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कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना: अब आई ऑनलाइन मीडिया के दमन की बारी, हमले का आदेश जारी

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ऐसा लगता है कि पिछले दिनों फेक न्‍यूज़ के बहाने मीडिया और सरकार के बीच घटे नाटक का असली निशाना कहीं और था। शास्‍त्री भवन से 4 अप्रैल को जारी एक आदेश की मानें तो सरकार की असल मंशा अब ऑनलाइन माध्‍यम को अपनी गोदी में लेने की है।

फेक न्यूज पर कथित रोक लगाने के लिए पत्रकारों की PIB मान्यता रद्द करने के विवादास्पद आदेश को वापस लेने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने समाचार पोर्टलों और मीडिया वेबसाइटों को नियंत्रित करने के लिए एक समिति का गठन करने का निर्णय लिया है। इस सम्बन्ध में 4 अप्रैल को मंत्रालय के न्यू मीडिया सेल की तरफ से एक आदेश जारी हुआ है जिस पर निदेशक अमित कटोच के दस्तखत हैं। आदेश की प्रति PCi, NBA, IBF जैसे मीडिया संगठनों को भेजी गयी है।

दिलचस्‍प है कि आदेश की प्रति 10 इकाइयों को भेजी गई है जिनमें 7 सरकारी हैं और 2 अर्ध-सरकारी इकाइयां। आश्‍चर्य की बात है कि प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया जो कि पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्‍था है, उसके पास आदेश की प्रति नहीं भेजी गई है।

उक्त आदेश में कहा गया है कि “ऑनलाइन मीडिया वेबसाइटों और समाचार पोर्टलों को नियामित करने के लिए कोई नियम या दिशानिर्देश नहीं हैं इसलिए ऑनलाइन मीडिया/न्यूज़ पोर्टल सहित डिजिटल प्रसारण और मनोरंजन/समाचार/ इंफोटेनमेंट/मीडिया अग्रीगेटर के लिए एक नियामक ढांचा बनाने व सुझाने हेतु एक समिति के गठन का फैसला लिया गया है।”

 

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार को आए चार साल होने को जा रहे हैं और कोई महीना ऐसा नहीं बीतता जब मीडिया के संबंध में सरकार की तल्‍खी जाहिर न होती हो। पहले एनडीटीवी पर छापा मरवाया गया। फिर अपनी पसंद के पत्रकारों को सही जगहों पर बैठाया गया और नापसंदगी वाले पत्रकारों को नौकरी से निकलवाया गया। ताज़ा उदाहरण ट्रिब्‍यून के संपादक हरीश खरे हैं। जब उससे भी बात नहीं बनी तो डीएवीपी के नियम बदल कर हजारों प्रकाशनों को विज्ञापनों से महरूम कर दिया गया।

अभी पीआइबी मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों पर लगाम कसने की मंत्री स्‍मृति ईरानी की कवायद नाकाम हुई ही थी कि प्रिंट ने खबर दी कि सरकार इन पत्रकारों को आरएफआइडी टैग वाले कार्ड जारी करने का सोच रही है ताकि उनकी आवाजाही पर नजर रख सके।

ऐसा लगता है कि ये सारा घटनाक्रम जानबूझ कर रचा गया ताकि सरकार के असली निशाने यानी डिजिटल मीडिया को नज़रों ओझल रखा जा सके। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि टीवी चैनलों को मोदी सरकार ने गोदी में लगभग बैठा लिया है, जैसा कि रवीश कुमार हर अगले दिन कहते हैं। अखबारों में रीढ़ वाले संपादक का ज़माना कब का खत्‍म हो गया था, अब जो बचे-खुचे थे उन्‍हें भी बाहर का रास्‍ता दिखला दिया गया। सारी समस्‍या ऑनलाइन से थी।

पिछले दिनों द वायर पर रोहिणी सिंह की अमित शाह के बेटे के बारे में स्‍टोरी एक निर्णायक बिंदु थी जब सरकार को खुद अध्‍यक्ष के बेटे के बचाव में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करनी पड़ी। ईपीब्डब्‍लू ने सरकार पर अडानी को लाभ देने की स्‍टोरी की तो मुकदमा पलट कर अडानी ने कर दिया। मानहानि के मुकदमों के बावजूद ऑनलाइन मीडिया इतना बड़ा हो चुका है कि मोदी सरकार को उससे अंडस महसूस हो रहा है।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय का 4 अप्रैल का आदेश सरकार की असली मंशा को उजागर करता है और इस बात को भी साफ़ करता है कि पत्रकारिता अगर कहीं बची-खुची है तो ऑनलाइनइ माध्‍यम में है टीवी और अखबारों को सरकार ने काम भर का पोस लिया है। अब बारी ऑनलाइन की है।

 

2 COMMENTS

  1. U mesh chandola

    It RAISES doubts ABOUT Top leader’s involvement in Judge Loya Murder case. Mediavigil, thewire. Main target.

  2. आशा पटेल

    बहुत बेहतरीन जानकारी है हम पत्रकारों के लिए

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