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कासगंज : खुदकुशी के कगार पर खड़ा परिवार और शिक्षा माफिया को बचाती सरकार

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एक व्यक्ति अपने बच्चों की फीस स्कूल में समय से जमा नहीं करवा सका। स्कूल निजी था। उसने बच्चों का उत्पीड़न शुरू किया। बच्चों में शार्मिंदगी और हीन भावना पनपने लगी। फिर यह हालात हो गये कि बच्चों को धमकाया जाने लगा। आखिरी मौके पर दसवीं में पढ़ रहे लड़के और उससे छोटी लड़की को परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया। आजिज़ आकर पिता ने गुहार लगायी − थाने से लेकर मुख्यमंत्री तक सब जगह। तब बच्चों के पिता को जान से मारने की धमकी दी गयी। महीनों तक लगातार बच्चों के माता−पिता के दर्जन भर आवेदनों और आखिरकार खुदकुशी की धमकी के बाद ठीक चार दिन पहले यूपी सरकार का जवाब आया है, जिसने परिवार के लिए खुदकुशी का रास्ता आसान कर दिया है।

सुनील गुप्ता, कासगंज

सुनने में यह कहानी बहुत आम और महत्वहीन जान पड़ती है, लेकिन इस एक मामले ने निजी शिक्षा माफिया और सरकारी अमले के बीच गठजोड़ को खाेल कर सामने रख दियाहै।

कहानी उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के एक आम आदमी सुनील गुप्ता और उनके परिवार की है। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब है। पत्नी सिलायी कढ़ायी और ट्यूशन कर के किसी तरह दो बच्चों का भारण−पोषण करती हैं। इनके बच्चे एक स्थानीय निजी स्कूल जेपी अकेडमी में पढ़ते हैं। समय से फीस भर पाने में असमर्थ इस परिवार को स्कूल प्रबंधन की ओर से इतना प्रताड़ित किया गया कि सुनील गुप्ता ने अपने फेसबुक पर आत्मदाह की बात कह डाली।

पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक, बाल संरक्षण आयोग से लेकर बेसिक शिक्षा अधिकारी तक, एक भी चौखट नहीं बची जहां सुनील गुप्ता ने माथा नहीं पटका। नीचे दिए गए पत्र गुप्ता परिवार के संघर्ष की कहानी कहते हैं।

तीन महीने तक शासन में पत्राचारों का सिलसिला चला।

इन पत्रों के अधार पर स्थानीय अखबारों में खबर भी चली, लेकिन मीडियाबाजी का स्कूल प्रबंधान की सेहत पर असर नहीं पड़ा। इस खेल में कुछ पत्रकारों ने पैसे भी बनाए, गुप्ता आरोप लगाते हैं।

कासगंज से राजधानी तक इतनी कवायदों के बाद भी एक निजी स्कूल की मनमानी और धमकी पर पूरा शासन मिलकर एक भी कार्रवायी नहीं कर पाया। किसी ने भी गुप्ता की धमकी को गंभीरता से नहीं लिया कि कार्रवायी न होने पर वे अपनी जान दे देंगे।

JP Academy

आखिरकार 23 सितंबर को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से शिक्षा निदेशक (बेसिक), उत्तर प्रदेश को पत्र गया जिसमें स्कूल प्रबंधन के “स्ववित्तपोषित”” होने का हवाला देते हुए एक तरीके से उसका पक्ष लिया गया और बताया गया कि गुप्ता को सलाह दी गयी है कि वे अपने बच्चों को सरकारी अथवा सहायता प्राप्त स्कूल में पढ़ावें।

इस पूरे पत्र में कहीं भी शिक्षा के अधिकार कानून का कहीं जिक्र नहीं था, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए कोटा का प्रावधान है। उलटे पत्र में यह बताया गया है कि सुनील गुप्ता ने शासन की सलाह को “खारिज” कर दिया है।

गुप्ता से मीडियाविजिल ने इस पत्र के आने के अगले दिन 24 सितंबर को फोन पर बात की थी। मीडियाविजिल के पास उनके ताज़ा बयानों का वीडियो मौजूद है जिसे एक स्थानीय पत्रकार ने मुहैया कराया है। ताज़ा वीडियो में भी वे इस बात पर अड़े हुए हैं कि सरकार ने अगर कार्रवायी नहीं की तो वे आत्महत्या कर लेंगे।

अब, जबकि उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री शिकायत पोर्टल की धज्जियाँ खुद सरकारी अधिकारियों ने उड़ा दी हैं, पुलिस ने 6 माह की फीस बकाया दिखाकर शिकायत निस्तारण कर दिया है और बेसिक शिक्षा अधिकारी ने दो वर्ष की फीस बकाया दिखाकर शिकायत का निपटारा करने को शासन से अनुरोध किया है, तो गुप्ता के पास कुछ खास बचा नहीं है। वे कहां जाएं और किससे गुहार लगाएं, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

सवाल यह है कि सुनील गुप्ता को अपने दो बच्चों की जिंदगी में जो अंधेरा आगे दिखा रहा है, वह एक निजी स्कूल का पैदा किया हुआ है या सूबे की सरकार और उसके अफ़सरों का? इस सवाल का जवाब चाहे जब मिले, गुप्ता और उनके बच्चों की जिंदगी को बचा लेना फिलहाल सबसे अहम काम है।

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