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कराची से ग़ायब हुए कफ़ील पेंटर, जो दुनिया के सबसे बड़े स्पिनर थे !

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कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर
अशोक पांडेय

पाकिस्तान के सिंध प्रदेश के धुर उत्तरी इलाके में एक धूल-धक्कड़ भरा कस्बा है घोटकी तालुका. तमाम तरह के अनेक कारखानों वाले इस कस्बे ने 1980 के दशक में बड़ा नाम कमाया. किसी औद्योगिक क्रान्ति के चलते नहीं ऐसा हुआ था. दरअसल उन्हीं दिनों पाकिस्तान के कई लोगों ने गौर करना शुरू किया कि वहां चलने वाले रंग-बिरंगे ट्रकों के पीछे – कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर – लिखा दिखने लगा था. जल्द ही इस हस्ताक्षर वाले ट्रकों की तादाद इस कदर बढ़ने लगी कि जिज्ञासु लोगों ने ट्रकों के ड्राइवरों से पूछना शुरू कर दिया कि ये कफ़ील भाई हैं कौन और ये राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर है क्या बला.

मजेदार बात यह है कि बहुत से ड्राइवरों को यह बात पता तक नहीं लगी थी कि उनके ट्रकों पर कफ़ील भाई के हस्ताक्षर हैं.जब कुछ स्थानीय सिंधी अखबारों ने इस बाबत छानबीन की तो उन्होंने पाया कि कफ़ील भाई घोटकी के एक अति साधारण परिवार में जन्मे एक युवा क्रिकेटर और बेहद प्रतिभावान चित्रकार थे.1970 के दशक के अंतिम और 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में उन्हें लगता था कि वे दुनिया के इकलौते गेंदबाज़ हैं जो दाएं हाथ से घातक ऑफ स्पिन गेंदबाजी कर सकने के साथ बाएं हाथ से वैसी ही खतरनाक लेग स्पिन फेंक सकते थे. उन्होंने घोटकी की अनेक लोकल टीमों के लिए अपने नगर के धूसर मैदानों पर अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा. वे गेंदबाजी तो दोनों हाथों से कर लेते थे लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी गेंदों में ज़रा भी स्पिन पैदा नहीं होती थी और बल्लेबाज़ उनकी बढ़िया धुनाई किया करते. गेंदबाज़ का काम होता है पिच को दोष देना और कफ़ील भाई ने भी यही किया और नाराज़ होकर अपनी किस्मत चमकाने कराची चले गए.

कराची में उनकी प्रतिभा को पहचानने को एक भी क्लब सामने नहीं आया और लम्बे इंतज़ार के बाद वे हताश होकर वापस घोटकी आ गए. उनकी शिकायत रही कि पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड में उनकी प्रतिभा को समझ तक पाने की कूव्वत नहीं थी.

घोटकी में कफ़ील भाई का ज़्यादातर समय हाईवे से लगे पेट्रोल पम्पों पर गुज़रने लगा. इन पम्पों के आसपास के ढाबे और होटल कराची और पेशावर के बीच औद्योगिक माल, गन्ना और गेहूं वगैरह ढोने वाले ट्रकों के ड्राइवरों-क्लीनरों से आबाद रहा करते थे.

हालांकि जैसी कि परम्परा चल चुकी थी, इनमें से ज़्यादातर ट्रकों पर तमाम तरह के चित्र बने रहते थे. कफ़ील भाई उन ट्रकों की शिनाख्त करते जिन पर कलाकारी नहीं की गयी होती थी और उनके ड्राइवरों को फ़ोकट में उनकी गाड़ियों पर कलाकारी करने का प्रस्ताव देते थे. बदले में वे सिर्फ पेंट और ब्रशों की मांग किया करते.

ड्राइवरों को उनका काम पसंद आने लगा और कफ़ील भाई ने मैडम नूरजहां और घोड़ों से लेकर लेडी डायना तक के चित्र सिंध के ट्रकों पर उकेरना शुरू किये. चित्रों के नीचे उनके गौरवपूर्ण हस्ताक्षर होते – कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर.

1987 तक उर्दू मुख्यधारा के कुछेक अखबार वगैरह उन पर लेख छाप चुके थे और ड्राइवरों में अपनी गाड़ियों पर उनके हस्ताक्षर करवाने का क्रेज़ बन गया था. लेकिन कफ़ील भाई अपनी सेवा के बदले अब भी किसी तरह की फीस नहीं वसूलते थे. वे पेंट और ब्रश के अलावा ढाबों पर मिलने वाली एक चाय भर के बदले इस काम को किया करते. उन्होंने अपने हस्ताक्षर में अब यह भी जोड़ दिया – मशहूर-ए-ज़माना स्पिन बॉलर कफ़ील भाई का सलाम!

उनकी रोजी-रोटी कैसे चलती थी मालूम नहीं लेकिन उनके सुबह-शाम के खाने का बंदोबस्त उन ढाबों के जिम्मे था जिनके बगल में खड़े ट्रकों पर वे चित्रकारी करते थे.

1992 में उनकी ख्याति अपने चरम पर पहुँच गयी थी जब एक फ्रांसीसी कला पत्रिका ने उनकी ट्रक-कला को अपने पन्नों पर जगह दी. इसके बाद कुछेक फ्रेंच पर्यटक घोटकी आये भी और उन्होंने कफ़ील भाई को फ्रांस आ कर वहां के ट्रकों पर चित्र बनाने की दावत दी. कफ़ील भाई ने एक शर्त रखी कि उन्हें फ्रांस के ट्रकों पर भी अपने हस्ताक्षर करने की छूट होगी. फ्रेंच पर्यटकों में कहा कि वे इसकी गारंटी नहीं दे सकते. इतना सुनना था और कफ़ील भाई ने साफ़ मना कर दिया.

कफ़ील भाई तीस से ऊपर के हो चुके थे और एक दिन उन्होंने पेन्टिंग करना छोड़ दिया. अपने कुछ प्रशंसकों से उन्होंने थोड़ी रकम उधार ली और फर्नीचर की एक दुकान खोली. इस नए धंधे से थोड़ा बहुत पैसा बनाने के बाद उन्होंने शादी करने का फ़ैसला किया. 2000 की शुरुआत में उन्होंने दुकान बंद की, सारा सामान बेचा और कराची चले गए.

फिलहाल कोई नहीं जानता कि वे कराची में कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं. कफ़ील भाई ने गायब हो जाने का फ़ैसला कर लिया था. समय के साथ-साथ कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर के हस्ताक्षर भी ट्रकों से अदृश्य होते चले गए.



अशोक पांडे (बाएँ)आला दर्जे के घुमक्कड़,कवि, अनुवादक और पता नहीं क्या-क्या हैं। हल्द्वानी में रहते हैं। कबाड़ख़ाना इनके ब्लॉग का नाम है जो अनोखा और मशहूर-ए-ज़माना है। यह लेख भी वहीं से टीपा हुआ है।