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बिहार: बालू के टीले पर किसानों ने उगाया सोना, लॉकडाउन ने सब किया मिट्टी

यूपी से आये किसान राघवेन्द्र बताते है कि एक एकड़ में तरबूज से पचास हजार से एक लाख तक का मुनाफ़ा हो जाता था. इससे पूर्व खेत पर ही बड़े बड़े व्यापारी पन्द्रह से सत्रह रूपये किलोग्राम के हिसाब से टन का टन तरबूज ले जाते थे, लेकिन आज चार से पांच रूपये किलो भी नही बिक रहा है।पढ़िए लॉकडाउन के कारण किसानों की व्यथा की एक और कहानी...

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प्रशांत कुमार

“दस रूपये सैकड़ा ब्याज पर रुपये लेकर आया था और यहाँ खेती किया हूँ. इस बार घर बेचकर सेठ को रुपया देना पडेगा. घर में बेटी है सोचा था इस बार के आमदनी से सेठ का रुपया लौटा उसकी शादी करा दूंगा, लेकिन अब इस बार तो तरबूज की फसल बर्बाद हो गई. घर से घाटा लगा है. जमीन मालिक को भी पैसा देना है. क्या करूँ, कहाँ जाऊं, समझ नहीं आ रहा है”. इतने कहते-कहते उत्तर प्रदेश के बागपत से आये किसान मुन्नवर चुप हो जाते हैं और बर्बाद हो चुके तरबूज को निहारने लगते हैं.

ये मामला है बिहार के सहरसा जिले के नवहट्टा प्रखण्ड का जहाँ हजारों एकड़ में तरबूज की खेती पिछले चार पांच वर्षों में बड़े पैमाने पर होती है. उत्तर प्रदेश के करीब पचास किसानों द्वारा तरबूज की खेती ऐसी बंजर जमीन पर की जा रही है जहाँ किसी भी तरह की फसल उत्पादन नहीं हो सकता है. सहरसा में कोसी तटबंध के भीतर करीब दो किलोमीटर चौराई वाले बालू के टीले पर तरबूज रूपी सोना उगाया जा रहा है. क्षेत्र के अनुभवी बुजुर्ग बताते है कि पिछले साठ वर्षों में इस बालू के टीले पर किसी भी अनाज का उत्पादन एक दाना के रूप में भी संभव नहीं हो पाया है. लेकिन यूपी के किसानों के द्वारा जब इस बलुआई जमीन पर तरबूज का सफल प्रयोग किया तो लोगों में आशा जगी.

यूपी से आये किसान राघवेन्द्र बताते है कि एक एकड़ में तरबूज से पचास हजार से एक लाख तक का मुनाफ़ा हो जाता था. इससे पूर्व खेत पर ही बड़े बड़े व्यापारी पन्द्रह से सत्रह रूपये किलोग्राम के हिसाब से टन का टन तरबूज ले जाते थे, लेकिन आज चार से पांच रूपये किलो भी नही बिक रहा है. किसान बताते है कि एक ट्रक में करीब दस टन तरबूज लोड हो पाता है. अभी तो बाहर से गाड़ी भी नहीं आ पाती है. कुछ गाड़ी आना भी चाहे तो पुलिस उसे परेशान करती है.

एक अन्य किसान बताते है कि पिछले वर्ष 2300 रूपये एकड़ के हिसाब से मालिक से जमीन लिया था, लेकिन इस बार 6900 रूपये एकड़ खेत लिया है. अब बड़ी समस्या है कि कहाँ से जमीन मालिक को पैसे दें और कैसे अपने घर जाएं. घर जाएं भी तो फिर वहां क्या खाएं. चूँकि वहां से भी तो ब्याज पर पैसे लेकर यहाँ खेती करने आये थे.

स्थानीय राजेश डेनजिल बताते हैं कि शुरआत में तो दो-तीन किसानों द्वारा इस बालू के टीले पर तरबूज की खेतु शुरू की गयी. बाद में उनके मुनाफा को देखकर अन्य किसान भी आकर्षित हुए और इस क्षेत्र में तरबूज और सब्जी की खेती के लिए आने लगे. पिछले पांच वर्षों से यहाँ तरबूज की खेती की जा रही है लेकिन विगत तीन वर्षों से ये बड़े पैमाने पर की जाने लगी है. उन्होंने बताया जिनकी-जिनकी जमीन बालू का टीला था वो भी आज मुनाफ़े में है. बताया पचास से ज्यादा ऐसे जमींदार है जिसकी जमीन पर आज तरबूज की खेती की जा रही है.

उन्होंने बताया कि खेती शुरू होने के बाद इन लोगों को यहाँ से अच्छा मुनाफ़ा भी होने लगा. लेकिन इस वर्ष कोरोना संकट के कारण हुए लॉकडाउन के कारण इनके तरबूज को न बाजार मिल रहा है, न बाहर वाले व्यापारी, न खरीदार. अब इन किसानों को बड़ी समस्या है कि वो कैसे इतने तरबूज को निपटाएं.

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किसान इस बलुआही जमीन पर न केवल तरबूज बल्कि कद्दू, खीरा, करेला आदि भी उगाये है, जो आज बिक्री के आभाव में खेतों में ही सड़ रहे हैं. किसान बताते हैं कि चूँकि यह क्षेत्र लोगों की बस्ती से अलग है तो यहाँ लोगों का आना-जाना भी नहीं है. इस कारण हमलोग फ्री में भी किसी को नहीं दे पा रहे हैं. जो कुछ लोग खेत तक पहुँच रहे हैं उसे तो ऐसे ही दे दे रहे हैं. लेकिन फिर भी बहुत तरबूज, खीरे आदि खेत में ही बर्बाद हो रहे हैं.

इसी तरह बिहार के कोसी प्रमंडल के मधेपुरा जिलान्तर्गत पुरैनी में करीब पचास एकड़ में तरबूज की खेती हो रही है. यहाँ भी किसान लॉकडाउन के कारण रो रहे है. इन्हें भी न तो बाजार मिल रहा है, न खरीददार. आसपास के छोटे व्यापारी कम मात्रा में तरबूज ले जा रहे हैं. लेकिन उसकी कीमत उसे औने पौने में मिल पाती है. इस चलते उनकी जिन्दगी बदहाल हो चुकी है. यहाँ के किसान भी बताते है कि कुछ लोग ब्याज और कुछ लोग कर्ज लेकर तरबूज की खेती किये थे.

यूपी से सुदूर बिहार के कोसी में तरबूज के खेती करने के लिए आने के सवाल पर किसान कहते हैं कि इससे पूर्व वो यहाँ साइकिल पर कपड़े लादकर घूम-घूम कर कपड़ा बेचा करते थे. इसी दौरान इन्हें इस बालू के टीले को देख यूपी में बलुआही जमीन पर तरबूज की खेती की याद आई. फिर फेरीवालों ने प्रयोग के तौर पर यहाँ कुछ जगहों पर तरबूज लगाया. जिसका बहुत अच्छा परिणाम देखने को मिला. फिर ये लोग अपने गाँव से और भी लोगों को यहाँ बुलाकार ले आये और बड़े पैमाने पर इसकी खेती करने लगे.

यूपी के किसानों को किराये पर जमीन देने वाले मालिक बीएन सहनी बताते हैं कि सोमवार को ही किसान सब अपना बिस्तर आदि यहाँ पहुंचा दिये हैं. उन लोगों को लाखों का घाटा हुआ है तो सरकार तो कुछ नहीं की है, लेकिन हमलोग उनको जमीन में रियायत देंगे. उन लोगों के लाभ के हिसाब से ही पैसा लेंगे. किसी से भी पहले से तय कीमत नहीं लेंगे.

जमीन मालिक बी एन सहनी बताते हैं कि केवल सहरसा के नवहट्टा की अगर बात करें तो सभी किसानों को करीब पचास लाख का घाटा हुआ है. सभी यूपी के बागपत, सहारनपुर आदि से ब्याज पर पैसे लेकर यहाँ खेती करने आये थे. हालांकि बीएन सहनी कहते हैं कि उन लोगों के साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है. वो लोग जब तक चाहें यहाँ रह सकते हैं. हमलोग उनको सहयोग करेंगे. जमीन का किराये पर भी अधिकतम छुट की बात को लेकर वो सबके साथ बैठक की बात करते हैं.

यूपी से आये ये किसान कोसी बाँध पर खेती कर रहे है. ये जमीन बालू का टीला है. चूँकि यहाँ हर वर्ष बाढ़ आती है और बालू छोड़ जाती है. सरकार इसका कुछ नहीं कर पाती है. 2008 में आये कुसहा त्रासदी के बाद इस क्षेत्र के लोगों के लिए सरकार कुछ बेहतर नहीं कर पाई. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही दावा किया था कि बाढ़ के बाद बेहतर कोसी का निर्माण किया जायेगा. लेकिन अब तक स्थिति नही बदली. सरकार कोसी नदी के गाद को साफ नहीं करा पाई. जिससे हर वर्ष किसानों के खेत में बालू का टीला बन जाता है. लेकिन उसी बालू के टीले पर जब किसानों द्वारा सोना उगाया गया तो उसे भी आज रोना पड़ रहा है. सरकार द्वारा इन्हें किसी भी तरीके का सहयोग नहीं मिल पाया. लॉकडाउन में खेतों तक गाड़ी नहीं पहुँच पाई जिससे इनके तरबूज बाहर नहीं जा सके. कुछ गाड़ी वाले आना भी चाहे तो पुलिस उन्हें परेशान करती रही.

दूसरे राज्य से किसान आकर बिहार की बंजर भूमि पर इतनी अच्छी खेती कर ले रहे हैं तो निश्चित ही सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए. सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन अगर इस लॉकडाउन में इन किसानों पर थोड़ा भी ध्यान दिया होता तो किसानों को आज इस हाल में नहीं आना पड़ता. यूपी के किसानों द्वरा जो तरबूज रूपी सोना बंजर भूमि पर उगाया गया है, निश्चित ही ऐसे कार्यों के लिए सरकार को इन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है.


प्रशांत कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं

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