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जेएनयू में आज़ादी और राष्ट्रवाद पर परिचर्चा

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सत्तरवें गणतंत्र दिवस के एक दिन पूर्व भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू के छात्रों द्वारा ‘कड़ियाँ’ साहित्यिक मंच के तत्वावधान में डॉ. रविकांत की पुस्तक “आज़ादी और राष्ट्रवाद” पर परिचर्चा सम्पन्न हुई। युवा चिंतक और जेएनयू के शोधार्थी अजय कुमार यादव ने शुरुआती भाषण में कहा कि कोई ये दावा न करे कि उन्होंने पूरे राष्ट्र को जान लिया। ‘‘राष्ट्रवाद’’ पर खुद को केन्द्रित रखते हुए लोकप्रिय माध्यमों- सिनेमा, क्रिकेट के हवाले से उन्‍होंने बहुत सारे प्रश्न खड़े किए। अजय ने दलित समुदाय से आने वाले महान क्रिकेट खिलाड़ी बालू पावलंकर की उपेक्षा पर कई सवाल खड़े किये।  उन्होंने कहा कि जिस राजा और क्रिकेट खिलाडी रणजीत सिंह के नाम पर हमारे यहां घरेलू क्रिकेट ‘रणजी ट्रॉफी होती है, उन्होंने देश की तरफ से कभी नहीं खेला बल्कि अंग्रेजों की तरफ से खेला था। यह चिंता की बात है। साहित्य में बंकिमचंद्र चटर्जी के बरक्स उन्‍होंने प्रेमचंद के राष्ट्रवाद को ज्यादा समावेशी और उदार बताया। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि प्रतीकों का सम्मान जरूर करना चाहिए लेकिन सिर्फ प्रतीकों से कोई राष्ट्र मजबूत नही बनता।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. आनंद ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय एकता नामक बच्चा खो गया है जिसे खोजने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता, एकता और आज़ादी के त्रिकोण पर आधारित है और यह त्रिकोण समन्वय, न्याय और एकता से मजबूत बनेगा न कि मूर्तियों से।

प्रो. विवेक ने कहा कि यूरोप के छात्रों के लिए राष्ट्रवाद एक अधोपतनकारी अवधारणा है। कोई भी राष्ट्र अधिकारों, सामासिक संस्कृति और स्व-प्रतिनिधित्व से मजबूत बनता है। आगे उन्होंने कहा कि किसी निचली संस्कृति के जिक्र किये बिना किसी राष्ट्र का चिंतन कैसे किया जा सकता है? पश्चिमी चिंतक अरनेस वेनन के हवाले से कहा कि धर्म और भाषा के आधार पर राष्ट्र की निर्मिति नही होती। स्वप्रतिनिधित्व पर बल देते हुए उन्‍होंने कहा कि राष्ट्र की मजबूती के लिए इस पर धर्म का मुलम्मा चढ़ाने से बचाना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध इतिहासकार और जेएनयू में प्रोफेसर एमेरिटस प्रो. हरबंस मुखिया ने शुरुआत में ही कहा कि NATION IN THE MAKING अर्थात राष्ट्र लगातार बनने की प्रक्रिया में है। राष्ट्र के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर भी उन्‍होंने प्रकाश डाला। उनके अनुसार राष्ट्रवाद ने एकतरफ विकास भी किया तो दूसरी ओर इसी की वजह से युद्ध भी हुए। राष्ट्रवाद ने ही उपनिवेशों को स्वतंत्रता संग्राम में जूझने की स्वतंत्रता प्रदान की। साथ ही यह भी कहा कि गांधी और नेहरू का राष्ट्रवाद समावेशी है जबकि जिन्ना और सावरकर के राष्ट्रवाद में एक समुदाय की ही जगह है। गौरतलब है कि उन्होंने अपने वक्तव्य का अंत गालिब के एक शेर से किया –

हम मुवाहिद हैं,  हमारा केश है तर्क-ए-रुसूम

मिल्लतें जब मिट गईं, अज्ज़ा-ए-ईमां हो गईं

संपादकीय वक्तव्य पुस्तक के संपादक डॉ. रविकांत ने दिया। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी सुमित कुमार चौधरी और धन्यवाद ज्ञापन एमए प्रथम वर्ष की छात्रा ऋतु शर्मा ने किया। कार्यक्रम के बाद “कड़ियाँ ” दीवार पत्रिका का भी विमोचन किया गया।

रिपोर्ट और फ़ोटो – चंचल कुमार

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