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हामिद अंसारी ने नहीं दिया था पीटीआई को इंटरव्यू, लेकिन बीबीसी दो दिन तक यही बताता रहा !

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अरविंद दास

ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब ‘ ख़बर हमने बीबीसी पर सुनी है’- यह जुमला आए दिन सुनने को मिलता था. जैसे बीबीसी का कहा अकाट्य हो.
पिछले दो दशकों में भारत में टेलीविजन चैनलों के प्रचार-प्रसार और अखबारों की गाँव-कस्बे में पहुँच ने बीबीसी रेडियो की पहुँच को सीमित कर दिया है. अब बीबीसी रेडियो बीते जमाने की बात लगती है. बीबीसी हिंदी ने भी समय के हिसाब से अपना विस्तार ऑन लाइन की दुनिया में किया. पर ऐसा लगता है कि बीबीसी ऑनलाइन को खुद के गाइडलाइंस पर भरोसा नहीं है. साथ ही उसके लिए पाठकों की प्रतिक्रिया का भी कोई मोल नहीं.

पिछले दिनों उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने राज्यसभा टीवी के लिए करण थापर को एक इंटरव्यू दिया जिसमें अन्य बातों के अलावे उन्होंने ‘मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना’ को रेखांकित किया. इस इंटरव्यू को प्रधानमंत्री समेत, बीजेपी के नेताओं ने ‘पॉलिटिकल प्रोपगैंडा’ कह कर खारिज करने की कोशिश की. भक्तों की जमात हामिद अंसारी के कहे पर मनन करने के बजाय उनको कठघरे में खड़े कर रही है.

मैं यहाँ चर्चा बीबीसी हिंदी ऑन लाइन पर लगाई गई एक स्टोरी की कर रहा हूँ, जो इसी के इर्द-गिर्द बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव के बायलाइन से लिखी गई.

बीबीसी के मुताबिक (http://www.bbc.com/hindi/india-40889281): राज्य सभा टीवी और समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा था, “देश के मुस्लिमों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना दिखाई पड़ती है.”

सवाल है कि पीटीआई को हामिद अंसारी साहब ने कब दिया इंटरव्यू ? क्या बीबीसी के पास इसकी एक्सक्लूसिव जानकारी है ? मैंने शुक्रवार को यह सवाल बीबीसी हिंदी को टैग करते हुए फेसबुक वॉल पर पूछा था.य पर चौबीस घंटे के बाद भी मुझे जवाब नहीं मिला. यहाँ बताते चलूँ, बीबीसी हिंदी के आधे से अधिक पत्रकार-संपादक मेरे फेसबुक फ्रेंड हैं. ऐसा संभव नहीं कि ये सवाल उनकी नज़र में ना आया हो?

ऐसा लगता है कि बीबीसी के पत्रकार-संपादक ‘सराहा एप’ से खेलेने में इन दिनों काफ़ी व्यस्त हैं. एक पत्रकार मित्र ने कहा कि गलतफहमी हो गई बीबीसी से लिखने में. मेरी जानकारी में बीबीसी ख़बर लिखते वक्त ‘सोर्स’ के मामले में काफी एहतिहात बरतता रहा है.

ऐसे में सोर्स लिखने में गलती, गलतफहमी नहीं है. कम से कम बीबीसी के लिए. उम्मीद थी कि बीबीसी अपनी स्टोरी सुधार लेगा, पर बीबीसी को इसकी सुधि भी नहीं.

अब यह कहना कि ‘स्टोरी हमने बीबीसी पर पढ़ी है’ ख़तरे से खाली नहीं. पिछले दिनों पत्रकार और शोधार्थी दिलीप मंडल ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा था कि ‘इन दिनों बीबीसी पर लोग सेक्स संबंधी खबरें ही ढूढ़ने आते हैं.’ इस बात का जिक्र मैंने भी कुछ दिन पहले मीडिया विजिल के लिए लिखे एक अन्य लेख में किया था.

दिलीप मंडल पूछते हैं: क्या बीबीसी पर भी सेक्स बिकाऊ है? क्या यह बीबीसी की ब्रैंड इमेज के विपरीत बात नहीं है?’

बीबीसी ब्रैंड की चिंता हमें भले हो, ऐसा लगता वहाँ काम कर रहे पत्रकारों-संपादकों को तो कतई नहीं है.

(नोट- 10 अगस्त को प्रकाशित हुई इस ख़बर में पीटीआई के उल्लेख पर अरविंद दास द्वारा लगातार सवाल उठाने के बाद बीबीसी हिंदी ने 12 अगस्त की शाम 5 बजे के आसपास पीटीआई का ज़िक्र हटा दिया है। हाँलाकि बीबीसी की गाइ़़डलाइन में कहा गया है कि ग़लती सुधारने के क्रम में यह बताया जाना चाहिए कि ग़लती क्या हुई थी और उसमें सुधार क्या किया गया, जिसका पालन नहीं किया गया। )



लेखक पेशे से पत्रकार हैं। मीडिया पर कई शोधों में संलग्‍न रहे हैं। नब्‍बे के दशक में मीडिया पर बाज़ार के प्रभाव पर इनका शोध रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई-लिखाई। इनकी पुस्‍तक ‘हिंदी में समाचार’ काफी लोकप्रिय रही है। दो विदेशी लेखकों के साथ धर्म और मीडिया पर एक पुस्‍तक का संयुक्‍त संपादन। फिलहाल करण थापर के साथ जुड़े हैं।


 

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