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सिविल सोसायटी की माँग: ‘झारखंड में PFI पर बैन क़ानून का मज़ाक़, हटाया जाए !’

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देश के तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने झारखंड सरकार से पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (P.F.I) से प्रतिबंध हटाने की माँग की है।बुधवार को जारी एक बयान में उन्होंने कहा है कि प्रतिबंध का आदेश न सिर्फ़ क़ानून का मज़ाक़ है बल्कि संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी है। संगठन पर मध्यपूर्व के आईएसआईएस से प्रभावित होने का बेबुनियाद आरोप लगाया गया है ।

बयान में बुद्धिजीवियों की ओर से कहा गया है कि ” वे समझते हैं कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया, एक नया सामाजिक आंदोलन है जो ग़रीबों, वंचितों, ख़ासतौर पर मुसलमानों के सशक्तिकरण के लिए साक्षरता अभियान, कुपोषण की रोकथाम जैसे विकास के कामों में सक्रिय है।

बयान पर हस्ताक्षर करने वालों का यह भी मानना है कि  झारखंड की हिंदुवादी सरकार और पुलिस,लिंचिग जैसी घटनाओं के मामले उजागर करने की वजह से PFI के कार्यकर्ताओं से नाराज़ है। यह प्रतिबंध विरोध और असंतोष ज़ाहिर करने के लोकतांत्रिक तरीकों को दबाने के लिए है। यह पहली बार नहीं है कि सरकार ने इस संसाधन समृद्ध राज्य की लूट और सत्तारूढ़ वर्ग के भ्रष्टाचार का विरोध करने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून का इस्तेमाल किया है। उन्होंने  मानव अधिकार समूहों, राजनीतिक दलों और अल्पसंख्यक संगठनों से भी अपील की कि वे PFI  पर लगे प्रतिबंध को खत्म करवाने के लिए आगे आयें।

हस्ताक्षरकर्ताओं में  शामिल हैं : 1. डॉ सुरेश खैरनार, सामाजिक कार्यकर्ता, नागपुर महाराष्ट्र; 2. रवि नायर, दक्षिण एशियाई मानव अधिकार प्रलेखन केंद्र, नई दिल्ली; 3. प्रोफेसर शम्स-उल-इस्लाम, नई दिल्ली; 4. लेनिन रघुवंशी, पीवीसीआरआर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश; 5. एड.श्रीदेवी पानिककर, सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली; 6. राजीव यादव, रिहाई मंच, लखनऊ, उत्तर प्रदेश; 7. एड. आदित्य वाधवा, सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली; 8. डॉ. मलम निंगथौजा, शांति और लोकतंत्र के लिए कैम्पिंग, मणिपुर; 9. सुनील कुमार, पत्रकार/कार्यकर्ता, नई दिल्ली; 10. माधुरी कृष्णस्वामी, जेएडीएस, भोपाल, मध्य प्रदेश; 11. वसंत एएस, हैदराबाद; 12. रोना विल्सन, सीआरपीपी नई दिल्ली; 13. सीमा आजाद, संपादक दस्ताक, इलाहाबाद; 14. प्रबल, डीएसयू, दिल्ली विश्वविद्यालय; 15. एडीआर अमित श्रीवास्तव, उच्च न्यायालय, दिल्ली; 16. एड. मंगला, उच्च न्यायालय, दिल्ली; 17. अनुष्का, डेमोक्रेटिक राइट्स, नई दिल्ली; 18. विपुल कुमार, क्विल फाउंडेशन, 19. देविका प्रसाद, राइट ऐक्टिविस्ट।

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