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13 प्वाइंट रोस्टर और आदिवासियों की जंगल से बेदख़ली के ख़िलाफ आज भारत बंद !

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साथियो!

आज मुल्क एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है कि यहाँ की जनता को अपने हक़-हुकूक के लिए सड़क पर उतर कर भारत बंद करने को मजबूर होना पड़ रहा है। आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि ये भारत बंद क्यों हो रहा है? तो आइए, समझते हैं कि ये क्यों हो रहा है।

भारत बंद करने का सबसे बड़ा मुद्दा है- विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर। अब आप सोचेंगे कि ये रोस्टर क्या होता है, 13 प्वाइंट क्या होता है, इससे किसे, कितना, कहाँ नुकसान हो रहा है? तो इसे सीधी आसान भाषा में समझें कि इस विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर से उच्च शिक्षा में आरक्षण पूरी तरह खत्म हो चुका है। बस इतनी सी बात है। विभागवार रोस्टर से प्रोफेसर बनने के लिए OBC, SC, ST, PwD के लिए आरक्षित पद अमूमन कभी आएँगे ही नहीं। अभी तक पिछले एक साल में विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर लागू होने के बाद लगभग 1000 पदों के विज्ञापन आए होंगे, जिनमें से अधिकतम 3 से 4 फ़ीसदी पद OBC को और 2 फ़ीसदी पद SC को मिले होंगे। ST और PwD (विकलांग) को कमोबेश कोई पद ही नहीं मिला।

आज भी बहुजन समाज के अधिकतम 10 फ़ीसदी शिक्षक भी नहीं होंगे, लेकिन इस विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर से तो अब कभी बहुजन शिक्षक ही नहीं बन सकेंगे। केंद्र सरकार भी मानती है कि न्यायपालिका ने विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने का आरक्षण विरोधी फैसला दिया है, इसलिए सरकार अध्यादेश लाकर 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करेगी। लेकिन सरकार धोखा देते हुए अध्यादेश नहीं ला रही और दूसरी तरफ आरक्षण विरोधी रोस्टर से लगातार विज्ञापन आ रहे हैं। यानी जिस आरक्षण को उच्च शिक्षा में लागू कराने के लिए सड़क से संसद तक संघर्ष हुआ, पीढ़ियाँ खप गईं; आज वह विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर से एक झटके में ख़त्म किया जा चुका है। क्या यह संविधान की हत्या नहीं है? इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए?

भारत बंद का दूसरा सबसे अहम मुद्दा है- आदिवासियों को उनकी जल-जंगल-ज़मीन से बेदखल करने के आदेश का प्रतिरोध। आदिवासी, जो इस मुल्क के असल मूलानिवासी हैं, जिन्होंने इस मुल्क के जंगलों को बचाया है, उन पर जगलों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाकर और तीन पीढ़ी का पट्टा न होने के बहाने अपनी जमीन छोड़कर जाने का आदेश कितना न्यायसंगत है? दरअसल इसके पीछे सरकारें आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करके बड़े बड़े उद्योगपतियों को प्राकृतिक संपदा के दोहन का रास्ता साफ करना चाहती हैं। इस फैसले से एक करोड़ से ज़्यादा आदिवासी अपनी पीढ़ियों की विरासत और ज़िंदगी के वजूद जल-जंगल-ज़मीन से बेदखल हो जाएंगे। कोर्ट के स्टे-ऑर्डर के बहाने इसे टाला जा रहा है, जबकि अध्यादेश लाकर इसका एक स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए। क्या यह संविधान की हत्या नहीं है? क्या ऐसे फैसलों का विरोध नहीं किया जाना चाहिए? यदि हाँ! तो ये विरोध हो रहे हैं। पूरा देश आज विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर और आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन कर रहा है। लेकिन सरकार लगातार इन मुद्दों को टाल कर आचार-संहिता लगने का इंतज़ार कर रही है। रोस्टर पर अध्यादेश लाने की बाद संसद में बोलकर भी सरकार लगातार धोखा दे रही है। उधर आचार-संहिता लागू हुई और इधर विश्वविद्यालयों व ज़मीनों से वंचितों की बेदखली का रास्ता साफ हो जाएगा। अभी नहीं रोका गया, तो आगे रोकने को कुछ बचेगा ही नहीं।

आंदोलनों और हड़तालों से इस सरकार पर कोई असर ही नहीं पड़ रहा है। इसलिए भारत बंद एक मजबूरी है। संविधान को बचाने और इस मुल्क को मुकम्मल मुल्क बनाने के लिए ये भारत बंद हो रहा है। सामाजिक न्याय के लिए यह भारत बंद हो रहा है। आज़ादी के सत्तर साल बाद भी आज ये मुल्क किसका है और किसके लिए हैं, ये तय करने के लिए ये भारत बंद हो रहा है। गाँव-कस्बों में दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक तबके के लोग अपना खून-पसीना एक करके अपनी पहली पीढ़ी के बच्चों को विश्वविद्यालयों तक भेज पाए कि वे कुछ बड़ा करेंगे। प्रोफ़ेसर बनेंगे। लेकिन आज उन पीढ़ियों के ख़्वाब ही हत्या करने वाले ‘द्रोणाचारी’ विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर के बहाने ‘एकलव्यों’ की गरदन ही काट चुके हैं। इसलिए ये भारत बंद हो रहा है। आइए! संविधान बचाने के लिए हो रहे इस ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा बनिए। ताकि जब आने वाली पीढ़ियाँ आपसे पूछें, कि ये सब तुम्हारे सामने हो रहा था, तब तुम क्या कर रहे थे? आप पीढ़ियों को बता सकें कि आप इसके विरोध में लड़ रहे थे।

ज्वाइंट फोरम फॉर एकेडमिक एंड सोशल जस्टिस की ओर से जारी

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