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दैनिक भास्कर डिजिटल का UP कुनबा उजड़ने की कहानी, एक ज़मीनी पत्रकार की जुबानी

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ज़ीशान अख्तरलखनऊ

सुबह के नौ बज रहे थे. लैपटॉप पर काम करना शुरू ही किया था कि नोएडा से  एचआर हेड का फ़ोन आता है. एक मिनट की बात के बाद वो कहती हैं ‘हमें शर्मिंदगी हो रही है ये बताते हुये कि अब आप भास्कर के इम्प्लोयी नहीं रहे.’ सुनकर एकबारगी झटका लगता है. फ़ोन कटता है. उसके दस मिनट बाद ही फ़ोन घनघनाता है. पता चलता है कि यूपी के दूसरे रिपोर्टर्स को भी काम के बीच फ़ोन पर ही ‘आपकी नौकरी नहीं रही’ की सूचना सुना दी गई है.

दैनिक भास्कर डिजिटल में लखनऊ के अलावा यूपी में कुल 7 रिपोर्टर्स थे, जो यूपी के लगभग सभी 70 जिले कवर करते थे. सभी के पास 7 से 10 जिलों का प्रभार था. इन सात रिपोर्टर्स को 7 फोटोग्राफर्स भी दिए गए थे. लखनऊ में 6-7 रिपोर्टर्स की टीम थी. डेस्क पर 10 से 15 लोग थे. एक माह के भीतर इन सब की छुट्टी कर दी गई.

आज के दौर में पत्रकारों की नौकरी कितनी असुरक्षित है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक माह के अंदर यूपी भर के करीब 35 पत्रकारों को दूसरी नौकरी तलाश करने की बात कह दी जाती है. मतलब ये हुआ कि दैनिक भास्कर अपनी डिजिटल विंग (दैनिक भास्कर.कॉम) के 30 से 35 पत्रकारों की नौकरी खा जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता.

ये कोई नई बताने लायक बात नहीं कि पत्रकारिता अब समस्याओं और असल मुद्दों की देहरी नहीं छूती है. खर्चे और दूसरे संसाधनों की बात नहीं है. अखबार, चैनल और वेबसाइट (खासकर वो जो पूंजीपतियों के स्वामित्व वाले बड़े मीडिया घराने चलाते हैं) की इतनी हैसियत तो मानी ही जानी चाहिए कि फील्ड में रिपोर्टिंग करा सकें, लेकिन यहां बात नियत की है. रिपोर्टिंग किसके लिए करायेंगे? मालिक पूँजीपतियों को ‘पत्रकारिता’ की क्या ज़रूरत है. बुंदेलखंड जैसी जगह में किसान मरते हैं, सामंतवाद है, पानी नहीं है, बिजली नहीं है, महिलायें आज भी दो रोटी और माह के 100 रुपए के लिए सिर पर मानव मल ढोती हैं, जैसे मुद्दे गहराई से उठाये जाने से पत्रकारीय का उद्देश्य पूरा होता होगा, लेकिन इससे मालिक पूँजीपतियों को क्या लाभ?

इसलिए एक बार फरमान सुनाया गया. यूपी हेड का फ़ोन आया. ‘काम अच्छा कर रहे हो. ग्राउंड रिपोर्टिंग हो रही है.’ फिर फ़ोन आता है कि ‘मैं ट्रैक पर देख रहा हूँ कि गांव-गली, किसानों और दलितों को लेकर स्टोरी बहुत करते हो, थोड़ा कम करो. वेबसाइट पर गांव-गलियों की ख़बरों में पाठकों को अधिक इंटरेस्ट नहीं होता.’

एक मीटिंग में मैं कहता हूँ कि बुंदेलखंड जैसे हिस्से में, जो यूपी ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपने ख़राब हालात के कुख्यात हो चुका है, में उन्हें गांवों में जाकर काम करने दिया जाए. और स्टोरीज़ प्रकाशित भी की जायें. इस पर कहा जाता है कि ‘ठीक है, लेकिन कुछ बड़ा हो तभी इन मुद्दों से जुड़ी स्टोरी हो.’ गांवों और दलितों की स्टोरी करने को कह दिए जाने का मतलब यहां किसी मुद्दे या समस्या के विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण से नहीं है, बल्कि सिर्फ घटनात्मक जानकारी से है. अगर कुछ बड़ी घटना होगी तो ज़ाहिर है पब्लिश की ही जाएगी. रूटीन खबर की हैसियत अधिक नहीं आंकी जा सकती, अगर उसे सिर्फ पुलिस और प्रशासन के हवाले से लिख दिया जाए.

मीडिया में ऊँची कुर्सी पर बैठे कई लोग किसानों और दलित (खासकर दलित) शब्द से इतने ग्रसित है कि वो इस मुद्दे से ही नफरत करते हैं. दलितों से जुड़ी समस्याओं की स्टोरी उन्हें ‘लो प्रोफाइल’ लगती हैं. इसलिए मेरी स्टोरीज को रोका जाने लगा. अपना एजेंडा चलाया जाने लगा. ज्यादा से ज्यादा पेज व्यू के चक्कर में ऐसी-ऐसी हाईप्रोफाइल कहानियाँ गढ़ी जाने लगी, महिलाओं और लड़कियों से जुड़ी तस्वीरों को कैश कराने के लिए ऐसी ख़बरें की जाने लगी, जिसे अपने फेसबुक पेज पर शेयर करने तक में हिचक महसूस होती थी. वेबसाइट पर हाई प्रोफाइल और लो प्रोफाइल के हिसाब से घटनाओं/खबर की हैसियत और जगह तय होने लगी. हर समय अजब-गज़ब कहानियों की डिमांड ‘कुछ अलग’ सनसनीखेज कहानी की मांग के बहाने इतना मानसिक तनाव दिया जाने लगा कि मैं एक पत्रकार के तौर पर खुद को मानसिक रोगी और रिमोट से चलने वाले रोबोट महसूस करने लगा.

इन सभी मतभेदों को लेकर यूपी हेड से कई बात झगड़ा हुआ. कई बार बात तक बंद हो गई. कई बार धमकाया गया कि दूसरी नौकरी तलाश लो. व्यक्तिगत हमले किए गए. बदजुबानी की गई. मैं ये जान रहा था कि नौकरी खतरे में है. और हुआ भी यही. एचआर द्वारा आए फ़ोन कॉल ने ऐसा होना सुनिश्चित कर दिया. पहले ये कहा गया कि यूपी में दैनिक भास्कर.कॉम बंद कर दिया गया. फिर पता चला कि जिस भास्कर.कॉम ने एक माह में चार करोड़ से अधिक पेज व्यू रिपोर्टर्स की ख़बरों की दम पर हासिल किए, वही अब यूपी में डेस्क पर दो-चार लोगों से काम करा कर पत्रकारिता के सोपान चढ़ने की कोशिश में है. स्ट्रिंगर इनके लिए आवारा, अनपढ़ और दलाली करने वाले लोगों की तरह हैं. ये बात कई बार उन्हीं के मुंह पर कह भी दी गई. अब इन्हीं स्ट्रिंगर्स से ख़बरें ली जाती है. सिर्फ भास्कर ही नहीं बल्कि लगभग सभी मीडिया हाउस क्षेत्रों में स्ट्रिंगर्स के भरोसे हैं और आधी-अधूरी अधपकी जानकारी से काम चला रहे हैं. बदले में उन्हें माह में ख़बरों के हिसाब से दो ढाई हजार रुपए पेमेंट किया जाता है. ढाई हजार माह के मेहनताने के साथ एक व्यक्ति कितना काम कर सकता है?

भास्कर से छुट्टी के बाद यूपी के कई रिपोर्टर्स ऐसे थे, जिनके परिवार हैं. बच्चे बड़े हैं. बेटियां शादी को हैं, लेकिन उम्रदराज हो जाने के कारण उन्हें अब तक ढंग की नौकरी नहीं मिली है. बहुत हाथ-पाँव पटकने के बाद किसी न किसी क्षेत्रीय अखबार या चैनल से जुड़कर काम चला रहे हैं. एक रिपोर्टर द्वारा परिवार का वास्ता दिए जाने के बाद भोपाल में बैठने वाले दैनिक भास्कर की डिजिटल विंग के संपादक ने उन्हें बिहार में दैनिक भास्कर प्रिंट की एक यूनिट में भेजा. नौकरी के लिए वह यूपी से बिहार परिवार छोड़ चले गए. एक-दो माह काम करने के बाद उन्हें तनख्वाह नहीं दी गई. इसके बाद उनसे कहा गया कि आप जितनी तनख्वाह में डिजिटल में काम कर रहे थे, उतनी तनख्वाह नहीं दे सकते. हताश होकर उन्होंने वहां काम नहीं करना ही उचित समझा. नौकरी के लिए दिल्ली, नोएडा, लखनऊ में चक्कर लगाने के बाद अब एक क्षेत्रीय चैनल में काम रहे हैं.

एजेंसी के भरोसे रहने वाले मीडिया हाउस जनता तक अगर सही ख़बरें नहीं पहुंचें तो इसमें पूरी गाली पत्रकारों के हिस्से नहीं आनी चाहिए. सही और मुद्दों की बात पाठक तक नहीं पहुंचने के पीछे मीडिया हाउस के मालिकों और मोटी तनख्वाह पाने वाले सम्पादकों का इसमें (वो सम्पादक जो सिर्फ मालिकों के राजनैतिक, व्यापारिक एजेंडे पर चलते और चलाने की कोशिश करते हैं) बड़ा हाथ होता है. नौकरी के प्रति इतनी निर्दयता से समझा जा सकता है कि पत्रकार रिमोट कंट्रोल क्यों बन जाते हैं. और पत्रकारिता अपने सबसे बदतर दौर में क्यों है.


भास्कर डिजिटल के संपादक अनुज खरे को बुंदेलखंड प्रभारी जीशान अख्तर का खरा पत्र

 

सेवा में,
अनुज खरे सर
एडिटर, दैनिक भास्कर डिजिटल

आपको अवगत कराना है कि मैं पिछले साढ़े तीन साल से दैनिक भास्कर, यूपी की डिजिटल टीम का हिस्सा था. बुंदेलखंड जैसे हिस्से में मैंने वेब जर्नलिस्ट के रूप में मानक स्थापित किये. यह मेरे लिए सुखद रहा. किसी कारण वश अब दैनिक भास्कर के साथ आगे चलना संभव नहीं हो पा रहा है. पिछले एक साल से कमर्शियल लेवल पर हो सकता है चीज़ें अच्छी रही हों, लेकिन काम की क्वालिटी और बुंदेलखंड जैसे हिस्से वैसी रिपोर्टिंग नहीं कर पाया या ज्यादा बेहतर ये कहना होगा कि एक साल से काम को लेकर दिए गये निर्देशों के कारण मैं नहीं कर पाया. यूपी हेड द्वारा लगातार अच्छी भाषा का इस्तेमाल नहीं किये जाने और बात-बात में ‘कोई और नौकरी ढूँढ लो’ जैसी धमकी के कारण मैं काफी समय से डिप्रेशन और मानसिक बीमार जैसी स्थिति में था.

बुंदेलखंड जैसी जगह पर जो किसान आत्महत्या और गरीबी, छुआछूत, एट्रोसिटी के कारण देश में चर्चा का कारण रहता है, में इन से सम्बंधित ख़बरों को छोड़ साफ़ कहा गया कि ग़रीबों, दलितों, किसानों और गाँवों की खबरें नहीं चलेंगी. सिर्फ हाई प्रोफाइल और हाई प्रोफाइल चेहरे वाली ख़बरें चाहिए. इसके बाद तथ्य परक स्टोरीज़ रोकी जाने लगी. ये सब लिखने के बीच मेरे मेल में अब तक कई ऐसी स्टोरी पड़ी हुई हैं, जो मैंने भेजी लेकिन नहीं लगाई गयीं.

इससे पहले एक समय भी ऐसा था जब हमारी की गयी स्टोरीज़ को न सिर्फ बड़े मीडिया हाउस फॉलो करते थे, बल्कि दिल्ली से सरकार और आयोगों द्वारा जांच के आदेश दिए जाते थे, लेकिन पिछले एक साल से ये सब ख़त्म हो गया. कह सकते हैं कि हम फीचर ही बटोरते रहे और भास्कर का पहले वाला प्रभाव ख़त्म सा हो गया. रोज-रोज अजब-गजब क्राइम और फीचर स्टोरी नहीं निकलती और ना ही निकल सकती है, ये पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ने वाला स्टूडेंट भी बता सकता है.

खैर, भास्कर की छवि के मुताबिक़ और जर्नलिज्म के हिसाब से बुंदेलखंड जैसे हिस्से में ग्राउंड से काफी कुछ और निकल कर लाया जा सकता था, जिससे हम जर्नलिज्म को डिफाइन कर सकते थे. मानक और मिसाल स्थापित कर सकते थे, लेकिन को-आर्डिनेशन की भारी कमी और आये दिन आने वाले अजब-गजब निर्देशों के कारण अब काम करना मुश्किल हो रहा है.

मुझे इस बात का बुरा अहसास हो रहा है कि मैं दैनिक भास्कर जैसे मीडिया हाउस का हिस्सा नहीं रहूँगा, लेकिन मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मैं यूपी हेड के नेतृत्व में अब काम नहीं करूँगा.

इसलिए मेरा इस्तीफ़ा स्वीकार करें.

धन्यवाद

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