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जब जयपुर के किसानों ने ज़मीन में गड़कर मनाया पर्व तो मुक्तिबोध की कविता जी उठी!

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जितेन्द्र चाहर

समय के साथ शब्‍दों के मायने कैसे जिंदगी की जद्दोजेहद में बदल जाते हैं, उसका जीता-जागता उदाहरण हैं गरदन तक मिट्टी में दबे जयपुर के नींदड़ गांव के कुछ किसान, जो पिछले नौ दिनों से जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे है। मुक्तिबोध ने अपनी कविता ”एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्‍मकथ्‍य” में लिखा था: ”…कोशिश करो/ कोशिश करो/ जीने की/ ज़मीन में गड़कर भी।” कवि के लिए खंडहर हो चुकी व्‍यवस्‍था के मलबे में दबे रहकर जीना एक मुहावरा था, लेकिन राजस्‍थान के किसानों ने अपनी जिंदगी, अपनी आजीविका, अपनी ज़मीन बचाने के लिए वाकई खुद को ज़मीन में ही गाड़ लिया है।

गरदन तक ज़मीन में धंसे होने के बावजूद इनकी जिंदगी का जश्‍न कम नहीं हो रहा। 8 अक्‍टूबर को करवाचौथ के पर्व पर जब चांद निकला, तो ज़मीन में विरोधस्‍वरूप धंसे इन किसानों की पत्नियों ने भी इनके संघर्ष में हिस्‍सा लिया और चांद देखा। उसके बाद विवाहित दंपत्तियों ने अपना उपवास तोड़ा। इसे विडंबना कहना हलकी बात होगी कि जमीन समाधि सत्याग्रह कर रहे इन किसानों और इनकी पत्नियों की अभी तक सरकार ने कोई सुध नहीं ली है।

मामला जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) द्वारा नींदड़ आवासीय योजना के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन पर जबरन कब्जे का है जिसके विरोध में किसानों ने 2 अक्टूबर से भूमि समाधि सत्याग्रह शुरू किया। 5 अक्टूबर को जेडीए कमिश्नर वैभव गालरिया के साथ काश्तकारों की चौथे दौर की वार्ता में इन पांच बिन्दुओं पर सहमति भी बन गई: सर्वे के लिए समन्वय समिति गठित हो; समिति में जेडीए अफसर, जनप्रतिनिधि व संघर्ष समिति में प्रतिनिधि शामिल हों; एक ढाणी व कॉलोनी का दुबारा सर्वे हो; परिवार की न्यूनतम आवश्यकता रिपोर्ट बनाई जाए; मकान की स्थिति व नुकसान की रिपोर्ट तैयार हो।  योजना से प्रभावित लोगों की आर्थिक स्थिति के आकलन तथा अवाप्ति से उनके जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के आकलन पर भी सहमति बन गई।

6 अक्टूबर को कमिश्नर गालरिया जयपुर से बाहर चले गए। उनकी अनुपस्थिति में काम संभाल रहे जेडीए के जोन डिप्टी कमिश्नर राजकुमार सिंह ने किसानों को जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में वार्ता के लिए फिर से आमंत्रित किया तो किसानों ने यह कहते हुए मना कर दिया की जब दोबारा सर्वे पर सहमति बन गई है तो दोबारा वार्ता का क्या मतलब है? 7 और 8 अक्टूबर को शनिवार-रविवार की छुट्टी मना रहे प्रशासन को किसानों की याद नहीं आई।

9 अक्टूबर को जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में फिर से वार्ता हुई जिसमें जेडीए ने किसानों की दोबारा सर्वे की मांग को तो माना परंतु एक शर्त जोड़ दी कि सर्वे के साथ जेडीए को नींदड़ आवासीय योजना में मंदिरमाफ़ी और सार्वजनिक जमीन पर कब्ज़ा कर लेने दिया जाए। नींदड़ बचाओ युवा किसान संघर्ष समिति ने जेडीए की इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया। किसानों का कहना है कि जेडीए जमीन पर किसी भी बहाने से काबिज होना चाहता है इसीलिए वार्ता के नाम पर किसानों के साथ हर दिन मजाक किया जा रहा है।

बीते 23 दिन से नींदड़ बचाओ युवा किसान संघर्ष समिति आंदोलन में डटी है, अब भी सरकार और किसान अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। किसानों की मांगों के सामने नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने हाथ खड़े कर दिए हैं। उन्होंने जेडीसी के कंधों पर बंदूक रख दी है। इधर, जमीन समाधि सत्याग्रह में क्रमिक अनशन शुरू हो गया है। सत्याग्रही कहते हैं, हमारी मांगें नहीं मानी जाती तो यहीं खुद पर मिट्टी डाल समाधि ले लेंगे। देखते हैं, कौन झुकता है?

2010 में कांग्रेस सरकार के समय जयपुर विकास प्राधिकरण ने नींदड़ आवासीय योजना की अधिसूचना अख़बारों के माध्यम से जारी की थी। अधिसूचना के समय से ही किसान भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे है।

इस योजना में नींदड़ गांव और आसपास की 19 ढाणियों के 5 हजार परिवारों के लगभग 20 हजार लोग प्रभावित हो रहे है। योजना में 1350 बीघा भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है। 2013 में अवार्ड जारी हुआ और किसानों ने विरोधस्वरूप मुआवजा राशि नहीं ली तो सरकार ने मुआवजा कोर्ट में जमा करवा दिया। किसानों के भारी विरोध के चलते जेडीए जमीन का कब्जा नहीं ले पा रहा था। 2014 में राज्य में चुनाव आए तो पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह के दामाद वर्तमान बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी ने किसानों से भूमि अधिग्रहण निरस्त करवाने का वादा किया। किसानों से चुनाव में वोट भी लिए और जीत भी गए, लेकिन फिर कभी किसानों के बीच वे नहीं आए।

16 सितम्बर 2017 को नींदड़ आवासीय योजना के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) दस्ते ने भारी पुलिसबल की मौजूदगी में किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा करना शुरू किया। किसानों ने जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में एकजुट हो कर जेडीए को कब्ज़ा करने से रोक दिया और उसी जमीन पर 18 सितम्बर से एक मात्र मांग भूमि अधिग्रहण को निरस्त करने को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। पंद्रह दिन के अनिश्चितकालीन धरने से जब सरकार के कान पर जू तक नही रेंगी तो किसानों ने 2 अक्टूबर से भूमि समाधि सत्याग्रह शुरू कर दिया।

इस योजना में जेडीए प्रभावित किसानों को मुआवजा देने व जनसुविधाओं पर जो राशि खर्च करेगा उसकी लागत करीब साढ़े तीन हजार रूपए प्रति वर्गमीटर आएगी, जबकि यहां जेडीए छह हजार रूपए प्रति वर्ग मीटर में प्लाट काटे तो भी आसानी से बिक सकते हैं और जेडीए को 1000 करोड़ मिल सकते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रस्तावित योजना से आगे के क्षेत्र में ही लोग छह हजार रूपए में प्लाट बेच रहे हैं, जबकि जेडीए के प्लाटों की कीमत हमेशा और अधिक रहती है। यह योजना जेडीए की दरों के मामले में अब तक की सबसे मंहगी योजना होगी।

समाधि सत्याग्रह कर रहे किसानों का हौसला बरकरार है। सत्याग्रह में क्रमिक अनशन पर बैठे किसानों की पत्नियों का हौसला और ज्‍यादा सराहनीय है जिन्‍होंने ज़मीन में गड़े अपने पतियों के साथ करवाचौथ का व्रत तोड़ा। अपनी ज़मीन बचाने का ऐसा अनूठा जीवंत आंदोलन शायद ही कहीं दिखा होगा। मुक्तिबोध के ही शब्‍दों में कहें तो ये किसान जानते हैं कि ”आत्म-विस्तार यह बेकार नहीं जाएगा/ ज़मीन में गड़े हुए देहों की ख़ाक से/ शरीर की मिट्टी से, धूल से/ खिलेंगे गुलाबी फूल।”


(लेखक जितेंद्र चाहर जन संघर्षों पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट www.sangharshsamvad.org के मॉडरेटर हैं)

2 COMMENTS

  1. For capitalist society like India it’s natural that state keeps on looting Private property of 99% so that countless concessions could be given to corporates thus increasing their ” Private property ”.

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