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रेगिस्तान की बेसहारा संताने: “हमारे साथ अन्याय क्यों? न राशन मिला, न कोई सहायता !”

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इतिहास की शुरूआत से ही कुछ समुदाय परंपरागत चिकित्सा पद्धति से बीमारियों का इलाज करते आ रहे हैं. इनमें आदिवासी गोंड, भील, मोरिया तथा कुछ घुमंतु समुदाय जैसे सिंगिवाल, कंजर, कालबेलिया और घागरा जाति प्रमुख हैं. ये लोग साल भर घुमते रहते हैं. साल के दो महीना जनवरी-फरवरी में ये घूमना कम करते हैं. किंतु इस वर्ष तो ये भी यहां अटक गये हैं.

जयपुर के बस्सी क्षेत्र में घुमन्तू समाजों के कुछ तम्बू लगे हुए हैं. ये सभी लोग जड़ी बूटियों का काम करते हैं. एक तम्बू के बाहर कुछ लोग जमा हैं. दूर मिट्टी की दीवार का सहारा लिए एक व्यक्ति बैठा है, जिसकी उम्र करीब सतर वर्ष है. सभी लोग इसकी बातें बड़े गौर से समझ रहे हैं और अपने दिमाग में बिठा रहे हैं.

इस व्यक्ति का नाम प्रकाश है जो सिंगीवाल समाज से सम्बंधित है. प्रकाश सिंगीवाल समाज के मुखिया के साथ-साथ ज्ञान का पिटारा हैं. समाज के नए बच्चों के लिए अनुभव. समाज के सभी लोग उनके अनुभव और बुद्धि का फायदा उठाते हैं.

प्रकाश सभी बच्चों को लेकर हर वर्ष की तरह इस बार भी हिमालय की यात्रा करेंगे. यात्रा से पूर्व नए बच्चों को टोले के कुछ कायदे सिखा रहे हैं. जड़ी बूटी लाने के नियम बता रहे हैं. प्रकाश कह रहे हैं कि शाम होने के बाद कोई जड़ी बूटी को हाथ नहीं लगाएगा. जड़ी खोजने के लिए हाथों के अलावा किसी सामान का उपयोग नहीं करेगा. जड़ी बूटी के अलावा अन्य पेड़-पौधों झाड़ियों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा. शोर नहीं करेगा. जड़ी-बूटियों को सभी में साझा किया जाएगा.

आज सभी के तम्बू में लापसी बनी है. लापसी एक तरह का बिना घी का हलवा होता है. इस लापसी का भोग लगेगा. इसके बाद सभी लोग जड़ी-बूटी बीनने निकलेंगे. छोटे बच्चों का ध्यान लापसी पर लगा हुआ है. कभी कभार जो मिलती है.

प्रकाश से बात करने पर वे नाराज हो जाते हैं. वे कहते हैं कि सरकारों के लिए और आप लोगों के लिए ये झाड़-बोझड़ी है, किन्तु हमारे लिये ये सब कुछ है.

लॉकडाउन को लेकर वो बिखर पड़ते हैं. हमसे क्या डर हैं. जब किसान अपनी फसल निकाल रहा है. आदिवासी अपना तेंदू पत्ता एकत्रित कर रहा है. फिर हमसे क्या डर है. हम भी अपना काम कर लेंगे. हम पढ़े-लिखे नहीं है. सरकार नित नए नियम कानून लगाती है. हम तो हमारे बड़े बुजुर्गों का काम धंधा कर रहे हैं. यह काम हम कई जन्म से, कई सदियों से करते आ रहे हैं, उन्हीं से सीखा है.

प्रकाश कहते हैं कि हमारे पास पैसा तो है नहीं, यह जंगल ही है. हमारे पुरखे भी यही कर रहे थे, हम भी यही कर रहे हैं. एक दिन इसी जंगल में समा जाएंगे. हमें तो जंगल में जाने से रोक रहे हैं और जंगल में बड़ी-बड़ी गाड़ियां आती हैं, उनको कोई नहीं रोकता. वे एक दिन इस जंगल को खाली कर देंगे. यहां कितने ही सियार, भालू, लोमड़ी, लकड़बग्घे थे. धीरे-धीरे सब कम होते जा रहे हैं.

सेमर के फूल, पलाश के फूल, कचनार और धांय के फूल, मिलोडो, हिंगोट इत्यादि जब लायेंगे तो साल भर क्या करेंगे? कुदरत का समझाने का अपना तरीका है बाबूजी. इंसान गुनाह करके उसके ऊपर पर्दा डालता है. लेकिन कुदरत उस पर्दे को हटा देना चाहती है. यह बीमारी भी वैसी ही है.

बगल के एक तम्बू में पप्पू सिंह गोंड चितोड़िया अपना झोला लेकर बैठे हैं. उनके पास तमाम तरह की जड़ी-बूटियां हैं. भांति भांति के तेल और इत्र हैं. पप्पू सिंह का समाज चितौड़गढ़ से सम्बंधित रहा है. वे सदियों से यही कर रहे हैं.

पप्पू सिंह कहते हैं कि परम्परा को हम ढोए जा रहें हैं और हमारी पूछ धेले भर की भी नहीं है. ये झोला हमारी जीवन भर की जमा पूंजी है. यदि जड़ी लाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या? इस मौसम में जड़ी लाते थे. अब तो भगवान ही मालिक है. न जाने क्या होगा?

कालबेलिया को कई नामों से जाना जाता है. कहीं पर इन्हें बांसफोड़, कहीं पर सपेरा, कहीं जोगी कहा जाता है. बांसफोड़ उन कालबेलिया को कहा जाता है जो बांस का काम करते हैं. जोगी उन कालबेलिया को कहा जाता है जो सुबह आटा मांग कर लाते हैं. जिनके पास सिंधी सारंगी होती है. सांप रखने के कारण इनको सपेरा भी कहा जाता है.

बांसफोड़ बांस के शिल्पी हैं. जो बांस के विभिन्न उत्पाद तैयार करते हैं. जैसे बांस की टोकरी, बांस का डलिया, बांस की खींची, बांस का साजला, बांस की मुट्ठी, बांस की झाड़ू. कुछ बांसफोड़ बांस की झोंपड़ी भी बनाते हैं, बांसफोड़ उत्तर भारत में सभी जगहों पर देखने को मिलते हैं.

राजस्थान में जालौर, पाली, सिरोही तथा बांसवाड़ा जिले में ये लोग अधिक संख्या में रहते हैं. ये बांस के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं. यह काम ये सदियों से करते आ रहे हैं. नजदीक के बाजार से बांस लेकर आते हैं और उनसे उत्पाद तैयार करते हैं फिर उन्हें गांवों में बेचने जाते हैं.

लॉकडाउन होने से इनकी आजीविका छिन गई है. किसी तरह की राशन सामग्री की कोई पहुंच नहीं है. जालौर में रहने वाले जबराराम बांसफोड़ का परिवार भी इसी कठिनाई के दौर से गुजर रहा है.

अभी लॉकडाउन की वजह से सब कुछ बंद है. फिर बारिश शुरू होने से बांस नहीं मिलेगा. बारिश में 4 महीने बांस का काम बंद रहता है. उस दौरान वे दिहाड़ी मजदूरी करते हैं या आटा मांगकर जीते हैं.

जबराराम का कहना है कि हम भी इसी धरती के रहने वाले हैं. हमारे साथ इतना अन्याय क्यों? ना कोई राशन मिला ना कोई अन्य सहायता मिली. पिछले 15 दिन से उधार मांग-मांग कर काम चला रहे हैं.

सरकार कह रही है कि 181 पर फ़ोन करो. राशन की सहयता मिलेगी. फ़ोन करवाया तो कोई फ़ोन ही नहीं उठाता. उनकी बात की सत्यता को जांचने के लिए 181 पर फ़ोन किया तो उनकी बात एक दम सही निकली. काफी समय तक फोन नहीं उठाया गया. फिर हमने फोन बंद कर दिया.

जालौर जिला मुख्यालय को भी इसकी सूचना दी गई किन्तु 7 दिन बीतने के बाद भी उन तक कोई सहायता नहीं पहुंची.


लेखक बंजारों के जीवन पर शोध कर रहे हैं।

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