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नई शिक्षा नीति वंचित समुदायों को बहिष्कृत करने की नीति- आइसा

"नई शिक्षा नीति समाज में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों को बहिष्कृत करने की नीति है। इसका केवल एक ही प्रयोजन है और वह है निजी संस्थानों को बढ़ावा देना। इस नीति द्वारा सरकार अपने इस मंसूबे को स्कूल तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी तथा सार्वजनिक-परोपकार की साझेदारी का चोगा ओढ़ा रही है। एनईपी निजी कंपनियों और सरकार को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराती है।  देश में लंबे समय से छात्र आंदोलनों की निजी शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाइयों की नीतियों को लागू करने की मांग के बावजूद एनईपी में इसका जिक्र तक नहीं है।"

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मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति पर आइसा का बयान

मोदी कैबिनेट द्वारा नई शिक्षा नीति को पारित कर दिया गया है। जहां एक ओर सरकार का कहना है की नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को आसान बनाना है, वहीं अगर नई शिक्षा नीति का गहराई से अध्ययन किया जाए तो इस नीति का उद्देश्य सरकार के दावों के ठीक विपरीत दिखाई देता है। नई शिक्षा नीति समाज में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों को बहिष्कृत करने की नीति है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का आधार प्रधानमंत्री का इस साल का सबसे मशहूर जुमला ‘आत्मनिर्भर’ है। नई शिक्षा नीति के उद्देश्य एवं सिद्धांत अधिकार आधारित दृष्टिकोण की बजाए कर्तव्य आधारित दृष्टिकोण की तस्वीर पेश करते हैं। अर्थात सरकार अपने शिक्षा सुनिश्चित करने के दायित्व से पीछे हटकर यह कार्य प्राइवेट सेक्टर को सौंप रही है साथ ही निजी क्षेत्रों को विचारों को नियंत्रित करने का अधिकार दे रही है।

उच्च शिक्षा में मल्टीपल एग्जिट प्वाइंट (अर्थात 4 साल के ग्रेजुएशन को पहले, दूसरे अथवा तीसरे वर्ष में भी छोड़ देने पर सर्टिफिकेट) एडवांस सर्टिफिकेट इत्यादि के प्रबंध को नई शिक्षा नीति का आकर्षण बिंदु बनाकर इस नीति को एक बड़े सकारात्मक बदलाव के रूप में पेश किया जा रहा है, किंतु वास्तविकता तो यह है कि इस तरह का प्रावधान अंततः असमानता को ही बढ़ावा देगा। इस तरह की नीति गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को और अधिक हाशिए पर ढकेलेगी तथा शिक्षा का अधिकार एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा। यह नीति अकादमिक एकरूपता के जरिये से विचारों को नियंत्रित करने की भी कोशिश है। तदनुसार आम परीक्षाओं एवं प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण है किंतु निजी एवं सार्वजनिक संस्थानों को लोगों का शोषण करने की पूर्ण वित्तीय स्वतंत्रता है।

नई शिक्षा नीति का केवल एक ही प्रयोजन है और वह है निजी संस्थानों को बढ़ावा देना। इस नीति द्वारा सरकार अपने इस मंसूबे को स्कूल तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी तथा सार्वजनिक-परोपकार की साझेदारी का चोगा ओढ़ा रही है। एनईपी निजी कंपनियों और सरकार को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराती है।  देश में लंबे समय से छात्र आंदोलनों की निजी शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाइयों की नीतियों को लागू करने की मांग के बावजूद एनईपी में इसका जिक्र तक नहीं है।

एनईपी संविधान के संघीय ढांचे पर भी हमला है। शिक्षा समवर्ती सूची में है तथा परामर्श और समन्वय की मांग करता है, एकरूपता का नहीं। इसी तरह, नीति का प्रारूप ऑनलाइन शिक्षा और शिक्षण में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने की बात करता है, लेकिन छात्रों के लिए इस प्रौद्योगिकी की पहुंच और सामर्थ्य का विस्तार कैसे होगा यह सुनिश्चित करने में विफल है ।

एनईपी स्पष्ट रूप से सरकार द्वारा यह दावा करने कि शिक्षा पर खर्च में वृद्धि होगी इस विषय पर चर्चा नहीं करती कि यह होगा कैसे। निवेश और व्यय का बोझ ‘निजी परोपकार’ साझेदारी के माध्यम से निजी कंपनियों और व्यक्तियों पर है, जो स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों के कॉर्पोरेट अधिग्रहण के लिए एक चोगा मात्र है ।

सरकार स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों स्तर पर स्व-नियमन को बढ़ावा देकर शिक्षा क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी त्याग कर निजी कंपनियों को बढ़ावा दे रही है। एनईपी बड़े स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पक्ष में छोटे स्कूलों और कॉलेजों को बंद करना प्रस्तावित करता है, जो सार्वजनिक वित्त पोषित शिक्षा को नष्ट करने के अलावा कुछ भी नहीं है ।

स्कूल शिक्षा:

एनईपी स्कूल शिक्षा में मौजूदा 10 + 2 संरचना को ‘एक नए शैक्षणिक और पाठयक्रम पुनर्गठन’ के साथ 5+ 3+3+4  में बदलने का प्रस्ताव रखता है और इस संरचना में 3 से 18 वर्ष के छात्र-छात्राएं सम्मिलित होंगे। एनईपी का तर्क है कि वर्तमान 10+2 संरचना 3-6 आयु वर्ग के बच्चों पर ध्यान नहीं देती है क्योंकि औपचारिक शिक्षा कक्षा 1 में शुरू होती है और वह 6 साल की उम्र में शुरू होती है। इसलिए नई 5+3+3+4 संरचना, 3 साल की उम्र से अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन (ईसीसीई) प्रदान करेगी।

ईसीसीई की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी केंद्रों की है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं/शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा, खेलने के उपकरण और अच्छे बुनियादी ढांचे की व्यवस्था की जाएगी। यहां तक कहा गया है कि 10+2 और उससे अधिक की योग्यता वाले आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं/शिक्षकों को ईसीसीई में 6 महीने का प्रमाण पत्र कार्यक्रम दिया जाएगा; और कम शैक्षिक योग्यता वाले लोगों को एक वर्ष का डिप्लोमा कार्यक्रम दिया जाएगा। बच्चों के लिए शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए डीटीएच चैनलों का इस्तेमाल और डिजिटल/दूरी के लिए स्मार्टफोन  का इस्तेमाल प्रस्तावित किया गया है।

हालांकि, दस्तावेज अनुबंध, मानदेय आधारित कार्य के बजाय स्थायी नौकरी की गारंटी देने में विफल हैl स्थायी नौकरी तो दूर की बात है, न्यूनतम वेतन की गारंटी भी नहीं है। डिजिटल डिवाइड के सवाल पर यह दस्तावेज यह नहीं बोलता कि इससे उन लोगों तक डिजिटल पहुंच कैसे बढ़ेगी, जिनके पास टीवी, बिजली, इंटरनेट, स्मार्ट फोन या गैजेट्स तक नहीं है। इंटरनेट की पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर केवल 40% है और ग्रामीण क्षेत्र और भी हाशिए पर हैं।

एनईपी का तर्क है “प्रशिक्षित सहायककर्मी (स्थानीय समुदाय से व उसके बाहर दोनों)”, उसके अतिरिक्त सहायता सत्र, कैरियर मार्गदर्शन से संबंधित मुद्दों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की देखरेख और सुरक्षा पहलुओं को देखते हुए  “एक पर एक सहकर्मी ट्यूशन”  की व्यवस्था की जाए। साफ तौर पर सरकार सार्वजनिक शिक्षा में गुणवत्ता और सस्ती शिक्षा प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी से दूर रहना चाहती हैl

सरकार की जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश:

नई शिक्षा नीति निजीकरण शब्द के इस्तेमाल से बचते हुए सरकार द्वारा शिक्षा से जुड़ी हुई अपनी सभी जिम्मेदारियों को त्याग कर निजी संस्थानों को जनता का आर्थिक शोषण करने की सुविधा उपलब्ध कराने का नाम है। यह नीति निजीकरण को सार्वजनिक-परोपकार साझेदारी का नाम देकर शिक्षा जैसी मूलभूत जिम्मेदारी से सरकार का पल्ला झाड़ लेना है।

अन्य भाषाओं पर संस्कृत का वर्चस्व:

अन्य भाषाओं को नजरअंदाज करते हुए संस्कृत संवर्धन पर अत्यधिक जोर देना मोदी सरकार की संस्कृत के वर्चस्व को स्थापित करने की मंशा को स्पष्ट करता है। दस्तावेज में अन्य भाषाओं की बात जरूर की गई है किंतु संस्कृत पर दिया गया अत्यधिक जोर सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। इसी प्रकार भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणाली और प्रथाओं पर सरकार का अत्यधिक ध्यान बाद में देश के विभिन्न चरणों में विकसित अन्य प्रथाओं को नजरअंदाज और अस्वीकार करने का प्रयास जैसा लगता है। “जहां भी संभव हो, कम से कम ग्रेड 5 तक लेकिन अधिमानतः ग्रेड 8 और उससे आगे तक अनुदेश का माध्यम घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा होगीl” यह शिक्षा के माध्यम में एक व्यवस्थित परिवर्तन है और शिक्षकों की उपलब्धता, शिक्षा सामग्री की गुणवत्ता और यह भी कि इसे कैसे लागू किया जाएगा, पर सवाल उठते हैं। सार्वजनिक तथा निजी दोनों संस्थानों में इस प्रकार मातृभाषा को अनिवार्य बनाना  विद्यार्थियों को उस भाषा में शिक्षण लेने से वंचित करता है जिसमें वे शिक्षित होना चाहते हैं।

सरकारी स्कूलों को बंद करना:

एनईपी 2020 स्कूल कॉम्प्लेक्स नामक समूह संरचना के नाम पर सरकारी स्कूलों को “सुनियोजित ढंग से” बंद करने को बढ़ावा देता है। जिसमें स्कूलों में कम नामांकन अनुपात स्कूल बंद होने का कारण दिखाया जा रहा है। सरकारी स्कूलों में कम नामांकन अनुपात का कारण वास्तव में सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता की कीमत पर निजी स्कूलों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना और स्कूली शिक्षा से संबंधित शिक्षण, अधिगम और बुनियादी ढांचे के मुद्दों में सार्वजनिक निवेश की कमी है। त्रुटिपूर्ण नीति को ठीक करने के बजाय एनईपी 2020 सरकारी स्कूलों को बंद करने को बढ़ावा देता है।

निजी स्कूलों को आर्थिक शोषण की खुली छूट:

एनईपी ने आवश्यक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रीस्कूल एजुकेशन-निजी, सार्वजनिक और परोपकारी सहित शिक्षा के सभी संस्थानों के लिए स्व-नियमन या प्रत्यायन प्रणाली का प्रस्ताव दिया है। राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए) नामक एक स्वतंत्र, राज्यव्यापी निकाय की स्थापना की जाएगी। यह और कुछ नहीं बल्कि सरकार द्वारा गुणवत्ता सुनिश्चित करने  की जिम्मेदारी निजी कंपनियों पर छोड़ने के लिए एक आवरण है जैसा कि सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी किया गया है।

उच्च शिक्षा:

समरूपता और अकादमिक स्वतंत्रता का केंद्रीकरण:

सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और संस्थानों के लिए राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा परीक्षाओं के संचालन का केंद्रीकरण हालांकि आदर्श लगता है, लेकिन वास्तव में यह कॉलेजों/विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता से वंचित करता है। फिलहाल, एनईपी बोझ को कम करने की बात करता है किंतु NEET तथा अन्य अखिल भारतीय परीक्षाओं का NTA अथवा अन्य एजेंसियों द्वारा केंद्रीकृत आयोजन नई समस्याओं को जन्म देगा।

सार्वजनिक वित्त पोषित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को बंद करना:

स्कूल शिक्षा की तरह ही एनईपी में 3000 या उससे अधिक छात्रों के बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और एचईआई क्लस्टर/नॉलेज हब का गठन प्रस्तावित करती है। इसका स्पष्ट अर्थ है- बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों के पक्ष में छोटे या मध्यम सरकारी वित्त पोषित विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों या संस्थानों को बंद करना। सबसे नृशंस रूप से, यह दस्तावेज नालंदा और तक्षशिला के संदर्भ का उपयोग बड़े विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए कॉलेजों को बंद करने के अपने बुरे इरादों वाले तर्क को न्यायोचित ठहराने के लिए करता है।

पुनर्गठन के नाम पर सार्वजनिक वित्तपोषण का निजीकरण अथवा समापन:

ये उच्च शिक्षा संस्थान (एचईआई) भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) द्वारा शासित होंगे। एचईसीआई के तहत एचईआई के प्रत्येक मुद्दे से संबंधित विभिन्न इकाइयां होंगी जो संरचना का हिस्सा होंगी। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी) शिक्षक, शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए एकल बिंदु नियामक होगा। केवल चिकित्सा और कानूनी शिक्षा इसके अंतर्गत नहीं होंगे। दूसरी संस्था ‘Meta-Accrediting Body’ (जिसे मान्यता के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी) कहा जाता है) होगी। तीसरा उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी) होगा, जो फंडिंग नियमित करेगा। चौथी संस्था होगी जनरल एजुकेशन काउंसिल जोकि अकादमिक स्तर को बेहतर बनाने का कार्य करेगी। इसका तकनीकी रूप से अर्थ है यूजीसी और अन्य मौजूदा निकायों को खत्म किया जाएगा।

इन एचईआई की अध्यक्षता बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (बीओजी) करेंगे। बीओजी के पास फीस पर फैसला करने, एचईआई के प्रमुख सहित नियुक्तियां करने और शासन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होगा। शासन का यह मॉडल स्वायत्तता और अकादमिक उत्कृष्टता को केंद्रीकृत और नष्ट कर देगा।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जैसी विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा अनुसंधान के वित्तपोषण के समन्वय के लिए एक राष्ट्रीय अनुसंधान कोष की स्थापना की जाएगी। यह समन्वय स्वायत्त वित्तपोषण व्यवस्था को नियंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं है।

एनईपी में यह भी कहा गया है कि निजी और सार्वजनिक संस्थानों के बीच कोई अंतर नहीं होगा, जो सार्वजनिक संस्थानों के वित्तपोषण से सरकार के पीछे हटने का संकेत देता है। इस बीच, एक स्वायत्त डिग्री देने वाले कॉलेज (एसी) उच्च शिक्षा के एक बड़े बहुविषयक संस्थान का गठन होगा जो स्नातक की डिग्री प्रदान करेगा और मुख्य रूप से स्नातक शिक्षण पर केंद्रित होगा, हालांकि यह उस तक सीमित नहीं रखा जाएगा और यह आम तौर पर एक आम विश्वविद्यालय से छोटा होगा।

शिक्षा के भीतर सामाजिक भेदभाव का कोई संज्ञान नहीं, सामाजिक न्याय के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं:

यह वही भाजपा की सरकार है जिस के शासन में पूरे देश ने रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के विरोध में एक व्यापक आंदोलन देखा। रोहित के लिए न्याय की मांग करते हुए इस आंदोलन में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हाशिए के समाज से आने वाले विद्यार्थियों के प्रति होने वाले भेदभाव तथा उत्पीड़न की ओर सभी का ध्यान केंद्रित किया गया। और आज यही भाजपा की सरकार नई शिक्षा नीति पारित कर रही है जिसमें शैक्षिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव एवं उत्पीड़न के विषय में कोई बात नहीं की गई है। नई शिक्षा नीति संस्थागत उत्पीड़न एवं भेदभाव को वंचित एवं हाशियाकृत विद्यार्थियों की समस्या की तरह देखती है और सरकार को संस्थानों में समता एवं न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से दूर रखती है।

वर्गीकृत असमानता और बच्चों को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर करना:

एनईपी से 4 वर्षीय बहुविषयक बैचलर कार्यक्रम एक आपदा होगा जैसा कि हमने दिल्ली विश्वविद्यालय में FYUP प्रणाली के साथ देखा है। जिसका न केवल छात्रों और शिक्षकों ने विरोध किया बल्कि अंततः शिक्षा और शिक्षा देने में विफल रहने पर प्रशासन को भी इसे वापस लेना पड़ा। उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री/एग्जिट का मतलब है कि अच्छी फाइनेंशियल कंडीशन वाले स्टूडेंट्स ही अपनी डिग्री पूरी कर पाएंगे। गरीब छात्रों को डिप्लोमा से ही समझौता करना होगा। साथ ही एक साल में सर्टिफिकेट, 2 साल में डिप्लोमा, 3 साल में बैचलर मूल रूप से डिग्रियों का अवमूल्यन है, क्योंकि इन डिग्रियों को लेने के लिए मजबूर किसी को भी पढ़ाई बीच में छोड़ने वाला माना जाएगा। यदि इन पाठ्यक्रमों को अलग नहीं कर रहे हैं, और एक बड़े 4 साल मॉड्यूल का ही हिस्सा सर्टिफिकेट डिप्लोमा तथा बैचलर हैं, तो यह डिग्रियों का अवमूल्यन ही है।

निजी विश्वविद्यालयों को फण्ड एवं बढ़ावा देने वाली एक नीति:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 समय समय पर शिक्षा में निजी निवेश एवं परोपकार की ‘महत्ता’ पर बल देती है। यह न केवल निजी निवेश एवं परोपकारी उद्यमों को आमंत्रण है जिससे कि वे उच्च शिक्षा में अपने व्यापार को बढ़ा सकें, बल्कि ये ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों को सरकारी सहायता का भी वादा करती है। हम सभी जानते हैं कि ऐसे परोपकारी उच्च शिक्षा संस्थान कौन होंगे। यह उच्च शिक्षा के निजी एवं कॉरपोरेट नियंत्रण की व्यंजना ही है।

पहले तो नीति नए उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए कम नियंत्रण का वायदा करती है। जबकि एक और स्तर और मानकों के नाम पर, राष्ट्रीय शिक्षा नीति सरकारी वित्त पोषित संस्थानों को बंद करने का एक यंत्र है, वहीं दूसरी ओर यह नए विश्वविद्यालयों को खोलने में गुणवत्ता और स्तर की चिंता न करने का वायदा करता है। इससे इतर, शुल्क निर्धारण के प्रगतिशील राज को प्रोत्साहित करके यह नीति स्पष्ट तौर पर उच्च शिक्षा में शुल्क वृद्धि और बहिष्करण का सृजन कर रही है।

स्वायत्तता के नाम पर शुल्क वृद्धि और स्ववित्तपोषण को लागू करना:

महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पास श्रेणीबद्ध स्वायत्तता होगी। प्रत्यायन की श्रेणियाँ किसी संस्थान की स्वायत्तता निर्धारित करेंगी। कोई संस्थान जिसकी प्रत्यायन की श्रेणी उच्च होगी वह शुल्क वृद्धि कर सकेगा, इस प्रकार गरीबों और वंचितों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बहिष्कृत कर दिया जायेगा क्योंकि विश्वविद्यालय निश्चित तौर पर नये स्व-वित्तपोषी पाठ्यक्रम लायेंगे जिससे कि वे स्वयं ही फण्ड इकट्ठा कर सकें। यह पहले ही कुछ समय से कार्य में लाया जा चुका है, जैसे कि यूजीसी का परिसमापन और HEFA ऋणों की स्वीकृति को पहले ही मूर्त किया जा चुका है।

निजी विश्वविद्यालयों को शोषण की स्वतंत्रता:

स्वविनियमन की प्रणाली निजी विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करेगी जहाँ संस्थान को शिक्षा, सीखने, अवस्थापना, शुल्क एवं अन्य मुद्दों पर  स्व-घोषणा देनी होगी। इस प्रकार यह सरकार के नियंत्रण का अंत करेगी। यह उच्च शिक्षा में भयंकर परिणामों की ओर लेकर जाएगी जिसमें निजीउद्द्मियों को फ़ीसवृद्धि करने औऱ गरीबों एवं वंचितों के बहिष्कृत करने में कोई रोक-टोक नहीं होगी।

ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर डिजिटल डिवाइड और बहिष्करण मजबूत करना:

शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन शिक्षा शुरू करने पर जोर दिया गया है। यह और कुछ नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था से समाज के हाशिए पर स्थित समुदायों से आने वाले विद्यार्थियों को बाहर करने की नीति है। यह नीति इस बारे में बात नहीं करती है कि यह कैसे इंटरनेट पहुंच बढ़ाएगी, डिजिटल डिवाइड को कम करेगी और शिक्षा की पहुंच, और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी। इसी तरह, दूरस्थ शिक्षा पर जोर शिक्षा के विचार के खिलाफ जाता है। NEP एक स्वायत्त निकाय, नेशनल एजुकेशनल टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) बनाने की बात करती है, जो “उच्च शिक्षा, मूल्यांकन, नियोजन, प्रशासन स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों के लिए” प्रदान करेगा। हालाँकि नीति यह बात नहीं करती है कि यह डिजिटल विभाजन को कैसे समाप्त करने जा रही है। यह ऐसी शिक्षा के लिए आवश्यक डिजिटल गैजेट्स की पहुंच को कैसे बढ़ाएगी। नीति फंडिंग के विषय में कुछ स्पष्ट नहीं करती जिसका सीधा अभिप्राय यह है कि इसका भार विद्यार्थियों पर थोप दिया जाएगा और निजीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त होगाl

एमफिल को खत्म करना और एकीकृत कार्यक्रम में एमए की अवधि को कम करना केवल मोदी सरकार के शोध के प्रति समझ की कमी को दर्शाता है। एमफिल प्रशिक्षण का मैदान है और अनुसंधान की गुणवत्ता को बढ़ाने में इसका महत्व है। एमफिल को हटाकर सरकार ने भारत में रिसर्च को फंडिंग और सपोर्ट कम करने के अपने इरादे का संकेत दिया है। “शैक्षणिक मार्ग” के बारे में नई नीति का मूल रूप से मतलब है (भले ही यह बेहतर पाठ्यक्रमों को डिजाइन करने और एक बेहतर शिक्षक होने की गुंजाइश देता है) शिक्षक बुनियादी कक्षाएं ले सकते हैं और प्रशासन/शासन में पद सुनिश्चित करने की सीढ़ी पर आगे बढ़ने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। यह विश्वविद्यालय प्रणाली में शिक्षण की स्वायत्त प्रकृति को खत्म करने तथा सरकार के हुक्म के अनुसार चलने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की ओर एक कदम है।

समावेश के नाम पर यह नीति वास्तव में, बहिष्कार के लिए नीति के अलावा कुछ नहीं है। AISA इस शिक्षा विरोधी मसौदे को खारिज करता है और मांग करता है कि इसे तुरंत वापस लिया जाए और संसद में इस पर चर्चा की जाए।


(आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एन साई बालाजी और महासचिव संदीप सौरव द्वारा जारी)

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