Home पड़ताल कहीं चुनावी अध्यादेश बनकर न रह जाय 200 प्वाइंट रोस्टर पर फैसला!

कहीं चुनावी अध्यादेश बनकर न रह जाय 200 प्वाइंट रोस्टर पर फैसला!

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विनय जायसवाल

सरकार ने देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के लिए अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इस तरह से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े तबकों का किसी मुद्दे पर एक साथ मिलकर आंदोलन करने का नतीजा आज सामने है। इस आंदोलन से साफ है कि अगर देश का बहुसंख्यक समाज मिलकर अपने हक की लड़ाई लड़े तो व्यवस्था में भागीदारी को साजिश के तहत ख़त्म करने पर तुली शक्तियों को झुकना ही पड़ेगा।


यह वक्त बहुसंख्यक समाज के लिए जश्न का न होकर चिंतन और भविष्य की रणनीति बनाने का है क्योंकि चुनावी समय में आए इस तरह के अध्यादेश से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े तबकों की प्रतिनिधित्व की सारी समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है।

सबसे पहली बात यह है कि यह कोई संविधान संसोधन नहीं है और इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जिससे इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती न दी जा सकती हो। वैसे भी संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कोई भी अध्यादेश केवल 6 महीने तक के लिए होता है। दूसरी तरफ 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत निकले आवेदनों के बार में अभी तक कोई स्थिति स्पष्ट नहीं है, जब तक सरकार कोई दिशानिर्देश नहीं देती या फिर यूजीसी विश्वविद्यालयों को आदेश जारी नहीं करती, तब तक इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी।

यह अध्यादेश केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए है। देश में केंद्रीय विश्वविद्यालयों की संख्या 49 है जबकि कुल विश्वविद्यालय 800 से भी अधिक हैं। इससे साफ है कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नौकरियों में केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में आरक्षण से प्रतिनिधित्व का मसला हल नहीं होने वाला बल्कि इसका विस्तार देश के राज्यस्तरीय, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों तक होना है। इसलिए यह राह अभी आसान नहीं दिखती है। इसके अलावा एक बड़ा मुद्दा बैकलॉग सीटों पर नियुक्ति का भी है।

दरअसल देश की राजनीति अब उस ढर्रे पर चल पड़ी है जिस पर सरकार पहले से मिले अधिकारों में या तो कटौती कर देती या फिर उन्हें बदल देती है, जिससे देश का एक बड़ा तबका अपनी नई जरूरतों और मांगो को भूलकर उसे ही फिर से पाने की जद्दोजहद में लग जाता है जो उसे पहले से हासिल था। इसके साथ ही ऐसे मामले में जो भी निर्णय लिए जाते हैं, उसका प्रावधान इस तरह से किया जाता है कि या तो वे न्यायालय में लंबे समय तक लटके रहें या फिर न्यायालय प्रावधान को तुरंत खारिज कर दे। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 200प्वाइंट रोस्टर की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर को लागू करना कुछ ऐसा ही मामला है।

इस 13 प्वाइंट रोस्टर और 200 प्वाइंट रोस्टर का विवाद 1 दशक से भी अधिक पुराना है। इस समय के यूजीसी अध्यक्ष वीएन राजशेखरन पिल्लई ने विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करने से जुड़ी विसंगतियों को दूर करने के लिए प्रोफेसर रावसाहब काले की अध्यक्षता में प्रोफेसर जोश वर्गीज और यूजीसी सचिव डॉ. आर के चौहान की सदस्यता वाली 3 सदस्यीय समिति का गठन किया। इस समिति ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के आधार पर भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के 1997 में जारी गाइडलाइन के अनुरूप 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करने की सिफ़ारिश की, जिसे यूजीसी ने 2006 में लागू कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अप्रैल 2017 में इसी 200 प्रणाली रोस्टर के खिलाफ फैसला देते हुए 13 प्वाइंट रोस्टर रोस्टर लागू करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल के 22 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया। इसी के बाद से देश के अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में गहरा असंतोष देखने को मिला।

इस 13 प्वाइंट रोस्टर से नाराजगी की वजह यह रही कि इससे विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े तबके को दिया जा आरक्षण एक तरह से निष्प्रभावी हो जाएगा। इसका कारण यह है कि 200 प्वाइंट रोस्टर में विश्वविद्यालय एक इकाई होता है, जिसमें 1 से 200 के बीच जितने भी पदों का विज्ञापन जारी होगा, उसमें से सीधे 7.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 15% अनुसूचित जाति और और 27% अन्य पिछड़े तबके लिए पदों की व्यवस्था होगी बाकी 50.5 प्रतिशत पद समान्य भर्ती द्वारा सभी तबके के लोगों के लिए होगी जबकि 13 प्वाइंट रोस्टर में विश्वविद्यालय की जगह विषय के विभाग एक इकाई होता है, जिसमें पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य भर्ती के लिए, चौथा पद ओबीसी तबके के लिए, पांचवां और छठां पद सामान्य भर्ती के लिए, 7वां पद अनुसूचित जाति के लिए, 8वां पद ओबीसी तबके के लिए, 9वां, 10वां तथा 11वां पद सामान्य भर्ती के लिए, 12वां पद ओबीसी तबके के लिए, 13वां सामान्यभर्ती के लिए तथा 14वां पद अनुसूचित जनजाति के लिए होगा।

इस दोनों रोस्टर में अंतर समझना बहुत आसान है। 200 प्वाइंट रोस्टर में तय है कि विश्वविद्यालय में जितने भी पद आएंगे, उनमें आरक्षण के अनुपात में सीधे अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े तबके को प्रतिनिधित्व मिलेगा, यह प्रतिनिधित्व उसे चाहे जिस भी विभाग में मिले लेकिन 13 प्वाइंट रोस्टर में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधित्व के लिए एक विभाग में 14 पद होना ज़रूरी है। देश में बहुत कम ऐसे विभाग हैं जहां 14 पद हैं और अगर 14 या अधिक पद हों भी तो सभी की भर्ती एक साथ नहीं होती है। ऐसे में अनुसूचित जाति और जनजाति का तो शायद ही कभी नंबर आ पाएगा और ओबीसी तबके के लिए भी मौके बड़े मुश्किल होंगे।

इस 13 प्वाइंट रोस्टर को एक और तरीके से भी समझा जा सकता है कि अगर एक विभाग में सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के तीन अलग-अलग पद खाली हैं लेकिन तीनों अलग-अलग केटेगरी के कारण 9 पद नहीं बल्कि अलग-अलग 3 पद होंगे जिससे 13 प्वाइंट रोस्टरन के तहत केवल जनरल भर्ती के तहत ही आएंगे। 13 प्वाइंट रोस्टर के इसी अतार्किक और अव्यवहारिक प्रणाली के चलते इसका देश भर में विरोध हो रहा है।

देश में अन्य पिछड़ा वर्ग तबके की आबादी 1931 की एक मात्र जातिवार जनगणना के आधार 52% थी, जो आज बढ़कर इससे भी बहुत अधिक हो गई है लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग को केवल 27% आरक्षण मिला। इसका कारण यह है कि अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को उच्च शैक्षणिक संस्थानों के शैक्षणिक पदों पर आरक्षण 2007 से लागू हुआ। इसी तरह से अनुसूचित जातियों को उच्च शैक्षणिक संस्थानों के शैक्षणिक पदों पर 1997 से आरक्षण मिलना शुरू हुआ लेकिन इन वर्गों का प्रतिनिधित्व उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आज तक नहीं बढ़ा है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार देश के 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अन्य पिछड़ा वर्ग तबके से कोई भी प्रोफेसर नहीं है और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों का कुल प्रतिनिधित्व महज 4 फीसदी है। इसका मतलब है कि 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के करीब 96 फीसदी प्रोफेसर पदों पर सवर्ण जातियों का कब्जा है। इसी तरह से एसोसिएट प्रोफेसर के पदों अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की संख्या शून्य है और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों का कुल प्रतिनिधित्व महज 6 फीसदी है यानि 94 फीसदी पदों ओर उच्च जातियां ही काबिज है। सहायक प्रोफेसर के पदों पर भी अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को 27% की भागीदारी हासिल नहीं हो पाई है। इस पद पर भी महज 14% ही अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग हैं और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों का कुल प्रतिनिधित्व 18% है बाकी 62% पदों पर उच्च जातियां हैं। इसी तरह से गैर-शैक्षणिक पदों पर भी तीन चौथाई से अधिक उच्च जातियां ही काबिज हैं।

यहाँ यह समझने की बहुत ज़रूरत है कि आरक्षण व्यवस्था में भागीदारी और प्रतिनिधित्व का मसला है न कि केवल रोजगार और गरीबी दूर करने का साधन। इसलिए ऐसे लोगों और राजनीतिक दलों से सावधान रहने की ज़रूरत है जो अपना राजनीतिक साम्राज्य बचाने के लिए आरक्षण को इसके संवैधानिक प्रावधानों से इतर जाकर परिभाषित करने में लगे हैं।

इस मुद्दे पर अब राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ी हुई दिखाई पड़ रही है। कई राजनीतिक दल इसे चुनावी मुद्दा बना रहे हैं तो कई इसे अपनी घोषणापत्र में शामिल कर रहे हैं। ऐसे में लगता है कि गरीबी के आधार पर 10% सवर्ण आरक्षण के साथ-साथ 13 प्वाइंट बनाम 200 प्वाइंट रोस्टर 2019 के चुनाव के प्रमुख मुद्दों के रूप में रहने वाला है। इसी के साथ आबादी के हिसाब आरक्षण और 2021 की जातिवार जनगणना की मांग भी 2019 के चुनाव के मुद्दे के रूप में उभर रही है। इस तरह से देखें तो 21019 के चुनाव को सामाजिक न्याय, आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व, जातिवार जनगणना और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण का मुद्दा बहुत करीब से प्रभावित करने वाला है।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं)  

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