Home मोर्चा चैनल पत्रकारों की ‘पक्की’ नौकरी – हक़ीक़त या सरकारी झुनझुना ?

चैनल पत्रकारों की ‘पक्की’ नौकरी – हक़ीक़त या सरकारी झुनझुना ?

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केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने आज बयान दिया है कि मोदी सरकार न्यूज़ चैनलों और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों को भी Working Journalists Act के दायरे में लाने के कदम उठा रही है और जरूरत पड़ी तो कानून में संशोधन किया जाएगा।

अभी Working Journalists Act के दायरे में सिर्फ प्रिंट मीडिया के पत्रकार आते हैं।

अगर मोदी सरकार वाकई न्यूज़ चैनलों और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों को Working Journalists Act के दायरे में ले आती है और उन्हें Wage Board की सिफारिशों का पूरा लाभ मिलने लगता है तो ये पत्रकारों की Job Security की दिशा में बड़ा कदम होगा।

लेकिन मुझे शक है कि मंत्री जी की बातें हकीकत बन पाएंगी। जैसे ही सरकार ऐसा कदम उठाने की दिशा में बढ़ेगी, आप देख लीजिएगा कि आज मोदी-मोदी जप रहे सारे बड़े मीडिया हाउस इस सरकार के खिलाफ खबरें दिखाने लगेंगे।

यूपीए सरकार ने जब पिछला Wage Board गठित किया और फिर उसकी सिफारिशों को अधिसूचित (Notify) किया तो आपने देखा ही था कि कैसी-कैसी निगेटिव खबरें मनमोहन सरकार के खिलाफ आने लगी और हालत ये है कि आज भी उस सरकार के बारे में निगेटिव फीडबैक ही मिलती है।

साल 2014 में जब कांग्रेस लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी थी, तो केंद्रीय मंत्री रह चुके वीरप्पा मोइली ने कहा था कि जस्टिस मजीठिया Wage Board की सिफारिशें अधिसूचित करना यूपीए सरकार की बड़ी गलती थी और ये भी एक बड़ी वजह थी कि मीडिया मनमोहन सरकार के खिलाफ चला गया।

खैर, पिछले Wage Board की सिफारिशें लागू कराने के लिए Journalists और Non-Journalists को अपने मैनेजमेंट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़नी पड़ी और तब जाकर PTI सहित कुछ अखबारों और न्यूज एजेंसियों ने इसे लागू किया। लेकिन आज भी कई बड़े अखबारों ने इसे लागू नहीं किया है। जिसने लागू किया उसने भी बहुत सारे कानूनी तिकड़म के साथ लागू किया।

आजकल प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को Wage Board के दायरे से बाहर करने के लिए कई मीडिया हाउस तरह-तरह के तिकड़म कर रहे हैं। पत्रकारों का Designation यानी पद का नाम ऐसा-ऐसा गढ़ा जा रहा है कि वो न Working Journalists Act के दायरे में रहें और न ही Wage Board से मिलने वाले फायदे क्लेम कर सकें।

पिछले दिनों The Times of India ने तो बाकायदा एक संपादकीय लिखकर कहा था कि नोटबंदी और Wage Board ने भारतीय प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी।

आप खुद सोचिए कि जब ऐसे-ऐसे खून चूसने वाले मीडिया हाउस रहेंगे तो कैसे मिलेगा पत्रकारों को उनका वाजिब हक?

युवा पत्रकार प्रियभाँशु रंजन की फे़सबुक टिप्पणी