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रिवर्स गियर में Post-truth, ताज़ा शिकार अमेरिकी राजदूत निक्‍की हेली! देखें प्रैंक वीडियो…

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दीपांकर पटेल

2017 की शुरूआत में डोनाल्‍ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने को पोस्ट ट्रुथ के बढ़ते प्रभुत्व की तरह देखा गया. Politifact.com द्वारा ट्रम्प के चुनावी बयानों के ऐनालिसिस से ये बात सामने आयी कि इन बयानों में से महज चार फीसदी ही सही थे, बाकी सब भावनाओं और भाव-भंगिमाओं के सहारे पेश किये गए झूठ थे जिन्हें लोगों ने सही मान लिया।

भावनाओं के प्रभाव को हवा देकर तथ्यों को दरकिनार करने का जो अभ्यास 21वीं सदी के राजनेताओं ने तेजी से शुरू किया, साल के आखिर में संयुक्‍त राष्‍ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली उसी भावना के प्रवाह की शिकार हो गईं।

दरअसल 21 दिसम्बर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देशों ने जेरूसलम के मुद्दे पर अमेरिका के खिलाफ 128 देशों के समर्थन से प्रस्ताव पास किया। नौ सदस्यों ने इस समर्थन के विरोध में वोट किया, जबकि पोलैंड समेत 35 देशों ने अमेरिका का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते हुए वोटिंग में हिस्‍सा नहीं लिया।

इस मौके का फायदा उठाया रूस के दो कॉमेडियन प्रैंकस्टर वोवन और लेक्सस ने। इन दोनों ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत निक्की हेली से फोन पर बात की और खुद को पोलैंड का प्रधानमंत्री मात्सुज़ मोरावेस्की बताया।

फोन पर बात बेहद सहजता और गर्मजोशी से शुरू होती है और निक्की हेली जेरूसलम मुद्दे पर सपोर्ट देने के लिए पोलैंड का शुक्रिया अदा करती हैं और कहती हैं कि इसके बाद अमेरिका हमेशा पोलैंड को दोस्त के रूप में देखेगा।

थोड़ी देर तक बात करने के बाद जब प्रैंकस्टर खुद को कॉन्फिडेंस में पाते हैं तो वे निक्की हेली से एक देश बिनोमो (Binomo) के बारे में बात करते हैं। वे कहते हैं ये वियतनाम से थोड़ी ही दूर साउथ चाइना सागर में एक द्वीप है। वे हेली से पूछते हैं- क्या आप बिनोमो को जानती हैं। निक्की हेली बोलती हैं हां वो जानती हैं। फिर प्रैंकस्टर कहते हैं कि बिनोमो ने खुद को आजाद घोषित कर लिया है। वे बिनोमो में हाल ही में हुए चुनाव की बात करते हैं और फिर उस चुनाव में रूस के हस्तक्षेप की बात करते हैं।

इस पर निक्की हेली रूस के हस्तक्षेप की बात से सहमति जताती हैं। फिर प्रैंकस्टर कहते हैं कि बिनोमो के कारण साउथ चाइना सागर में स्थिति बहुत तनावपूर्ण हो गई है। इस पर निक्की जवाब देती हैं कि वे इसके बारे में अवगत हैं और स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। इसके बाद प्रैंकस्टर उन्हें बिनोमो की स्पेलिंग भी बताता है, फिर भी निक्की को यह असामान्य नहीं लगता।

सच ये है कि बिनोमो नाम का कोई देश या द्वीप दुनिया में है ही नहीं।

गैब्रियल गार्सिया मार्केज कहते हैं, कि “झूठ को सच मान लेना संदेह करने से ज्यादा सुविधापूर्ण होता है।”

अगर जुमले को जनता सच मानकर बेवकूफ बन सकती है तो प्रैंक कॉल से राजनीतिज्ञ भी बेवकूफ बनते हैं, इस चराचर नश्वर जगत में हर ‘जैसे’ के लिए एक ‘तैसा’ है।

आपने आम लोगों का रेडियो पर मिर्ची-मुर्गा बनते हुए और बैंड बजते हुए खूब सुना होगा। चटकारें लेते हुए आप यह जान रहे होते हैं कि सामने वाला बेवकूफ बन रहा है और आप हंस-हंस कर लोटपोट हो रहे होते हैं।

लेकिन लोग प्रैंक-कॉल के चक्कर में बेवकूफ कैसे बनते हैं?

वो दो तरीके से बेवकूफ बनते हैं.

पहला वो प्रैंक करने वाले की एक्टिंग को ही सच मान लेते हैं और बेहद नुमायां चीज को भी नजरअंदाज कर देते है, यहां तक कि उसकी ओवरएक्टिंग को भी. जैसा कि मनोविज्ञान के प्रोफेसर जॉन सूलर कहते हैं, “यदि लोग ठीक से नहीं जानते कि आप कौन हैं, तो वे आपसे असामान्य तरीके से व्यवहार करने लगते हैं जो वे सहज-सामान्य रूप में नहीं करेंगे।”

दूसरे, वे प्रैंक करने वाले की चाल में पूरी तरह फंस जाते हैं जैसे उसकी किसी झूठी बात पर यकीन करना या उसकी हां में हां मिलाना, क्‍योंकि अज्ञात के सामने अज्ञानी घोषित हो जाने का डर हमें सताता है। जैसे- जब किसी इन्वेस्टमेंट कंपनी का एम्पलॉई हमसे फोन पर पूछता है, ‘सर आप बिट क्वाइन के बारे में जानते ही होंगे तो हम उसकी हां में हां मिला देते हैं भले ही हमने सिर्फ बिट क्‍वाइन का सिर्फ  नाम ही सुना हो। ऐसे ही नेताओं द्वारा भाषणों में बोले गए तथ्यों को हम सही मानते चले जाते हैं और ज्यादातर गलतियां पेशेवर फैक्टचेकर्स ही पकड़ पाते हैं। दुनिया भर में पोस्ट ट्रुथ के बढ़ते चलन का यही बुनियादी कारण है।

निक्की हेली भी रशियन प्रैंककॉलर के सामने इसी डर का शिकार बन गईं। जैसे समर्थक अपने नेता के मुंह से विपक्षी की हर बुराई सुनना चाहते हैं, भले ही वह तथ्यात्मक रूप से गलत बात कहकर की गई बुराई ही क्यों न हो वैसे ही निक्की हेली सरीखे नेता से यह उम्मीद की जाती है कि वे दुनिया के हर भूभाग की जनकारी रखती होंगी। पोस्ट ट्रुथ के दौर में प्रैंक तो हर तरफ से खेला जा रहा है, लेकिन निक्की हेली भी 2017 के आखिर में इसी प्रैंक का शिकार बन गईं। शिकारी भी कभी-कभी शिकार बन ही जाते हैं।

अब आप भी यह बातचीत सुन ही लीजिये…