Home ख़बर ग्राउंड रिपोर्ट चुनाव चर्चा: कितनी कारगर होगी अमित शाह की चुनावी व्यूह रचना?

चुनाव चर्चा: कितनी कारगर होगी अमित शाह की चुनावी व्यूह रचना?

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  चंद्र प्रकाश झा 

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह पर आगामी लोक सभा चुनाव में भाजपा की जीत की व्यूह रचना तैयार करने की भारी जिम्मेवारी है, हालांकि उनके खुद यह चुनाव लड़ने की लगभग कोई संभावना नहीं है। वह अभी गुजरात से राज्य सभा सदस्य हैं। गौरतलब है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक आपराधिक मामले में गुजरात से ‘ तड़ीपार’ घोषित रहे अमित शाह को 2014 के पिछले लोक सभा चुनाव के बाद भाजपा का अध्यक्ष बन जाने के उपरान्त  सियासी और मीडिया  हल्कों में  राजनीति का ‘ चाणक्य ‘ कहा जाने लगा।

जब 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) की सरकार का गठन हो गया तो उस चुनावी जीत का सारा श्रेय मोदी जी के हवाले कर दिया गया। उस चुनाव में अपने दम बहुमत पाने वाली भाजपा के अध्यक्ष तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके राजनाथ सिंह थे, जिन्हे चाणक्य नहीं कहा गया। जब मोदी जी की इच्छा के अनुरूप राजनाथ सिंह के केंद्रीय गृहमंत्री बन जाने के बाद अमित शाह को जुलाई 2014 में भाजपा अध्यक्ष बनाया गया तो उन्हें चाणक्य कहने वालों की भरमार हो गई।

22 अक्टूबर  1964 को मुंबई में पैदा हुए अमित शाह सबसे पहली बार 1997 में गुजरात के सरखेज विधान सभा सीट पर उपचुनाव में निर्वाचित हुए। वह वहीं से लगातार चार बार चुने जाने के बाद 2012 में नारणपुरा से विधायक बने। अहमदाबाद में जैव-रसायन में बीएससी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह पीवीसी पाईप के अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने के अलावा स्टॉक ब्रोकर भी रहे। बताया जाता है कि वह कॉलेज की शिक्षा के दौरान ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हो गए और 1982 में नरेंद्र मोदी के संपर्क में आने के बाद राजनीति में आगे बढ़ते गए। वह 2002 में गुजरात में मोदी सरकार के मंत्री बने। वह राज्य में मोदी जी के 12 वर्ष के शासन में ताकतवर नेता हो गए। अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को एक ओर महाराष्ट्र , हरियाणा , झारखंड, असम  , उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड और गुजरात और त्रिपुरा के चुनाव में जीत मिली और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों समेत जम्मू -कश्मीर में भी साझा सरकार बनाने का मौक़ा मिला। लेकिन दूसरी ओर भाजपा को दिल्ली, बिहार, छत्तीसगढ़,  मध्य प्रदेश और राजस्थान में हार का सामना भी करना पड़ा। 

अमित शाह 2014 के चुनाव के समय भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी थे। तब उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी। मीडिया के एक हिस्से ने इसे रेखांकित करने के लिए अमित शाह को चाणक्य कहना शुरू कर दिया। जाहिर है मीडिया ने भारतीय राजनीति में अमित शाह को चाणक्य का विशेषण, उनके तड़ीपार रह चुकने के तथ्य को नजरअंदाज कर सत्ता में उनकी दखल दर्ज होने के उपरान्त दिया। अमित शाह  के भाजपा अध्यक्ष बनने के पहले 2014 के लोक सभा चुनाव हो चुके थे और उसके बाद के प्रांतीय और अन्य चुनावों में उनकी पार्टी को उत्तर प्रदेश के सिवाय कोई ख़ास सफलता नहीं मिली है। उत्तर प्रदेश में चुनाव मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद राज्य में साम्पदायिक विभाजन की पृष्ठभूमि में हुए थे और राज्य में विपक्षी दलों के बीच उस तरह का कोई समन्वय नहीं था जो इस बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की पृष्ठ्भूमि  में हो रहा है।

अमित शाह को राजनीति का चाणक्य कहे जाने पर जब-तब कुछ सवाल धीमे स्वर में ही सही उठते रहे हैं।  यह सवाल तब भी उठा जब भाजपा, बिहार विधान सभा के 2015 के पिछले चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ,  मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल-यूनाइटेड और कांग्रेस के महागठबंधन से परास्त हो गई थी। अमित शाह ने तब सार्वजनिक रूप से यहां तक कह दिया था कि चुनाव में महागठबंधन की हार निश्चित है,  कितने बजे परिणाम निकलेंगे,  तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कितने बजे अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुला कर अपना इस्तीफा देने राजभवन जाएंगे और उसके बाद भाजपा की खुद की सरकार का गठन हो जाएगा। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।  यह दीगर बात है कि महागठबंधन की नीतीश कुमार के ही मुख्यमंत्रित्व में बनी नयी सरकार ज्यादा टिक नही सकी। कारण जो भी थे नीतीश कुमार ने पलटी मारी और अपनी सरकार से महागठबंधन के अन्य दलों को बाहर करने के लिए 26 जुलाई 2017 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफा से  महागठबंधन की वह सरकार गिर गई। नीतीश कुमार ने नए सिरे से बनाई सरकार में भाजपा को भी शामिल कर लिया।

अमित शाह को उनके गृह राज्य गुजरात की विधान सभा के 2017 में हुए चुनाव में भी कोई ख़ास सफलता नहीं मिली क्योंकि उसमे भाजपा को कांग्रेस की कड़ी टक्कर के बीच पहले की अपेक्षा बहुत ही काम अंतर से बहुमत मिल सका। गोआ के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस उभरी थी। ये दीगर बात है कि भाजपा,  जोड़-तोड़ और मोदी सरकार के इशारे पर राज्यपाल से प्राप्त अनुकम्पा के सहारे अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो गई। इसके पहले भाजपा को हरियाणा विधान सभा जीत कर वहाँ पहली बार अपनी सरकार बनाने में सफलता जरूर मिली। भाजपा,  महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के बाद वहाँ भी पहली बार अपने नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाने में सफल रही।  लेकिन यह गठबंधन सरकार अलग -अलग चुनाव लड़ने वाली भाजपा और शिवसेना के हाथ मिलाने से ही बन पाई जिसमें अमित शाह की ‘ चाणक्य बुद्धि’ की कोई भूमिका नहीं थी। इसी बरस कर्नाटक विधान सभा के हुए चुनाव के परिणामों से उत्पन्न परिस्थितियों में अमित शाह की ‘ चाणक्य बुद्धि ‘ की कोई काम नहीं आई। वहाँ पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस.येदुरप्पा के मुख्यमंत्रित्व में भाजपा की बनी अल्पमत सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवेगौड़ा के जनता दल-सेकुलर और कांग्रेस के बीच चुनाव-बाद हुए अप्रत्याशित गठबंधन के स्पष्ट बहुमत के कारण इस्तीफा देना पड़ा।

भारत के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव के परिणामों के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों में अफरा-तफरी मची है। यह अफरा-तफरी  छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश,  मिजोरम, तेलंगाना और राजस्थान में ही नहीं अन्यत्र भी है। चुनाव परिणाम निकलने के एक दिन पहले केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने मंत्री और संसद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया जो अफरा-तफरी का माहौल और बढ़ा सकती है। इन चुनावों के बीच ही तीन केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेता – सुषमा स्वराज, उमा भारती और अरुण जेटली ने अगला आम चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर दी। 2014 के लोकसभा चुनाव में निर्वाचित भाजपा के कुछेक सांसदों ने भी इस्तीफे दे दिए हैं। उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) गठबंधन में शामिल थी, जिससे वह बाहर होकर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बनाये महागठबंधन में शामिल हो चुकी है। एनडीए से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रा बाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी ( टीडीपी ) और जम्मू -कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की पीपुल्सडेमोक्रेटिक पार्टी ( पीडीपी )  पहले ही बाहर निकल चुकी है।  इन पांच राज्यों की विधान सभा चुनावों में से किसी में भी भाजपा का गठबंधन नहीं था।

वर्ष 2014 के पिछले लोक सभा चुनाव के बाद केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के ‘ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस‘ ( एनडीए ) की सरकार बनी तो उसमें एक-एक करके 43 दल शामिल हो गए। इन 43 दलों में से कुछ पहले से एनडीए में थे। इनमें से करीब एक दर्ज़न भर दल एनडीए से अलग हो चुके है। बहरहाल, देखना है कि अगले आम चुनाव में भाजपा गठबंधन और बिखरता है या फिर सुदृढ़ होता है। जाहिर है कि इसमें अमित शाह की ‘ चाणक्य बुद्धि’ दाँव पर लगी होगी।

(मीडिया विजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)

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