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कार्यपरिषद ने नकारा इलाहाबाद वि.वि. का नाम प्रयागराज वि.वि. किये जाने का प्रस्ताव

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ.शैलेंद्र कुमार मिश्र के मुताबिक कार्यपरिषद के 15 में से 12 सदस्यों ने राय ज़ाहिर कर दी है और सभी ने नाम नहीं बदलने की संस्तुति की है। यानी कार्यपरिषद चाहती है कि विश्वविद्यालय का नाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय ही रहे। परिषद की इस संस्तुति से सरकार को अवगत करा दिया गया है।

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इलाहाबाद में हमेशा प्रयागराज था लेकिन मौजूदा निज़ाम चाहता है कि प्रयागराज में इलाहाबाद की स्मृति भी न रहे। यही वजह है कि इलहाबाद विश्वविद्यालय का नाम प्रयागराज विश्वविद्यालय करने के सरकारी स्तर पर प्रयास हो रहे थे। हालाँकि ताज़ा ख़बर ये है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने नाम बदलने का विरोध कर दिया है। देखना है कि सरकार विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का सम्मान करती है, या फिर कोई चोर दरवाज़ा निकालकर इलाहाबाद को विश्वविद्यालय से निकाल बाहर करने की कोशिश जारी रखती है।

यूपी की योगी सरकार ने 2019 के कुंभ के पहले इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया था। प्रयागराज नामकरण करने के साथ ही इलाहाबाद की स्मृति पर मिट्टी डालने का प्रयास तेज़ हो गया। हाईकोर्ट पर तो हिम्मत नहीं पड़ी, पर विश्वविद्यालय पर नज़र गड़ गयी। बीजेपी नेताओं और सांसदों, विधायकों की ओर से यह माँग उठने लगी। बताते हैं कि कुछ महीने पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय, यूपी सरकार और मंडलायुक्त आशीष गोयल की ओर से विश्वविद्यालय को पत्र भेजकर नाम बदलने के संबंध में कार्यपरिषद की राय माँगी गयी थी। विश्वविद्यालय के लिहाज़ से कार्यपरिषद सर्वोच्च संस्था है जो नीतिगत फ़ैसले लेती है। कार्यपरिषद के सदस्यों को इस बीच रिमांइंडर भेजकर कहा गया कि 11 मई तक हर हाल में अपनी राय दे दें।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ.शैलेंद्र कुमार मिश्र के मुताबिक कार्यपरिषद के 15 में से 12 सदस्यों ने राय ज़ाहिर कर दी है और सभी ने नाम नहीं बदलने की संस्तुति की है। यानी कार्यपरिषद चाहती है कि विश्वविद्यालय का नाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय ही रहे। परिषद की इस संस्तुति से सरकार को अवगत करा दिया गया है।

कार्यपरिषद के सदस्यों के इस फ़ैसले से ज़्यादातर पूर्व छात्रों के बीच ख़ुशी की लहर है। ख़ासतौर पर उनमें जो काफ़ी दिनों से नाम न बदले जाने के पक्ष में मुहिम चला रहे थे। कई नागरिक संगठनों की भी यही माँग थी। दरअसल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पूरी दुनिया में पहचान है। नाम बदलते ही  वैश्विक अकादमिक जगत में इस शहर को लेकर अजनबियत छाने का डर है। साथ ही अपनी सांस्कृतिक ऐतिहासिक विरासत से कटने के ख़तरा भी है।

1887 में स्थापित इलाहाबाद विश्वविद्यालय, कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास के बाद स्थापित किया गया देश चौथा विश्वविद्यालय था। शुरुआत 1876 में स्थापित कॉलेज के रूप में हुई थी जिसे तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर विलियम म्योर के नाम पर रखा गया था। यहाँ पढ़ाने वाले शिक्षकों की अंतरराष्ट्रीय ख़्याति थी और इसे पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था। 2005 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। विश्वविद्यालय का ध्येयवाक्य है- “Quot Rami Tot Arbores”. लैटिन के इस वाक्य का अर्थ है जितनी शााखाएँ, उतने पेड़। यह माना जाता है कि यहाँ के छात्र वो शाखाएँ हैं जो जीवन के जिस क्षेत्र में जाते हैं, स्वयं एक वृक्ष बन जाते हैं।

वैसे, इलाहाबाद में हमेशा से प्रयागराज मौजूद था। दोनों में कोई अंतर्विरोध जनता नहीं देखती थी। प्रयाग और प्रयागराज नाम के बाक़ायदा रेलवे स्टेशन भी थे। लेकिन नये निज़ाम को यह संगमी संस्कृति रास नहीं आ रही थी। उसके मुताबिक मुग़ल बादशाह अकबर ने प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान नष्ट करने के इसे इलाहाबाद नाम दिया था। हालांकि पुराणों में इस बात का उल्लेख भी है कि बुध और इला के पुत्र राजा पुरुरवा ने इपनी माता इला के नाम पर इस नगर का नाम इलावास किया था। प्रतिष्ठानपुर, जिसे अब झूंसी के नाम से जाना जाता है, पुरुरवा की राजधानी थी।

 


 

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