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राजदान के राज में PTI का ब्‍यूरो चीफ़ बना हुआ है यौन उत्‍पीड़न का दोषी, IFJ ने उठाया मुद्दा

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अपराध कर के, जेल जाकर और बदनाम होकर भी अगर आप अपने पद पर बने रह सकते हैं तो ज़रूरी नहीं कि आप नेता हों। भारतीय मीडिया भी ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनमें संगीन अपराधों के लिए मुकदमे झेल रहे पत्रकारों को उनके संस्‍थानों ने अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की सिफारिशों के बावजूद उनके पद से बरखास्‍त नहीं किया है। ऐसा ही एक मामला देश की प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया (पीटीआइ) का है जिसका जि़क्र इस महीने जारी हुई इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्‍ट्स की वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज है।


दि रोड टु रिसीलिएंस- प्रेस फ्रीडम इन साउथ एशिया 2015-16” नामक इस रिपोर्ट को संयुक्‍त राष्‍ट्र की एजेंसी युनेस्‍को ने अभिपुष्‍ट किया है। रिपोर्ट में ”जेंडर एंड मीडिया” नामक अध्‍याय के अंतर्गत भारत के खंड में पीटीआइ समाचार एजेंसी के गोवा में तैनात सीनियर प्रिंसिपल करेस्‍पॉन्‍डेन्‍ट रूपेश सामन्‍त का जि़क्र है जिनके खिलाफ हेराल्‍ड केबल नेटवर्क (एचसीएन) की दो महिला पत्रकारों ने यौन उत्‍पीड़न के मामले में एफआइआर दर्ज करवाई थी। यह समाचार चैनल उसी भवन से अपना दफ्तर साझे में चलाता है जहां पीटीआइ का दफ्तर स्थित है। सामन्‍त पीटीआइ और एचसीएन दोनों के लिए काम करते हैं।

साल भर पहले सितंबर 2015 में सामन्‍त को गिरफ्तार किया गया था लेकिन ज़मानत पर वे छूट गए। रिपोर्ट कहती है, ”स्‍थानीय पत्रकारों के अनुसार सामन्‍त ने दूसरे पत्रकारों का भी उत्‍पीड़न किया था लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में उनके प्रभाव के डर से वे महिलाएं सामने नहीं आईं।” इस घटना के बाद नेटवर्क ऑफ विमेन इन मीडिया की सदस्‍यों ने पीटीआइ के बोर्ड को लिखित में भेजा था कि वह सामन्‍त के खिलाफ कार्रवाई करे, लेकिन पीटीआइ का जवाब आया कि वह पुलिस केस को करीबी से देख रही है और सामन्‍त के खिलाफ कार्रवाई इसलिए नहीं कर सकती क्‍योंकि पीडि़त महिला पत्रकार दूसरी मीडिया कंपनी की हैं।

ध्‍यान रहे कि पीटीआइ का प्रबंधन पिछले करीब दो दशक से एम.के. राजदान के हाथों में रहा है जो आगामी 30 सितंबर को रिटायर होने जा रहे हैं। वैसे तो बीते मार्च के अंत में ही उनका कार्यकाल समाप्‍त हो गया था लेकिन वे लगातार दिल्‍ली के संसद मार्ग स्थित पीटीआइ के दफ्तर में आ रहे हैं और बैठकें ले रहे हैं। जाहिर है, अंतरराष्‍ट्रीय पत्रकार संगठनों की सिफारिश के बावजूद सामन्‍त को उनके पद से न हटाए जाने का फैसला राज़दान की स्‍वीकृति से ही लिया गया था।

आइएफजे की रिपोर्ट में बस्‍तर में काम करने वाली स्‍वतंत्र पत्रकार मालिनी सुब्रमण्‍यम के उत्‍पीड़न, तरुण तेजपाल का मामला और गोहाटी के एक समाचार चैनल असम टॉक्‍स की दिल्‍ली स्थित महिला पत्रकार के साथ उत्‍पीड़न का मामला भी दर्ज किया गया है जिसने चैनल के एडिटर-इन-चीफ अतानु भुइयां और न्‍यूज़ लाइव के दिल्‍ली संवाददाता लुइत नील डॉन के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। रिपोर्ट में खबर लहरिया की छह महिलाओं के साथ उत्‍पीड़न का मामला भी शामिल है।

आइएफजे की पूरी रिपोर्ट आप नीचे पढ़ सकते हैं:

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