की पुस्तक ‘अर्ली इंडियन्स’ के अनुसार भारत भूमि के पहले निवासी वे लोग थे जो लगभग 60 हजार वर्ष पहले अफ्रीका से यहां पहुंचे थे। लगभग तीन हजार साल पहले आर्य भारत में आए और उन्होंने यहां के मूल निवासियों को जंगलों और पहाड़ों में खदेड़ दिया, जो आज आदिवासी कहलाते हैं। दूसरी तरफ संघ आदिवासीयों को मूलतः हिन्दू मानता है, जो मुस्लिम शासकों के अत्याचारों के कारण जंगलों में रहने चले गए थे जबकि संघ के इस दावे का कोई वैज्ञानिक व ऐतिहासिक आधार है ही नहीं। संघ अपने राजनैतिक एजेंडे को अमली जामा पहनाने के लिए आदिवासियों को ‘वनवासी’ बताता है। मतलब वन में निवास करने वाला क्योंकि आदिवासी शब्द से तार्किक आधार पर यह साफ हो जाता है कि आदिवासी ही मूलवासी हैं जबकि संघ का हिन्दू राष्ट्रवाद मानता है कि आर्य इस देश के मूल निवासी हैं और यहीं से वे दुनिया के विभिन्न भागों में गए।

आदिवासियोंं के धर्म कोड की मांग की संस्था ”राष्ट्रीय आदिवासी-इंडीजीनस धर्म समन्वय समिति” के संयोजक अरविंद उरांव बताते हैं कि 2021 में होने वाली जनगणना को लेकर देश के सभी राज्यों के ट्राईबल समुदाय के लोगों ने ट्राईबल धर्म कोड की मांग को लेकर 18 फरवरी 2020 को दिल्ली के जंतर मंतर पर एक दिवसीय धरना दिया। अरविंद उरांव बताते हैं कि देश के जो ट्राईबल लोग दिल्ली आने में अक्षम थे, वे अपने अपने राज्यों के राजभवन के सामने एक दिवसीय धरना दिया, प्रदर्शन किया।

अरविंद उरांव बताते हैं कि आगामी जनगणना का समय आ चुका है,अप्रैल 2020 से सितम्बर 31 तक मकान सूचीकरण एवं मकान गणना अनुसूची शुरू होने वाली है एवं 9 फरवरी 2021 से 28 फरवरी 2021 तक जनगणना होगी। इसलिए हम सभी आदिवासी अपने अस्तित्व, आस्था एवं पहचान को बनाए रखने के लिए कंधा से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं। अरविंद उरांव कहते हैं ‘राष्ट्रीय आदिवासी-इंडीजीनस धर्म समन्वय समिति’ भारत, द्वारा संपूर्ण भारत देश के सभी ट्राइब्स समुदाय को कोर्डीनेट किया जा रहा है। सभी राज्यों में बैठकें, सभाएं एवं सेमिनार लगातार किया जा रहा है। देश के सभी समाजिक संगठनों, समाजिक अगुवाओं, लेखक-लेखिकाओं, छात्र-छात्राओं, बुद्धिजीवी वर्ग सहित राजनीतिक राज्यस्तरीय तथा राष्ट्रीय नेताओं को भी बुलाया जा रहा है। 18 फरवरी 2020 को दिल्ली के जंतर-मंतर के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के राजभवन के समक्ष धरना-प्रदर्शन किया गया और इस मांग को लेकर हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हमें जनगणना प्रपत्र में ट्राइबल्स के अलग धर्म कॉलम नहीं मिल जाता है।

बता दें कि ट्राइबल्स धर्म कोड की मांग को लेकर 2014 से ही देश के राज्यों में अपने अपने तरीके से आंदोलन और सेमिनार शुरू किए गए, जो लगातार जारी है।

झारखंड की रहने वाली सुनीता उरांव बताती हैं कि मैं सरना धर्म को मानती हूँ, हम आदिवासी प्रकृति को पूजते हैं, हम आदिवासियों की यह मान्यता है कि प्रकृति है, तभी जीवन है, और हम आदिवासी सरना धर्म को मानते हैं। आदिवासियों के पास अपना सरना धर्म होते हुए भी सरना धर्म को पहचान सरकार से नहीं मिली है। जनगणना में भी सरना कोड नहीं होने के कारण हमें दूसरे धर्म के कॉलम में भरने को मजबूर किया जाता है, जिसके कारण दिन प्रतिदिन सरना आदिवासियों की जनसंख्या का विलय होता जा रहा है।

वे कहती हैं कि आशंका है कि एक दिन सरना लोगों का अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा, क्योंकि सरकार ने हम आदिवासियों को सरना लिखने तक का विकल्प नहीं दिया है।

आज भी झारखण्ड के 90 लाख के करीब सरना आदिवासियों के पास अपने धर्म को सरकारी दस्तावेजों में लिखने की कोई जगह नहीं मिली है।

2021 में देश की अगली जनगणना होगी, हमारे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन भाई-बहनों के पास अपना धर्म कोड होगा पर हमारे पास अपना धर्म कोड नहीं है।

आदिवासी धर्म को सरना धर्म कहे जाने पर आदिवासी समाज के अगुआ समझे जाने वाले कई लोगों के विचारों में काफी विरोधाभास है। एक तरफ झारखंड के अवकाश प्राप्त प्रशासनिक अधिकारी संग्राम बेसरा कहते हैं कि झारखंड में 32 आदिवासी समुदाय हैं, मगर किसी भी आदिवासी भाषा में सरना शब्द नहीं है, मतलब सरना आदिवासियों का शब्द है ही नहीं। वे बताते हैं कि सरना रांची की नागपूरी-सादरी बोली का शब्द है। वहीं आदिवासी समाज की अगुआ समाजसेविका आलोका कुजूर बताती हैं कि सरना शब्द संघ प्रायोजित है। संघ आदिवासियों के बीच इनके धर्म को लेकर भ्रम की स्थिती पैदा कर देना चाहता है, ताकि आदिवासियों को अपने पक्ष में किया जा सके।

संग्राम बेसरा, सेवानिवृत्त अधिकारी, झारखंड सरकार

आदिवासी मामलों के जानकार रतन तिर्की कहते हैं कि बंधन तिग्गा जिसने आदिवासी धर्म को सरना धर्म का नाम दिया वे संघ के काफी करीबी थे। वे भी बताते हैं कि सरना शब्द आदिवासियों की किसी भी भाषा में नहीं है। जबकि सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार एवं हो समाज के अगुआ योगो पुर्ती सरना शब्द पर जानकारी देते हुए एक पुरानी कहानी सुनाते हैं। वे बताते हैं कि एक हो युवक तीर चलाया जो साल का एक सूखा पेड़ पर जा गिरा। तीर सूखे पेड़ में जा धंसा। तब युवक ने चिल्लाते हुए कहा- सरजोम। सर मानी तीर व जोम मानी खाना। मतलब साल के पेड़ ने तीर खा लिया। तब से साल के वृक्ष की पूजा शुरू हो गई। योगो का मानना है कि शायद सरना शब्द सरजोम से ही आया हो।

साफ है कि जनगणना की प्रक्रिया के जरिए आदिवासियों से उनकी विशिष्ट धार्मिक पहचान छीनने वाले कदम चाहे जिस किसी भी सरकार ने उठाए हों, आज की हिंदुत्व आधारित राजनीति के लिए सुविधाजनक है पर दिक्कत यह है कि देश के आदिवासी समुदाय हिंदुत्व की राजनीति के तकाजों पर अपनी पहचान की बलि देने को तैयार नहीं हैं। देखना है कि अपनी पहचान सुनिश्चित करने की यह लड़ाई आदिवासी समुदाय कहां तक ले जा पाता है।

बताते चलें कि 6 फरवरी, 2020 को भोपाल में आयोजित एक बैठक में मोहन भागवत ने कहा था कि 2021 की जनगणना में आदिवासी अपना धर्म हिंदू लिखवाएं। इसके बाद से इस मुहिम में आरएसएस की सक्रियता बढ़ने के संकेत साफ दिख रहे हैं। संघ के मुहिम के खिलाफ़ आदिवासी समुदायों में काफी तीव्र प्रतिक्रियाएं हुईं। 18 फरवरी का कार्यक्रम इसी प्रतिक्रिया का संकेत था।

आदिवासियों की मांग है कि जनगणना प्रपत्र में उनके लिए एक पृथक “आदिवासी / इंडिजीनियस धर्म” का कॉलम हो। इसकी वजह यह है कि आदिवासी लोग स्वयं को हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या पारसी धर्मों में विलय नहीं चाहते। उनका कहना है कि उन्हें लंबे समय से हिंदू धर्म का हिस्सा बताया जाता रहा है, जो गलत है जबकि अंग्रेजों के समय आदिवासियों के लिए अलग से आदिवासी धार्मिक कोड था।

कहना न होगा कि आदिवासियों को हिन्दू बताने या बनाने के संघ के प्रयास के निहितार्थ केवल हिन्दुओं का अनुपात बढ़ाना नहीं है, बल्कि उसकी नजर आदिवासियों के जंगल-जमीन पर है, जिसपर कब्जा करके पूंजीपतियों को सौंपा जा सके।

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