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ग्राउंड रिपोर्ट: झारखंड- पहले ही विलुप्त होती परहिया जनजाति पर टीबी का गहराता ख़तरा

झारखंड से विलुप्त होती कई आदिम जनजातियां संकट में हैं. इनकी अजीविका का एक मात्र साधन केवल जंगल निर्भरता रही है. कभी लाइलाज समझी जाने वाली बीमारी टीबी पर आज नियंत्रण कर लिया गया है, लेकिन सरकारी उदासीनता और सरकारी अस्पतालों की उपेक्षा के चलते इन आदिम जनजातियों की एक बड़ी आबादी टीबी से ग्रसित है.

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झारखंड से विलुप्त होती कई आदिम जनजातियां संकट में हैं. इनकी अजीविका का एक मात्र साधन केवल जंगल निर्भरता रही है.  इनकी जीविका कृषि आधारित कभी नहीं रही. लेकिन आज ये जनजातियां दोहरी मार झेल रही हैं. एक तरफ जंगल के कटने और वन अधिनियम के चलते इनको जंगल से बेदखल होना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर जंगल से मिलने वाले फल-फूल व कंद-मूल के अभाव में इन्हें पोषण तत्त्व नहीं मिल पा रहे हैं. जिसके कारण ये कई बीमारियों से ग्रसित हो गये हैं.

कभी लाइलाज समझी जाने वाली बीमारी टीबी पर आज नियंत्रण कर लिया गया है, लेकिन सरकारी उदासीनता और सरकारी अस्पतालों की उपेक्षा के चलते इन आदिम जनजातियों की एक बड़ी आबादी टीबी से ग्रसित है.

पलामू जिले के मनातु प्रखंड स्थित डूमरी पंचायत का दलदलिया, सिकनी (फटरिया टोला), केदला (कोहबरिया टोला) में आदिम जनजाति परहिया समुदायों के केदल गांव निवासी सकेन्दर परहिया, डुमरी पंचायत के दलदलिया टोला के सोमर परहिया, डुमरी पंचायत के दलदलिया टोला के विदेशी परिहिया, धुमखर के अनिल परहिया और भूईनया के सुरेश परहिया, ये 6 लोग काफी दिनों से टी.बी. रोग से पीड़ित हैं. लेकिन जब इन सभी के मुंह से लगभग 20 दिन पहले खून आने लगा तो गांव के लोगों ने उन्हें नजदीकी सरकारी अस्पताल मनातु सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया. मगर यहां इनका इलाज नहीं किया गया. इन्हें पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल ले जाने को कहा गया.

जब इन्हें पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की गई, जो कि वहां से करीब 70 किमी दूर है, तो बीमारों को डांटकर भगा दिया गया. मरता क्या नहीं करता, गांव के कुछ लोगों ने एक अप्रैल को इन्हें मोटरसाइकिल से पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल पहुंचाया. अस्पताल ले जाने के क्रम में रास्ते में मोटरसाइकिल चालकों को कई बार रूकना पड़ा क्योंकि ये इतने कमजोर हो चुके थे कि मोटरसाइकिल में बैठने में भी असमर्थ थे.

पलामू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराने के बाद मरीजों की जांच मेडिकल अस्पताल के लैब में न कराकर बाहर की निजी लैब में भेज दिया गया. इतना ही नहीं इनको मेडिकल अस्पताल से दवा न देकर बाहर से दवा खरीदने की सलाह दी गई. अस्पताल के चिकित्सकों व कर्मचारियों की संवेदनहीनता का अलम यह रहा कि इन्होंने मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया. जबकि गांव के लोग इन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर गांव वापस आ गए थे. स्थिति यह हुई कि भर्ती हुए लोगों को लगा कि यहां इनका कुछ नहीं होने वाला है, तो ये लोग 2 अप्रैल को पैदल ही अपने गांव लौट चले. बीमार कमजोर ये लोग 70-75 किमी पैदल चलकर तीन दिन बाद किसी तरह अपने घर आ पाए.

सकेन्दर परहिया के पिता चरखू परहिया ने 6 अप्रैल को जेएसएलपीएल (झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशनल सोसाइटी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह विशेष सचिव, झारखंड सरकार के राजीव कुमार को एक पत्र भेजकर बताया कि उसका बेटा सकेन्दर परहिया सहित अन्य छ: परहिया समुदाय के लोग काफी बीमार हैं. उनके मुंह से खून आने लगा तो हमलोगों ने जब उन्हें नजदीकी सरकारी अस्पताल मनातु सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराने गये, तो हमें अपशब्द बोल कर भगा दिया गया. हमारे गिड़गिड़ाने पर हमें पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल ले जाने को कहा गया. जब इन्हें पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की गई, जो कि यहां से काफी दूर है, तो भी हमें को डांटकर भगा दिया गया.

चरखू परहिया का आरोप है कि जब भी वे लोग अस्पताल जाते हैं, उन्हें डांटकर भगा दिया जाता है. चरखू परहिया के पत्र को तुरंत संज्ञान में लेते हुए जेएसएलपीएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह विशेष सचिव राजीव कुमार ने पत्रांक JSLPL/027, दिनांक 06/05/2020 के तहत पलामू के डीसी को निर्देश दिया कि कैम्प लगाकर मेडिकल टीम द्वारा पीड़ितों की जांच कराई जाय और जरूरत पड़ने पर उन्हें रांची स्थित इटकी के टी.बी अस्पताल में भर्ती किया जाय. इस निर्देश के बाद मेडिकल टीम द्वारा इनकी जांच की गई तथा 9 अप्रैल को पीड़ितों को पलामू मेडिकल कालेंज अस्पताल भेजा गया.

एनसीडीएचआर के राज्य समन्वयक मिथिलेश कुमार बताते हैं कि मनातु प्रखंड के दलदलिया गांव का विदेशी परहिया और केदल गांव (कोहबरिया टोला) का सकेन्दर परहिया, जो टीबी की गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं, को 9 अप्रैल को पीएमसीएच (पलामू मेडिकल कॉलेज एण्ड होस्पिटल) में भर्ती कराया गया. मगर इन टीबी मरीजों को भर्ती कराने में हमारे पसीने छुट गये. भर्ती के पूर्व इन लोगों के अस्पलात में बेड के लिए वार्ड से लेकर अस्पताल अधीक्षक कार्यालय और यक्ष्मा केन्द्र तक चक्कर लगाने पड़े. अस्पताल के बड़े तो बड़े छोटे कर्मचारी भी कुछ सुनने को तैयार नहीं थे. सभी एक दूसरे पर टालते रहे. ट्रोली मैन मरीज के साथ गए लोगों को ही ट्रोली से मरीज को ले जाने का निर्देश दे रहा था. सब के सब एक दूसरे पर फेंकते रहे.

मिथिलेश कुमार ने बताया कि यहां अव्यवस्था की स्थिति का आलम यह था कि सिविल सर्जन के फोन तथा निर्देश के बाद भी कोई सुनने वाला नहीं था. अंततः बड़ी मशक्कत के बाद हम लोगों ने टीबी पीड़ित परहिया व लोगों को बेड दिलवा पाये, तो ऐसा लगा कि जैसे हमने कोई जंग जीत लिया हो. मगर कक्ष में इतनी गंदगी थी कि बीमार सकेन्दर परहिया बेड पर सोने को तैयार नहीं था, किसी तरह समझा बुझा कर उसे बेड पर रखा गया. विदेशी परहिया अस्पताल के अंदर की गंदगी से घबड़ाकर बाहर आकर बैठ गया. विदेशी परहिया का कहना था कि यहां काफी दिन हम नहीं रह पायेंगे. क्योंकि मेरा घर इससे बहुत ज्यादा साफ-सुथरा रहता है. जबकि सकेन्दर परहिया जो चल फिर सकने अक्षम होने कारण चुपचाप बेड पर पड़ गया.

मिथिलेश बताते हैं कि अभी इन्हें सिर्फ भर्ती कराया गया है. अभी इनका चेक अप होना बाकी है. बीमार मरीज को सहानुभूति की जरूरत होती है, लेकिन यहां अस्पताल कर्मियों का जो व्यवहार हैं, उससे लगता है कि मरीज ठीक होने के बजाय और बीमार हो जाएंगे. इन टीबी मरीजों को पिछले 1 अप्रैल को इसी अस्पताल में भर्ती कराया गया था और ये लोग अस्पताल से भाग गये थे. मिथिलेश कुमार कहते हैं कि इस अस्पताल की अव्यवस्था और गंदगी देखने बाद समझ में आ गया कि ये लोग बगैर ठीक हुए क्यों भाग गये थे.

हालांकि इस मामले को मुख्यमंत्री जन संवाद केंद्र, झारखंड ने संज्ञान में लिया है.

व्यवस्थागत कमियों को इसी से समझा जा सकता है कि मरीजों की पर्ची पर ‘पलामू मेडिकल कालेज अस्पताल’ अंकित है, जबकि मरीजों के रजिस्ट्रेशन पर्ची पर ‘सदर अस्पताल मेदनीनगर पलामू’ लिखा हुआ है.

झारखंड के विभिन्न इलाकों में आदिम जनजातियों के लोग रहते हैं. इनमें कोरवा, परहिया, असुर, बिरजिया, बिरहोर, माल पहाड़िया, साबर, सौरिया पहाड़िया और हिल खड़िया आदि जनजातियां शामिल हैं. इनकी संख्या लगातार कम से कमतर होती जा रही हैं. जिसका कारण यह है कि इनकी अजीविका का एक मात्र साधन केवल जंगल आधारित रहा है, क्योंकि इनकी निर्भरता कृषि आधारित कभी नहीं रही. इनको जंगलों से कई तरह की जीवनोपयोगी जड़ी-बुटी, कंद-मूल (कंदा, गेठी वगैरह) और संतुलित आहार के तौर पर कई तरह की सागों से पोषक तत्त्व मिलते रहे हैं. ये जंगलों से बांस वगैरह काट कर उससे टोकरी वगैरह बनाकर अपनी अन्य जरुरतें भी पूरी करते रहे हैं.

अब जंगल के कटने और वन अधिनियम के तहत इनको जंगल से बेदखल किया जा रहा है. इनके पास कृषि के लिए जमीन भी नहीं है. जिनके पास थोड़ी जमीन है भी तो वे उस पर खेती नहीं कर पाते हैं. मतलब ये लोग आज भी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हैं. यही वजह है कि आज ये लोग कुपोषण के कारण कई खतरनाक बीमारियों से ग्रसित रह रहे हैं, तथा इनके मृत्यु दर का ग्राफ बढ़ता रहा है. जिसकी वजह से इन्हें विलुप्त होनेवाली जनजातियों में शुमार किया गया है.

राज्य के पलामू जिले में परहिया जनजाति कई आदिवासी समुदायों के बीच रहती है. करीब 20 लाख जनसंख्या वाले पलामू में परहिया जनजातियों की जनसंख्या लगभग 5 हजार है. वहीं जिला मुख्यालय से करीब 70 कि.मी. दूर है मनातु प्रखंड, जहां राशन कार्ड में दर्ज नामों के आधार पर इनकी आबादी 1003 है. आनलाइन सर्च में 420 परहिया परिवारों का राशन कार्ड दिखता है. जबकि सूत्र बताते हैं कि यहां 500 से अधिक परहिया परिवार रहते हैं. स्पष्ट है कि राशन कार्ड में एक परिवार से औसतन 2 लोगों का ही नाम दर्ज किया गया है. जबकि एक परिवार में औसतन 4-5 की संख्या मानी जाती है.

यहां बताना लजिमी होगा कि टीबी और कोरोना का संक्रमण के फैलने की प्रक्रिया एक समान है. जहां कोरोना अभी लाइलाज है, वहीं टीबी अब लाइलाज नहीं रहा. सरकार की ओर से इसके इलाज के साथ दवाइयां भी मुफ्त में दी जाती हैं. मगर हमारी व्यवस्था में जंग लग चुका है, स्वास्थ्य कर्मी संवेदनहीन हो चुके हैं. अगर इन टीबी मरीजों का इलाज समय रहते नहीं हुआ तो इस समुदाय के लिये काफी खतरनाक स्थिति पैदा हो जाएगी.

बता दें कि जहां परहिया जनजाति के पुरूष वर्ग टीबी के शिकार हैं वहीं महिलाओं में एनिमिया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. विदित हो कि एनिमिया खून में आयरन की कमी से होता है. जिसे दूर करने के लिए आयरन की गोली जरूरी होती है. लेकिन सरकारी योजनाओं की उपेक्षा के शिकार इन परहिया जनजाति में मातृ व शिशु मृत्यु दर बढ़ा है.

इस बावत शोधार्थी ‘वन उत्पादकता संस्थान’ रांची के स्वयं विद् बताते हैं कि ”आयरन की कमी को दूर करने में खपड़ा साग काफी सहायक होता है. झारखंड में यह साग पायी जाती है जिसे इस आदिम जनजाति के हर परिवार के घर के आस-पास में भी पैदा किया जा सकता है”

बताते चलें कि झारखंड जो आदिवासी बहुल राज्य है, जहां 24 जिलों में कुल 260 प्रखंड हैं, जिनमें से 168 प्रखण्डों में झारखण्ड सरकार के दिशा-निर्देश से प्रखण्ड स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जिन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से डाकिया योजना के तहत 35 किलो का खाद्यान्न पैकेट बनाकर इन प्रखंडों के गांवों में आदिम जनजातियों के घर तक वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी दी गई है, जिसकी जवाबदेही सरकारी डीलर के तौर पर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को दी गई है. मगर इन परहिया समूदायों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है.


विशद कुमार, झारखंड के स्वतंत्र पत्रकार हैं और लगातार जन-सरोकार के मुद्दों पर मुखरता से ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। 


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