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गौहर रज़ा को ‘देशद्रोही’ कहने के लिए माफ़ी माँगेगा ज़ी न्यूज़ या रजत शर्मा की तरह दिखाएगा ठेंगा ?

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हर आज़ाद ख़्याल, ख़ासतौर पर आरएसएस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ खड़े होने वालों को देशद्रोही बताने के लिए छल-फ़रेब की सारी हदें तोड़ देने वाले ‘ज़ी न्यूज़’ की नाक में न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (NBSA) ने नकेल डाल दी है। उसने मशहूर विज्ञानी और शायर गौहर रज़ा की एक ग़ज़ल का कुपाठ करके उन्हें ‘देशद्रोही’ बताने वाले कार्यक्रम के लिए ज़ी न्यूज़ को माफ़ी माँगने को कहा है। साथ ही एक लाख रुपये जुर्माना भरने को भी कहा है। यह माफ़ीनामा ज़ी न्यूज़ को 8 सितंबर को प्रसारित करना होगा।

पहले जानिए कि मामला क्या है-

विज्ञानी और शायर गौहर रज़ा ने न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन से ज़ी न्यूज़ की शिक़ायत की थी। एसोसिएशन को दी गई चिट्ठी में कहा गया था कि ज़ी न्यूज़ ने झूठा बुलेटिन चलाकर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने मांग की थी कि झूठी ख़बर चलाने की एवज़ में चैनल 1 करोड़ का मुआवज़ा दे। साथ ही, चैनल पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ीनामा प्रसारित करे।

चिट्ठी में लिखा था कि ‘ज़ी न्यूज़ ने उनके ख़िलाफ़ 9, 10,  11 और 12 मार्च 2016 को ‘अफ़ज़ल प्रेमी गैंग का मुशायरा’ शीर्षक के साथ एक बुलेटिन प्रसारित किया। बुलेटिन दुर्भावनापूर्ण, झूठा, प्रायोजित और अपमानजनक होने के साथ-साथ पत्रकारिता की एथिक्स का खुला उल्लंघन था। नफ़रत को बढ़ावा देने वाले इस बुलेटिन की वजह से मेरी और मेरे परिवार की सुरक्षा का ख़तरा पैदा हो गया है। इस प्रोग्राम में मुझपर देशद्रोही होने का ठप्पा लगाने की कोशिश की गई है जिसकी वजह से मैं बेहद दुखी हूं।’

उन्होंने आगे लिखा था-  ‘ज़ी न्यूज़ ने अपने प्रोग्राम में गज़ल की लाइनें मनमाने तरीके से छांटकर दिखाई हैं जिसे मैंने 5 मार्च को सालाना शंकर शाद मुशायरे में पढ़ा था। वो ना सिर्फ सनसनीखेज़ और झूठा, बल्कि बेहद भड़काऊ था। बार-बार मुझे इसमें अफज़ल प्रेमी गैंग का सदस्य और देश विरोधी शायर कहा गया है। एंकर ने ये भी कहा कि मैं उस गैंग का सदस्य हूं जो भारत को कई टुकड़ों में बांटने का समर्थक है। ”

मीडिया विजिल ने इस विषय पर विस्तार से ख़बर की थी।

क़रीब डेढ़ साल बाद एनबीएसए इस नतीजे पर पहुँचा कि गौहर की तक़लीफ़ जायज़ है और ज़ी न्यूज़ ने गुनाह किया है। इसके लिए उसने माफ़ी माँगने और एक लाख रुपये जुर्माना देने का आदेश दिया है। एनबीएसए दरअसल, एक नौ सदस्यीय संस्था है जो चैनलों के कंटेंट की निगरानी करती है। जब चैनलों की बहुत आलोचना होने लगी और किसी संवैधानिक संस्था के ज़रिए नियमन को ज़रूरी बताया जाने लगा तो उन्होंने आत्मनियम की दुहाई देते हुए एनबीएसए का गठन किया। ख़ास बात यह है कि इसका अध्यक्ष कोई रिटायर्ड जज होता है।

ज़ी न्यूज़ पर जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाज़ी मामले में भी फ़र्जी वीडियो तैयार करने का आरोप लगा था। चैनल के एक प्रोड्यूसर विश्वदीपक ने इस्तीफ़ा देते हुए ज़ी न्यूज़ में चलने वाले फ़र्ज़ीवाड़ों का ख़ुलासा किया था। यही नहीं, चैनल के संपादक सुधीर चौधरी उगाही के एक मामले में जेल की हवा भी खा चुके हैं। लेकिन चैनल के मालिक और अब बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा पहुँचे सुभाषचंद्रा को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। उन्होंने सुधीर चौधरी को संपादक बनाए रखते हुए लिहाज़ के एक पारंपरिक परदे को फाड़ के फेंक दिया था।

बहरहाल, मसला ये है कि क्या ज़ी न्यूज़ आसानी से एनबीएसए का फ़ैसला मान लेगा। याद रखना होगा कि इंडिया टीवी के मालिक संपादक रजत शर्मा ने नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन (एनबीए) को ऐसे ही एक मामले में ठेंगा दिखा दिया था। 26/11 मुंबई हमलों से जुड़े प्रसारण के दौरान इंडिया टीवी ने पाकिस्तानू मूल की महिला फरहाना अली, जो आतंकवाद से जुड़े मसलों की विशेषज्ञ थीं, उन्हें जासूस बता दिया था। रायटर के एक इंटरव्यू पर आधारित इस कार्यक्रम के लिए रायटर के प्रति आभार भी नहीं जताया गया था।

इस मसले में दोषी मानते हुए एनबीए ने 2009 में माफ़ीनामा प्रसारित करने के फ़ैसले के साथ एक लाख का जुर्माना लगाया था, लेकिन रजत शर्मा ने तब इसे टीवी टुडे की जागीर बताकर एनबीए ही छोड़ दिया था। हद तो यह है कि बाद में वे इसमें वापस भी आए और अध्यक्ष की कुर्सी भी संभाली। जुर्माने का फ़ैसला डस्टबिन में चला गया।

ऐसे में सवाल यह है कि ज़ी न्यूज़ क्या करेगा। 8 सितंबर को रात नौ बजे लिखित और मौखिक माफ़ीनामा प्रसारित करने का फ़ैसला अगर लागू होता है तो एक नई शुरुआत होगी। चैनलों से पीड़ित लोगों को न्याय पाने का एक रास्ता मिलेगा।

लेकिन अगर ज़ी रजत शर्मा की राह पर चला तब ? क्या एनबीएसए के पास यह अधिकार है कि वह फ़ैसला हर हाल में लागू कराए ?

पुनश्च: इस ख़बर के प्रकाशन के बाद ज़ी न्यूज़ का पक्ष सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी ने कहा है कि एनबीएसए का फ़ैसला ग़लत है। ज़ी न्यूज़ ने सच्चाई प्रसारित की थी। वह क़ानूनी सलाह ले रहा है। आप समझ सकते हैं कि एनबीएसए की ज़ी न्यूज़ की नज़र में क्या औक़ात है।

.बर्बरीक

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