Home मोर्चा आरक्षण पर चल रहे ‘द्रोणाचारी कुठारे’ के ख़िलाफ़ DUTA ने खोला मोर्चा

आरक्षण पर चल रहे ‘द्रोणाचारी कुठारे’ के ख़िलाफ़ DUTA ने खोला मोर्चा

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विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में 200 प्वाइंट रोस्टर की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के ख़िलाफ़ पल  रहा गुस्सा अब सड़क पर फूटेगा। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ यानी डूटा आज इसके ख़िलाफ़ नार्थ कैंपस में धरना-प्रदर्शन करेगा। आरोप है कि यह रोस्टर आरक्षित वर्गों के ख़िलाफ़ खुला षड़यंत्र है। मसला जटिल है, इसे समझाने  के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक लक्ष्मण यादव ने दो किस्तों में पूरी दास्तान लिखी है। पढ़िए और समझिए कि कैसे विश्वविद्यालयों में द्रोणाचार्य का कुठारा चल रहा है- संपादक

 

 

200 प्वाइंट रोस्टर बनाम विभागवार रोस्टर की दास्ताँ- भाग 1

 

 

उच्च शिक्षा का चरित्र मूलतः जातिवादी है। इसे कई स्तरों पर समावेशी व सामाजिक न्याय परक होना था, जो कभी हुई ही नहीं. देश के वंचितों-शोषितों की बहुसंख्यक आबादी अव्वल तो उच्च शिक्षा तक कभी पहुँच ही नहीं पाई। अव्वल तो ये कि इंदिरा साहनी केस, सब्बरवाल केस, वी. नागराज केस जैसे न्यायिक संघर्षों की एक लम्बी लड़ाई के बाद उच्च शिक्षा जैसे सत्ता-प्रतिष्ठानों में आरक्षण लागू होने में ही पाँच दशक बीत गए. आज़ादी के पचास साल तक इन शिक्षण संस्थानों पर जन्मजात मेरिटधारी सवर्ण जातियों का ही कब्जा रहा. आरक्षण की ज़रूरत ऐसे ही अमानवीय और अन्यायप्रिय लोगों के कारण पड़ी। तब 1997 में SC-ST आरक्षण और 2007 में जाकर OBC आरक्षण उच्च शिक्षा में लागू किया गया। तब से दो स्तर पर साज़िशें हुईं- पहला ये कि उच्च शिक्षा में निजीकरण किया जाने लगा और दूसरा ये कि स्थाई नियुक्तियों की प्रक्रिया में कमोबेश विराम सा लगा दिया गया।

सामाजिक प्रतिनिधित्व में 1931 की जाति-जनगणना के आंकड़ों की बुनियाद पर SC 15%, ST 7.5%, OBC 52% आबादी का विभाजन कुछ इस प्रकार है, जो आज कम से कम 85% आबादी को कवर करता है. अब इनके उच्च शिक्षा में हिस्सेदारी का आज 2018 का आंकड़ा कमोबेश कुछ इस प्रकार हैं कि
15% आबादी वाले SC 7%
7.5% आबादी वाले ST 2.12%
54% आबादी वाले OBC 5%
15% आबादी वाले सवर्ण 85%

आरक्षण लागू होने के बाद पदों के क्रम-विभाजन को ही ‘रोस्टर’ कहा गया. अब पहली बार रोस्टर ऐसा बना, जिससे कुछ सीटें 85% आबादी वाले आरक्षित वर्ग को मिलीं. इसका वितरण को समझें. माना कि कुल पदों की संख्या 100 है. अब रोस्टर का विभाजन इस प्रकार होगा-

ST का आरक्षण 7.5% है. 100/7.5=13.33 यानी हर 14वाँ पद ST को आरक्षित होगा.
SC का आरक्षण 15% है. 100/15=6.66 यानी हर 7वाँ पद SC को आरक्षित होगा.
OBC का आरक्षण 27% है. 100/27=3.70 यानी हर चौथा पद OBC को आरक्षित होगा.

ताज़ा मामला ‘असंवैधानिक’ विभागवार रोस्टर प्रणाली के लागू किये जाने का है. प्रावधान यह रहा कि विश्वविद्यालय/कॉलेज को एक इकाई मानकर पदों के सृजित होने की तिथि के बढ़ते क्रम से रोस्टर को फिक्स्स किया जाएगा. लेकिन बीएचयू के एक शोधछात्र की पहल पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल बेंच ने एक फैसला सुनाया कि विश्वविद्यालय/कॉलेज वार रोस्टर प्रणाली लागू होगी, जिसे 13 प्वाइंट रोस्टर भी कहा जाता है.

इस आरक्षित क्रम-विभाजन के बाद रोस्टर क्रम और पदों के आरक्षण की रोस्टर सूची इस प्रकार होगी-
1 – UR
2 – UR
3 – UR
4 – OBC
5 – UR
6 – UR
7 – SC
8 – OBC
9 – UR
10 – UR
11 – UR
12 – OBC
13 – UR
14 – ST
15 – SC

जिन विभागों में 15 से अधिक पद होंगे, या विश्वविद्यालय अथवा कॉलेज को एक इकाई मानते, तो वहाँ यही क्रम-रोस्टर 200 की संख्या तक चलता है. यानी 200 के क्रम में पदों की सृजित तिथि से क्रमवार आरक्षित पद फिक्स्ड होते जाते और कमोबेश 50% आरक्षण लागू हो जाता. यहाँ यह याद दिलाते चलें, कि 1997 के पहले तक ये पूरा रोस्टर सैद्धांतिक व व्यावहारिक दोनों तौर पर UR हुआ करता था, जबकि उच्च शिक्षा में वाया साक्षात्कार इसे सवर्णों के लिए आरक्षित मानकर लगभग सभी पदों पर सवर्ण अभ्यर्थी की ही नियुक्ति की जाती रही. एकाध अपवादों को छोड़कर. यानी सवर्णों को 100% आरक्षण.

आइये! अब ये समझें कि कैसे ताज़ा विभागवार (13 प्वाइंट) रोस्टर आरक्षण विरोधी और असंवैधानिक है-

1. विभागवार रोस्टर का पहला खेल समझते हैं. इस विभाजन को अब दो स्तरों से समझें. मसलन किसी नए कॉलेज या विभाग में यदि कुल 3 पद ही होंगे, तो तीनों पद रोस्टर में UR होंगे. यही है पहला और सबसे ख़तरनाक खेल, जिसमें विभागवार रोस्टर बनाने से हमेशा के लिए ये आसानी हो जाएगी कि हर विभाग में 3 या 3 से कम पदों को विज्ञापित किया जाएगा और आरक्षित पदों का क्रम कभी आ ही नहीं सकेगा. अब जिन विश्वविद्यालयों में नए विज्ञापन आ रहे हैं, वे सब इसी विभागवार रोस्टर से आ रहे हैं. जहाँ आरक्षित पद कभी आ ही नहीं सकेंगे. यदि कॉलेज/विश्वविद्यालय को एक इकाई माना जाता, तो यह खेल कभी नहीं संभव होता. क्योंकि तब यह 200 तक चलता और कुल मिलाकर आरक्षण पूरा होता.

2. विभागवार रोस्टर का दूसरा खेल समझते हैं. यदि किसी विभाग में कुल 15 पद स्वीकृत होंगे, तब जाकर वितरण कुछ इस प्रकार होगा- 1 ST, 2 SC, 3 OBC, 9 UR. अब यहाँ भी आरक्षण का कुल प्रतिशत हुआ 15 में 6 पद आरक्षित यानी 40% आरक्षण. इस लिहाज़ से कभी संवैधानिक आरक्षण तो लागू ही नहीं हो सकेगा. यदि कॉलेज/विश्वविद्यालय को एक इकाई माना जाता तो आरक्षण कमोबेश 50% तक मिल तो जाता.

3. विभागवार रोस्टर का तीसरा और सबसे खतरनाक खेल देखिये. माना कि एक पुराने हिंदी विभाग में कुल 11 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 8 पदों पर आरक्षण लागू होने का पहले ही नियुक्तियाँ हो चुकी हैं, तो ये सभी सवर्ण यहाँ पढ़ा रहे हैं. अब आरक्षण लागू किया गया, तो इन आठ में से चौथा और आठवाँ पद OBC को और सातवाँ पद SC को जाएगा, जिसपर पहले से कोई सवर्ण पढ़ा रहे हैं. अब नियमतः ये तीनों पद ‘शार्टफ़ॉल’ में जाएगा और आगामी विज्ञप्ति में नव-सृजित नवें, दसवें ग्यारहवें तीनों पद इस ‘शार्टफ़ॉल’ को पूरा करेंगे. लेकिन देश के हर विश्वविद्यालय में मनुवादियों ने शार्टफ़ॉल को लागू ही नहीं किया, और नियम बना दिया कि चौथे, सातवें और आठवें पदों पर काम करने वाले सवर्ण जब सेवानिवृत्त होंगे, तब जाकर इनपर आरक्षित वर्ग के कोटे की नियुक्ति होगी. यानी ‘शार्टफ़ॉल’ लागू ही नहीं किया गया, जिससे आरक्षण कभी पूरा होगा ही नहीं और सीधे हज़ारों आरक्षित पदों पर सवर्णों का ही कब्ज़ा होगा.

4. अंतिम साज़िश ये कि यदि किसी विश्वविद्यालय/कॉलेज में अगर 1997 के बाद से SC-ST की और 2007 के बाद से OBC की कोई नियुक्ति नहीं हुई है और पहली बार 2018 में अगर विज्ञापन आयेगा, तो इस बीच के पदों में जो ‘बैकलाग’ होगा, उन्हें पहले भरा जाएगा. लेकिन जब रोस्टर ही विभागवार बनेगा, तो न तो ‘शार्टफ़ॉल’ लागू होगा और न ‘बैकलाग’. यानी आज की तिथि में ही आरक्षण मिलेगा, जो कभी 49.5% भी पूरा नहीं हो पाएगा.

5. ध्यान रहे कि उच्च शिक्षा में UR कैटेगरी को हमेशा सामान्य माना गया, यानी साक्षात्कार के ज़रिये होने वाली नियुक्तियों में कभी गैर-सवर्ण की नियुक्ति अपवाद ही रही. आसान भाषा में समझें तो 15% सवर्णों के लिए 50.5% आरक्षण. 1931 की जाति-जनगणना और 1980 के मंडल कमीशन के सैम्पल सर्वे से OBC की जनसंख्या 52% है, लेकिन इन्हें आरक्षण 27% ही मिला है. ऐसे में पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्त्व तो कभी पूरा हो ही नहीं सकेगा. ऐसे ही PwD, अल्पसंख्यक और महिलाओं की स्थिति तो और भी भयावह होगी.

यह है उच्च शिक्षा का मूल चरित्र. इसकी एक एक परत और उघाड़ते चलेंगे तो और भी बदबू मिलेगी, और भी सडांध दिखेगी. अब मनुवादी सरकार ने न्यायालयों के सहारे विभागवार रोस्टर लागू करके बची खुची सम्भावनाओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया है।

 

 

200 प्वाइंट रोस्टर बनाम विभागवार रोस्टर की दास्ताँ- भाग 2

उच्च शिक्षा में रोस्टर को लेकर भाग 1 की दास्ताँ पढ़कर आपकी एक बुनियादी समझ बन गई होगी. अब कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के साथ इसकी पेचीदगियों पर बात करते हैं.

2 जुलाई 1997 में जब उच्च शिक्षा में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने के लिए SC और ST के लिए आरक्षण का प्रावधान आया, तो सभी UR (अनारक्षित) पदों में आरक्षित पदों के निर्धारण के लिए सबसे पहले 40 प्वाइंट रोस्टर बनाया गया. यानी इस रोस्टर में कुल 40 पद क्रम में 15% SC और 7.5% ST के लिए पद निर्धारण की व्यवस्था को 40 प्वाइंट रोस्टर कहा गया, 40*15% = 7 (1, 7, 13, 20, 25, 32, 37वाँ) पद SC के लिए और 40*7.5% = 3 (4, 17, 29वाँ) पद ST के लिए निर्धारित हुए. बाकी 30 पद UR यानी अनारक्षित. इन 77% UR पदों पर किसकी नियुक्ति हुई, ज़माना जानता है.

उक्त 40 प्वाइंट रोस्टर को मनुवादी चैलेंज मिला और न्यायालय में इसे चुनौती दे दी गई. मंशा यह रही कि पहला पद ही SC के लिए आरक्षित कैसे हो सकता है. मामला कमोबेश एक दशक तक न्यायालय के विचाराधीन रहा और तब तक नियुक्तियाँ कैसे होती रहीं, बताने की आवश्यकता नहीं. क्या यह बात मानवीय व न्यायप्रिय नहीं कि जब इस मुल्क के संविधान ने 47 साल बाद यह महसूस किया कि SC-ST को उच्च शिक्षा में आरक्षण देना होगा, क्योंकि इनकी हिस्सेदारी उच्च शिक्षा में है ही नहीं; तो पहले मौक़ा आरक्षित वर्ग को ही मिले. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और न्यायालय ने 40 प्वाइंट रोस्टर ख़ारिज कर दिया. उधर ओबीसी आरक्षण भी 21 मार्च 2007 में लागू हुआ.

कालांतर में 13 प्वाइंट रोस्टर का ख़ाका तैयार किया गया. इसकी रूपरेखा भाग 1 में दिए हुए चार्ट के ही अनुरूप रही कि जिसमें ST का नंबर ही नहीं आना था. ऐसे में इसे चक्रीय यानी ‘रोटेट’ बनाकर नाम दिया गया ‘L’ शेप रोस्टर. जिसकी तस्वीर संलग्न है. ‘L’ शेप रोस्टर भी मूलतः 13 प्वाइंट रोस्टर रहा, जिसके विभाजन की अंकगणितीय स्थिति का आधार इस प्रकार रहा- 100/7.5=13.33 यानी हर 14वाँ पद ST को और 100/15=6.66 यानी हर 7वाँ पद SC को आरक्षित होगा. 2007 में OBC के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान आया, जिससे 100/27=3.70 यानी हर चौथा पद OBC को आरक्षित होगा. ‘L’ शेप रोस्टर को रोटेट होने का कारण ST का पद रहा, जिसका पहला अवसर 14वें पद पर आता, लेकिन 13 पदों का रोस्टर होने के नाते ST को कभी मौक़ा ही नहीं मिलता, इसलिए 13वें पद तक उर्ध्वाधर आने के बाद एक पद यानी 14वें के लिए यह रोस्टर क्षैतिज दिशा में वक्रीय ‘रोटेट’ होकर ST को मौक़ा देता था. उसके बाद पुनः 15वाँ पद उर्ध्वाधर हो जाया करता. इसे 13 कैडर बेस मानकर 13 चरण की नियुक्ति वक्रता से होकर गुजरना था, यानी 13वाँ ST पद के लिए इसे कुल 104 पदों तक आना होगा.

अब आइये इसे आसान भाषा में समझते हैं. जिस तार्किक आधार पर 13 प्वाइंट रोस्टर को ‘L’ शेप में रोटेट किया गया, उसमें ST को मौक़ा तो मिला, लेकिन अपने नियत अनुपात में हिस्सेदार के लिए ST को 104वें पद तक का इंतज़ार करना होगा, जिसके आने में कितने सौ साल इंतज़ार करना होगा, मन करे तो जोड़ लीजिएगा. ध्यातव्य है कि इस ‘L’ शेप रोस्टर की कहानी भी बीत गई. कालान्तर में रोस्टर का घालमेल चलता रहा और ‘L’ शेप के ‘वक्र’ को समाप्त करके उर्ध्वाधर 13 पदों के रोस्टर को ही चलन में लाया गया. आज जिसे विभागवार रोस्टर के रूप में चलन में लाया जा रहा है, उसे यही 13 प्वाइंट रोस्टर मान लिया गया है.

अब सबसे महत्त्वपूर्ण बात. पोस्ट बेस्ड रोस्टर में संस्थान को एक इकाई मानने से संख्या अधिक होने पर 200 प्वाइंट रोस्टर बनाया गया. 200 होने के पीछे कारण 7.5% ST आरक्षण को 15% के राउंड फ़ीगर में करने के लिए बेस को 100 से दुगुना करके 200 किया गया. यानी आनुपातिक आधार पर 200 पद होने पर 7.5% के लिए पदों का निर्धारण आया कि प्रत्येक 14वाँ पद ST को जाने से 200 पदों में 7.5% आरक्षण के मुताबिक़ पद मिल जाएँगे. इसी प्रकार प्रत्येक 7वाँ पद SC को मिलेगा, जिससे 200 पद पूरे होने से SC को निर्धारित 15% आरक्षण मिल जाएगा और प्रत्येक चौथे पद को OBC को देते हुए 200 पद पूरे होने पर OBC को 27% आरक्षण मिल सकेगा. यदि यह बेस 200 पद से घटाकर 13 पद कर दिया जाएगा, तो आरक्षित पदों के निर्धारण को 200 के स्थान पर 13 के बेस से विभाजित करना चाहिए, जिससे सबसे पहली सीट ST को, अगली SC को और OBC को निर्धारित होती, तब UR का नंबर आता. लेकिन 200 प्वाइंट रोस्टर की गणना को 13 पर ही रोककर इसे विभागवार रोस्टर के बतौर पालन करना सीधे सीधे अतार्किक है.

आसान भाषा में कहा जाए तो रोस्टर को विभागवार बनाने का बेस 13 होना अतार्किक या कहें कि मनुवादी साज़िश है, क्योंकि 13 के बाद 14, 15, 16 तीन पद आरक्षित आ रहे थे. इसलिए इसे 13 पर ही रोक दिया. दूसरा यदि 13 पर ही रोकना है, तो बेस 200 प्वाइंट रोस्टर का कैसे लगाया जा सकता है. बेस 13 का ही होना चाहिए, जिससे 7.5 पद आरक्षित होंगे. यह है असली साज़िश.

(बात उलझ रही होगी शायद, लेकिन आप जिस बिंदु पर सलाह या सवाल हो, कर सकते हैं. कागज़ी मनुवाद इतना ही सरल-सहज होता, तो फिर होता ही क्योंकर.)

 

 

 

 

 



 

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